'सामूहिक क़ब्रों की जांच हो'

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मानवाधिकार संगठन ह्यूमन राइट्स वॉच ने भारत-प्रशासित कश्मीर में सामूहिक क़ब्रों की पुष्टि करने वाली राज्य मानवाधिकार आयोग की रिपोर्ट पर स्वतंत्र जांच का आह्वान किया है.

ग़ौरतलब है कि पिछले हफ़्ते भारत-प्रशासित कश्मीर में राज्य मानवधिकार आयोग ने कहा है कि घाटी में 38 स्थानों पर 2,156 लोग सामूहिक क़ब्रों में दफ़न हैं.

पिछले 21 सालों में ये पहली बार है जब मानवधिकार संस्था ने सामूहिक क़ब्रों की मौजूदगी को स्वीकार किया है.

प्रशासन ने इन गुमनाम क़ब्रों को चरंपंथियों की क़ब्र बताया था. लेकिन मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का आरोप है कि भारतीय सुरक्षाबलों ने अलगाववादियों के ख़िलाफ़ अपनी मुहिम के तहत आम नागरिकों को अगवा कर उन्हें मौत के घाट उतार दिया.

साल 2008 में मानवधिकार संगठनों ने एक रिपोर्ट जारी कर कहा था कि उत्तरी कश्मीर में ऐसी दर्जनों सामूहिक क़ब्रे हैं जिनमें 2,800 लोग दफ़न है.

कश्मीर कोलिशन ऑफ़ सिविल सोसाइटी के ख़ुर्रम परवेज़ का कहना है कि अगर आयोग की रिपोर्ट पर ध्यान नहीं दिया गया तो वो अदालत का दरवाज़ा खटखटाएंगे.

पिछले दो दशकों में भारत प्रशासित कश्मीर में हज़ारों लोग ग़ायब हुए हैं और ग़ायब हुए लोगों के परिजनों की मांग है कि इन क़ब्रों की शिनाख़्त कर लोगों की पहचान की जाए.

आरोप-प्रत्यारोप

ह्यूमन राइट्स वॉच का कहना है कि भारतीय प्राधिकरण को इस मामले की स्वतंत्र, निष्पक्ष और विश्वसनीय जांच करनी चाहिए.

संगठन की दक्षिण एशिया क्षेत्र की निदेशक मीनाक्षी गांगुली ने कहा, “कई सालों से कश्मीरी निवासी अपने परिजनों के ग़ायब होने का शोक मना रहे हैं और उनकी कोई सुनवाई नहीं हुई है. सरकार और सेना का दावा था कि ग़ायब हुए लोग चरमपंथी गतिविधियों में भाग लेने पाकिस्तान गए हैं. लेकिन इन क़ब्रों से पता लगता है कि लोगों की सामूहिक हत्या की गई है. अधिकारियों को जल्द से जल्द हर मौत की जांच करनी चाहिए.”

साल 2003 में भारत प्रशासित कश्मीर के तत्कालीन मुख्यमंत्री मुफ़्ती मोहम्मद सईद ने कहा था कि 3,774 लोग राज्य से ग़ायब हुए हैं.

उनका कहना था कि साल 1990 से जो लोग ग़ायब हुए हैं, उनमें से कई पाकिस्तान में मौजूद थे, जहां वे चरमपंथी गतिविधियों में शामिल हो गए.

ह्यूमन राइट्स वॉच समेत कई दूसरे मानवाधिकार गुट इस मामले में बार-बार स्वतंत्र जांच की मांग कर चुके हैं.

इससे पहले ह्यूमन राइट्स वॉच ने मांग की थी कि सशस्त्र सेना विशेषाधिकार अधिनियम को भी राज्य से हटाया जाए.

इस अधिनियम के तहत सेना को अधिकार है कि वो बिना किसी वारंट के लोगों को ग़िरफ़्तार या गोली भी मार सकती है.

ह्यूमन राइट्स वॉच का कहना है कि ‘आफ़्सपा’ जैसा क़ानून मानव अधिकारों का हनन है और इसका धड़ल्ले से दुरुपयोग किया जाता है.

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