टीवी विज्ञापन से ज़ोर-आज़माइश

  • 23 अगस्त 2011
मायावती

एक ओर भारत का चुनाव आयोग उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव कराने की तैयारियों को अंतिम रूप देने में लगा है, तो दूसरी ओर मुख्यमंत्री मायावती ने सरकारी ख़र्चे पर देश के लगभग सभी टेलीविज़न न्यूज़ चैनल्स पर ज़ोरदार प्रचार अभियान छेड़ दिया है.

विपक्ष इसे जनता के धन का दुरूपयोग बता रहा है. लेकिन चुनाव आयोग के अधिकारियों का कहना है कि जब तक चुनाव की औपचारिक घोषणा नहीं हो जाती, तब तक आयोग हस्तक्षेप नहीं कर सकता.

टेलीविज़न न्यूज चैनल्स पर पिछले कई रोज़ से केवल अन्ना हज़ारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के ही समाचार आ रहे हैं. बड़ी-बड़ी घटनाओं के समाचार भी कहीं सुनाई या दिखाई नहीं देते.

लेकिन रात साढे आठ से नौ बजे के बीच प्राइम टाइम में अगर आप कोई भी प्राइवेट हिंदी न्यूज़ चैनल खोलेंगे तो केवल और केवल उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती के साढे चार साल की उपलब्धियाँ ही दिखाई और सुनाई देंगी.

सचित्र विवरण

इनमें 13 मई 2007 को मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के बाद से मायावती के अनेक चित्र और उनकी विभिन्न योजनाओं का सचित्र विवरण है. साढे पांच मिनट के इस कार्यक्रम में कहा गया है कि मायावती का यह कार्यकाल बहुत अच्छा और सराहनीय रहा है.

विज्ञापन का छिपा संदेश यह है कि जनता को उनका आभारी होना चाहिए. मतलब कि उन्हें दूसरा मौक़ा मिलना चाहिए.

कार्यक्रम टीवी न्यूज़ के बीच में इस तरह पिरोया जाता है कि बहुत से लोग इसे समाचार ही समझेंगे. साढे पांच मिनट का यह विज्ञापन फ़िलहाल 20 टीवी न्यूज़ चैनल्स को 15 दिनों के लिए दिया गया है.

टीवी न्यूज़ पर विज्ञापन दर 10 सेकंड्स के हिसाब से होती है. यानी यह काफ़ी महंगा खेल है. सूचना विभाग के निदेशक बादल चटर्जी के अनुसार इस एक विज्ञापन पर 14 करोड़ रुपए का ख़र्च आएगा.

विभागीय अधिकारियों के अनुसार अभी दूसरे विज्ञापन भी तैयार हो रहे हैं. दिलचस्प बात यह है कि विज्ञापन केवल न्यूज़ चैनल्स पर दिए जा रहे हैं. कई मनोरंजन चैनल्स पर दर्शक ज़्यादा हैं, फिर भी उनमें यह विज्ञापन नही दिया जा रहा.

एक अधिकारी के अनुसार मनोरंजन चैनल्स की कोई न्यूसेंस वैल्यू नही है. यानी वे सरकार का कुछ बिगाड़ नही सकते. लेकिन विपक्षी भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ता विजय पाठक का कहना है कि इस तरह के विज्ञापनों से फ़ायदे की बजाय नुक़सान भी हो सकता है.

नुक़सान

विजय पाठक याद दिलाते हैं कि वर्ष 2007 में समाजवादी पार्टी की सरकार ने भी टीवी न्यूज़ पर धुआँधार विज्ञापन दिया था, लेकिन उसका उनको फ़ायदा नहीं हुआ.

उन्होंने कहा, "सरकार की उपलब्धियों के प्रचार का यह अतिरेक है. विज्ञापन जब सच्चाई से भिन्न होता है तो वह जनता को चुभता है. सपा के राज में भी यूपी में है दम, अपराध है कम बोलते हुए विज्ञापन दिए गए थे जबकि वास्तव में परिस्थिति भिन्न थी लोग अपराध से त्रस्त थे. उसी तरह इस समय भी लोग भ्रष्टाचार और विकास कार्यों में ख़राबी से दुखी हैं. पर सरकार कहती है कि सब अमन चैन है. यह जनता को चिढाने जैसा है."

विजय पाठक कहते हैं कि इस बारे में एक नीति बननी चाहिए कि किसी सरकार के आख़िरी साल में सरकारी ख़र्चे पर किस तरह के विज्ञापन दिए जा सकते हैं.

पिछले कई सालों से टेलीविज़न और अख़बारों में पेड न्यूज़ यानी पैसा देकर समाचार छपवाना लोकतंत्र और चुनाव के लिए एक बड़ा ख़तरा बनकार उभरा है. प्रेस काउंसिल और चुनाव आयोग ने भी इस पर चिंता जाहिर की है.

चुनाव आयोग ने इस बार पेड न्यूज़ और विज्ञापनों की निगरानी के लिए कमर कस ली है.

लेकिन उत्तर प्रदेश के मुख्य निर्वाचन अधिकारी उमेश सिन्हा कहते हैं कि जब तक चुनाव की औपचारिक घोषणा नहीं हो जाती, वे क़ानूनन इस संबंध में दख़ल नहीं दे सकते.

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