एसपीओ की मौत पर विवाद

छत्तीसगढ़ में एसपीओ
Image caption सरकार सुप्रीम कोर्ट में हलफ़नामा दे चुकी है कि उसने एसपीओ से हथियार वापस ले लिए हैं.

छत्तीसगढ़ की सरकार उच्चतम न्यायलय में एक हलफ़नामा दाखिल कर कह चुकी है कि उसने नक्सल विरोधी अभियान में लगे विशेष पुलिस अधिकारी यानी के एसपीओ का विघटन कर उनसे हथियार ले लिए हैं.

मगर 19 अगस्त को राज्य के बीजापुर के भद्रकाली में हुए नक्सली हमले में जो 12 पुलिसकर्मी मारे गए थे उनमे एक एसपीओ भी शामिल था. मारे गए एसपीओ की शिनाख्त कुर्सम बसंत कुमार के रूप में की गयी है जो बीजापुर जिले के भद्रकाली थाने में तैनात था.

बसंत के मारे जाने ने राज्य में एक नया विवाद खड़ा कर दिया है.

विवाद

अब सामाजिक संगठन सवाल उठा रहे हैं कि जब सुप्रीम कोर्ट नें एसपीओ दस्ते और सलवा जुडूम के विघटन का आदेश दिया है तो फिर नक्सल विरोधी अभियान में किसी एसपीओ को कैसे रखा गया.

हालांकि पुलिस के आला अधिकारी कह रहे हैं कि बसंत के पास हथियार नहीं था और वह छुट्टी से लौट रहा था,मगर बसंत के घरवाले कहते हैं कि उसके पास हथियार था. अभी बसंत के घरवालों के दावों की पुष्टि नहीं हो पाई है क्योंकि राज्य सरकार का कहना है कि किसी एसपीओ के पास अब हथियार नहीं हैं.

21 अगस्त को छत्तीसगढ़ सरकार के वकील अतुल झा ने सुप्रीम कोर्ट में हलफ़नामा दाखिल कर आश्वासन दिया था कि इन सभी एसपीओ को पुलिस बल में शामिल कर लिया जाएगा. हलफ़नामे में कहा गया है कि सरकार सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पूरी तरह पालन कर रही है.

हलफ़नामा

हलफ़नामे में कहा गया है कि विशेष पुलिस अधिकारियों को दिये गए शस्त्र और गोला-बारूद सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद वापस ले लिए गए और उन्हें किसी नक्सल विरोधी अभियान में शामिल नहीं किया जा रहा है.

एसपीओ की मौत ने पुलिस के आला अधिकारियों और राज्य सरकार की परेशानी बढ़ा दी है.

सरकार इस घटना के बाद गहन चिंतन में लगी हुई है. यही वजह है कि आला अधिकारी एसपीओ की मौत के बारे में कुछ भी आधिकारिक रूप से बोलने को तैयार नहीं हैं.

अध्यादेश

अपनी दलील में सरकार अब कह रही है कि राज्य ने "छत्तीसगढ़ ऑक्जिलरी आर्म्ड पुलिस फोर्स ऑर्डिनेन्स" लागू कर दिया है.

सरकार का कहना है कि 28 जुलाई 2011 को अधिसूचित अध्यादेश के अनुसार, इसकी अधिसूचना की तारीख से छह माह की अवधि तक विशेष पुलिस अधिकारी के तौर पर काम करने वाले प्रत्येक व्यक्ति को "ऑक्जिलरी आर्म्ड पुलिस फोर्स" का सदस्य समझा जाएगा.

इसलिए अगर एसपीओ अब नक्सल विरोधी अभियान में शामिल भी हो रहे हैं तो वह बतौर "ऑक्जिलरी आर्म्ड पुलिस फोर्स" के सदस्य के रूप में शामिल हो रहे हैं ना कि एसपीओ के रूप में.

बहरहाल जहाँ एसपीओ की मौत ने एक बार फिर सामाजिक संगठनों के बीच बहस छेड़ दी हैं वहीं ऐसी खबरें भी हैं की सुप्रीम कोर्ट में सलवा जुडूम और एसपीओ के इस्तेमाल किए जाने पर याचिका दायर करने वाले सामजिक कार्यकर्ता अब अवमानना की याचिका दायर करने पर भी विचार कर रहे हैं.

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