सिर्फ़ नैतिक जीत भर ही !

अन्ना हज़ारे इमेज कॉपीरइट Reuters

अन्ना के अनशन तोड़ देने के बाद की स्थिति का आकलन किया जाए तो यह साफ़ है कि इस पूरे मामले में अन्ना सिर्फ़ नैतिक जीत ही दर्ज कर पाए हैं.

यह सोचना बहुत बड़ी ग़लतफ़हमी होगी कि सरकार ने अन्ना की सभी माँगें मान ली हैं. संसद के प्रस्ताव में सिर्फ़ निचली नौकरशाही और राज्यों में लोकायुक्त की नियुक्ति को लोकपाल के अंतर्गत लाने की बात सिद्धांत रूप से स्वीकार की गई है.

इन सभी मुद्दों पर अंतिम निर्णय स्थायी समिति पर छोड़ दिया गया है जो सभी सुझावों का विश्लेषण करेगी और यह भी तय करेगी कि वे कितने व्यावहारिक हैं.

यह भी साफ़ है कि संसद ने सरकार के उस मूल तर्क को बरक़रार रखा है कि क़ानून बनाने में संसद की भूमिका सर्वोपरि है और उस पर सवाल नहीं उठाए जा सकते.

शंकाएँ क़ायम

यह साफ़ है कि टीम अन्ना अपनी मूल माँगों में से कुछ ही को सरकार से मनवा पाने में सफल हो पाई है और वह भी कई अगर और मगर के साथ.

शनिवार को संसद में दिन भर चली बहस के बाद डीएमके, बहुजन समाज पार्टी, मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, समाजवादी पार्टी और

बीजू जनता दल ने यह साफ़ कर दिया कि लोकायुक्त की नियुक्ति में संसद की भूमिका नहीं होनी चाहिए क्योंकि इससे राज्यों की स्वायत्तता प्रभावित होगी.

इनमें से कुछ दलों ने ऐसे किसी क़दम के विरोध करने की मंशा भी साफ़ कर दी. निचली नौकरशाही को भी लोकपाल के अंतर्गत लाने की बात कांग्रेस ने स्वीकार तो की लेकिन यह भी कहा कि इसके लिए क़ानूनी और संस्थागत ढाँचे में मूलभूत परिवर्तन अभी किया जाना है.

यह बताता है कि इस माँग के बारे में कांग्रेस की अपनी शंकाएं हैं, हाँलाकि वह संसद के प्रस्ताव में प्रतिबिंबित नहीं हुई हैं.

सांसदों ने जन लोकपाल बिल की कई महत्वपूर्ण धाराओं को पूरे तौर पर अस्वीकार कर दिया है और कई पर अपनी शंकाएं ज़ाहिर की हैं.

मसलन संसद के अंदर सांसद के व्यवहार को लोकपाल के कार्य क्षेत्र में लाने का भाजपा सांसदों सहित हर सांसद ने विरोध किया है.

ज़ोर

इमेज कॉपीरइट AP
Image caption केंद्र सरकार को अभी कई मोर्चे पर काम करना है

अधिकतर दलों ने न्यायपालिका को भी इसके दायरे में लाने का विरोध किया है. हाँ, कुछ दलों ने इसके बदले राष्ट्रीय न्यायिक आयोग बनाए जाने की वकालत ज़रूर की है और कुछ ने मज़बूत जवाबदेही विधेयक लाने पर ज़ोर दिया है.

प्रधानमंत्री को भी इसमें शामिल किए जाने के मुद्दे पर सरकार ने कोई वचन नहीं दिया है. हालाँकि भाजपा समेत कई दलों ने कुछ ऐहतियात के साथ प्रधानमंत्री को भी इसमें शामिल किए जाने का समर्थन किया है.

दो और महत्वपूर्ण माँगों, सीबीआई की भ्रष्टाचार विरोधी इकाई को लोकपाल के अंतर्गत लाने और भ्रष्ट नौकरशाहों को बर्ख़ास्त किए जाने के तरीक़े पर अंतिम निर्णय स्थायी समिति ही लेगी.

अन्ना समर्थकों ने शायद समय से पहले ही विजय घोष कर दिया है. वह भ्रष्टाचार के मुद्दे को केंद्र बिंदु में लाने में सफल ज़रूर हुए हैं लेकिन अभी जनलोकपाल विधेयक को क़ानून बनने में कई और झंझावातों का सामना करना पड़ेगा.

अन्ना का यह कथन बिल्कुल वास्तविकता से दूर नहीं है कि यह जीत अभी अधूरी जीत है.

संबंधित समाचार