जो लड़ रहे हैं भ्रष्टाचार की ज़मीनी लड़ाई

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लोकपाल बिल के मुद्दे पर देशभर में छिड़ी बहस उन लोगों के बिना अधूरी है जिन्हें हम ‘व्हिसलब्लोअर’ के नाम से जानते हैं. ये वो लोग हैं जो अपनी जान पर खेल कर व्यवस्था में फैले भ्रष्टाचार की पोल खोल रहे और धांधलियों के खिलाफ़ बिगुल बजाने की हिम्मत रखते हैं.

सिटीज़न रिपोर्ट में इस हफ्ते पेश है ऐसे ही कुछ लोगों की ज़बानी भ्रष्टाचार के खिलाफ़ संघर्ष की उनकी अपनी कहानी.

''मेरा नाम जयश्री विजयकुमार है और मैं बंगलौर की रहने वाली हूं. मैं एक आरटीआई कार्यकर्ता हूं और मेरे पति एक व्हिसलब्लोअर हैं. नैं आपको बताना चाहती हूं भ्रष्टाचार के खिलाफ़ मेरे पति की लड़ाई ने किस तरह मुझे एक आम गृहणी से सक्रीय आरटीआई कार्यकर्ता बना दिया.

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1981में मेरे पति ने एक आईएएस अधिकारी के रुप में अपना कार्यभार संभाला. नौकरी के पहले दिन हर नौकरशाह जिस ईमानदारी और सतर्कता की शपथ लेता है उसी जिम्मेदारी को निभाते हुए मेरे पति एमएन विजयकुमार, जहां भी गए भ्रष्टाचार के खिलाफआवाज़ बुलंद करते रहे.

उन्होंने अपने विभाग में फैले भ्रष्टाचार और भ्रष्ट अफसरों के खिलाफ़ राज्य सरकार को एक रिपोर्ट सौंपी. लेकिन वो रिपोर्ट आखिरकार उन्हीं अफ़सरों तक पहुंचा दी गई जिनके खिलाफ़ शिकायत की गई थी.

यही नहीं कुछ समय बाद हमें जानकारी दी गई ये रिपोर्ट और इस मामले में की गई जांच संबंधी फ़ाइल दफ़्तर से गायब हो गई है.इस लड़ाई के दौरान हम पर कई जानलेवा हमले भी हुए. यहां तक कि पुलिस सुरक्षा के दौरान भी हमें निशाना बनाया गया. लेकिन कई शिकायतों के बाद भी हमें कहीं से कोई मदद नहीं मिली.

सरकारी अफसर होने के नाते मेरे न मीडिया से अपनी बात कह सकते थे और न ही भ्रष्टाचार संबंधी ये जानकारियां सार्वजनिक कर सकते.

इसके बाद मैंने एक बेवसाइट के ज़रिए ये सभी जानकारियां लोगों तक पहुंचाने का बीड़ा उठाया ताकि हमारे साथ कोई अनहोनी होने पर संबंधित लोगों से आम लोग कोई सवाल-जवाब तो किया जाए. तब से आज तक अपने पति का सुरक्षा और देश हित में मेरी लड़ाई लगातार जारी है.

मुंबई की सुमैरा अब्दुलअली की कहानी भी लापरवाह व्यवस्था की कुछ ऐसी ही तस्वीर बयां करती है.

''मेरा नाम सुमैरा अब्दुलअली है और मैं पिछले कई सालों से महाराष्ट्र और उसके आसपास नदियों से रेत के अवैध खनन का मामला उठा रही हूं.

साल 2004 में मैंने और मेरे कुछ साथियों ने मिलकर मुंबई और उसके आसपास ऐसी कुछ जगहों पर छापे मारे जहा अवैध खनन की जगहों नदियों के रेत माफिया की ओर से मुझपर जानलेवा हमला कराया गया.''

सुमैरा अब लगातार एक दोहरी लड़ाई लड़ रही हैं. अपनी जान जोखिम में डालकर वो रेत माफ़िया के खिलाफ सबूत इक्कठा कर रही हैं और उनपर कार्रवाई के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगा रही हैं.

सुमैरा की तरह तपल गनेश ने भी बेल्लारी में धड़ल्ले से हो रहे अवैध खनन का मामला उठाया और प्रशासन को कई गोपनीय जानकारियां दीं.

''मेरा नाम तपल गनेश और मैं बेल्लारी में रहता हूं. बेल्लारी में हो रहे अवैध खनन को लेकर मैंने स्थानीय प्रशासन सहित राज्य सरकार को कई महत्वपूर्ण जानकारियां दीं, लेकिन इसके बाद मुझ पर कई हमले हुए और झूठे मामलों में फंसाने की कोशिश की गई. जो लोग गलत काम कर रहे हैं उन्हें बचाने की कोशिश की जा रही है लेकिन मुझ जैसे लोगों की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी आखिर किस पर है ये कोई नहीं बताता.''

सवाल ये है कि भारत में भ्रष्टाचार और धांधलियों के ख़िलाफ आवाज़ उठाना क्या एक जानलेवा सौदा है. भोपाल में पिछले हफ्ते आरटीआई कार्यकर्ता शाएला मसूद की कथित हत्या को उनके सहयोगी गोपाल कृष्ण कुछ ऐसा ही मानते हैं.

गोपाल कहते हैं, ''शाएला मसूद के साथ मेरी भागीदारी छतरपुर में हीरे के अवैध खनन का मामला उठाने और पन्ना टाईगर रिज़र्व में टाइगर्स की घटती संख्या से जुड़े खुलासों को लेकर था. शाएला ने इस मामले में कुछ आरटीआई दाखिल की थीं और पर्यावरण मंत्री जयंती नटराजन को पत्र भी लिखे थे. इन आरटीआई के संबंध में कुछ रिकार्डिंग्स भी उनके पास थीं. मुझे लगता है कि ये आरटीआई भी उनका हत्या की एक वजह हो सकती हैं.''

भ्रष्टाचार पर हंगामा हर तरफ है लेकिन वरिष्ठ पत्रकार हरतोष बल मानते हैं कि भ्रष्टाचार से लड़ रहे इन निहत्थे सिपाहियों की सुरक्षा का मुद्दा असल में कहीं पीछे छूट गया है.

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