घर के दरवाज़े पर मिलेगा कंडोम

  • 25 अगस्त 2011
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भ्रष्टाचार, महंगाई, अमीरों-ग़रीबों के बीच बढ़ती खाई.....इन मु्द्दों की गूँज सत्ता के गलियारों से लेकर गली नुककड़ों पर लोगों के बीच अक्सर सुनाई दे जाती है. लेकिन जनसंख्या वृद्धि, परिवार नियोजन, प्रसव के दौरान माताओं और शिशुओं की मौत जैसे कई अहम मुद्दे आमतौर पर इस बहस में गौण रहते हैं.

इन समस्याओं से निपटने के लिए सरकार ने योजना बनाई है कि ग्रामीण इलाक़ों में लोगों के घर की दहलीज़ तक गर्भनिरोधक दवाएँ या कंडोम पहुँचाए जाएँ. बजाए इसके कि लोगों को बाहर निकलकर सार्वजनिक जगहों से लेने पड़ें. ये काम सरकार द्वारा प्रशिक्षित महिलाकर्मी करेंगी जिन्हें आशा के नाम से जाना जाता है.

फ़िलहाल इसे कुछ ज़िलों में लागू किया जाएगा. इस क्षेत्र में काम कर रहे ग़ैर सरकारी सगंठन फ़ैमली प्लैनिंग एसोसिएशन ऑफ़ इंडिया के महासचिव विश्वनाथ कोलिवाड कहते हैं कि ये योजना काफ़ी फ़ायदेमंद साबित हो सकती है.

वे कहते हैं, "अगर गाँववालों को घर पर गर्भनिरोधक दवाएँ या कंडोम मिल जाएँ तो ये बहुत अच्छा हो जाएगा. इसलिए क्योंकि तब लोगों को बाहर जाकर नहीं ख़रीदना पड़ेगा. ये कंडोम ऐसी महिलाकर्मियाँ देंगी जिन्हें लोग जानते हैं, उनके ही गाँव की हैं. इससे गाँववालों में हिचक कम होगी. ये महिलाकर्मी पूरी तरह प्रशिक्षित होंगी. लोगों को गर्भनिरोधक अपने घर के जितने नज़दीक मिले उतना ही अच्छा है."

लोगों में नहीं होगी हिचक

Image caption बाज़ार में कई तरह के गर्भनिरोधक दवाएँ उपलब्ध हैं

वहीं कुलवंत पश्चिम बंगाल में जलपाईगुड़ी ज़िले के दूर-दराज के गाँवों में पहले से ही ग़ैर सरकारी स्तर पर ये काम कर रहे हैं.वे बताते हैं कि कार्यकर्ताओं को गाँव में अनपढ़ता और गर्भनिरोधक अपनाने को लेकर स्वाभाविक हिचक समेत कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है.

कुलवंत कहते हैं, “गाँवों में लोग ज़्यादा पढ़े लिखे नहीं होते. समाज भी पुरुष प्रधान होता है जिसमें महिलाओं को कुछ भूमिका निभाने नहीं दी जाती. हमें पुरुषों को समझाना पड़ता है कि गर्भनिरोधक क्या होता है, इसके क्या फ़ायदे हो सकते हैं, क्यों परिवार नियोजन ज़रूरी है. हम ख़ुद जाकर उन्हें समझाते हैं जिसके बाद बहुत से लोग ये तरीके अपना रहे हैं.”

भारत की वर्तमान जनसंख्या 1.21 अरब है यानी चीन के बाद भारत की जनसंख्या दुनिया में सबसे ज़्यादा है. वहीं मातृ और शिशु मृत्यु दर भी काफ़ी ज़्यादा है.

संपन्न, स्वस्थ और ख़ुशहाल भारत हासिल करने के लिए भारत ने शताब्दी विकास लक्ष्य तय किए हुए हैं. लेकिन जनसंख्या वृद्धि दर को संतुलित किए बग़ैर और नवजात शिशु और माँ की सेहत का ख़्याल रखे बग़ैर स्वस्थ और ख़ुशहाल भारत की कल्पना अधूरी ही रहेगी.

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