'अन्ना की टीम में मुसलमान क्यों नहीं'

  • 26 अगस्त 2011
अन्ना हज़ारे इमेज कॉपीरइट Reuters

अन्ना हज़ारे के आंदोलन के आठवें-नौवे दिन से धीरे-धीरे कई मुसलमान बुद्धिजीवियों और धार्मिक नेताओं ने इस आंदोलन की धर्मनिरपेक्षता पर सवाल उठाए.

अन्ना के आंदोलन स्थल रामलीला मैदान से कुछ ही दूर पर पुरानी दरियागंज में एक बैनर पेंटिंग की दुकान चलने वाले सरफ़राज़ अली अन्ना हज़ारे के आंदोलन को हिंदू-मुसलमान से जोड़ कर नहीं देखना चाहते.

अली कहते हैं, "हज़ारे के आंदोलन का विरोध केवल वही कर रहे हैं, जो डरते हैं कि लोकपाल से उनके चेहरे बेनकाब हो जाएँगें."

लेकिन कुछ ही दूर पर बैठे दिल्ली के हस्तशिल्प कारीगर अबरार हाशमी अन्ना के आंदोलन को शक की निगाह से देखते हैं.

सवाल

बात करने पर अबरार हाशमी सवाल उठाते हैं,"अन्ना हज़ारे के चारों ओर मौजूद चेहरों में किसी मुसलमान का चेहरा क्यों शामिल नहीं है."

हाशमी मानते हैं कि जिस चीज़ के लिए अन्ना लड़ रहे हैं वो सही है लेकिन हाशमी का मानना है की अन्ना को सभी धर्म और संप्रदाय के लोगों को अपने साथ लेकर आगे बढ़ना चाहिए तभी उनका आंदोलन सही मायनों में सबका प्रतिनिधित्व कर सकेगा और सफल होगा.

हाशमी ज़ोर देकर कहते हैं कि बहुत से मुसलमान उनकी ही तरह आशंकित हैं, इसलिए रामलीला मैदान में मुसलमान लोगों की तादाद कम दिख रही है.

लेकिन पुरानी दिल्ली ही में फ़र्नीचर का व्यवसाय करने वाले मोहम्मद शकील हाशमी की बात से सहमत नहीं है. शकील रामलीला मैदान में मुसलामानों की कम मौजूदगी का कारण रमजान को बताते हैं.

शकील कहते हैं, "मुसलमान इस समय रमज़ान और रोज़ों के कारण इस आंदोलन में मैदान में आ कर साथ नहीं दे पा रहा है, लेकिन ईद के बाद मुसलमान बड़ी तादाद में रामलीला मैदान पहुँच कर अपनी मौजूदगी का अहसास कराएँगें."

शकील इस बात के भी ख़िलाफ़ हैं कि जब तक लोकपाल बिल पास नहीं हो जाता, अन्ना हज़ारे को अपना अनशन तोड़ देना चाहिए. वो सरकार को बिल्कुल भरोसे के क़ाबिल नहीं मानते.

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