वर्तमान लोकायुक्तों की भूमिका और लोकपाल बिल से उम्मीदें

  • 29 अगस्त 2011
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संसद ने भले ही अन्ना हज़ारे की इस मांग को स्वीकृति दे दी हो कि भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए केंद्रीय स्तर पर लोकपाल के गठन के साथ साथ सभी राज्यों में लोकायुक्त की नियुक्ति होनी चाहिए. लेकिन भारत में कुछ राज्यों में पहले से ही लोकायुक्त मौजूद है, तो फिर नए प्रावधान की ज़रूरत क्यों?

भारत में कुछ राज्यों में लोकायुक्त मौजूद होने के बावजूद उन राज्यों में भ्रष्टाचार पूरी तरह मिट नहीं पाया है. ऐसे में क्या गारंटी है कि लोकपाल के गठन के बाद भ्रष्टाचार का खात्मा हो पाएगा?

इस सवाल का जवाब ढूंढने से पहले आइए नज़र डालते हैं भारत के कुछ राज्यों में मौजूद लोकायुक्तों के प्रारूप पर और इस पहलू पर कि आख़िर कितनी प्रभावशाली है ये संस्था भ्रष्टाचार से लड़ने में.

भारत में लोकायुक्त कोई केंद्रीय संस्था नहीं है. राज्य स्तर पर ही इसे मान्यता दी गई है और वो भी सभी 28 राज्यों में नहीं, बल्कि 18 राज्यों में ही.

ऐसा इसलिए क्योंकि किसी भी राज्य पर संवैधानिक रूप से कोई बाध्यता नहीं है कि वो भ्रष्टाचार की जांच के लिए लोकायुक्त की नियुक्ति करे.

महज़ औपचारिकता या सशक्त हथियार?

बिहार की बात की जाए, तो वहां के पूर्व लोकायुक्त जस्टिस राम नंदन प्रसाद का कहना है कि लोकायुक्त अधिनियम में बदलाव कर उसे ज़्यादा अधिकार दिए जाने चाहिए.

बिहार लोकायुक्त मुख्यमंत्री के अलावा सभी मंत्रियों और सरकारी अधिकारियों की जांच कर सकता है, लेकिन अधिकारियों का कहना है कि ये नाकाफ़ी है.

बीबीसी के बिहार संवाददाता मणिकांत ठाकुर का कहना है कि लोकायुक्त के समक्ष दस हज़ार से ज़्यादा मामले लंबित हैं.

लेकिन अन्ना के आंदोलन के बाद बिहार मुख्यमंत्री नितीश कुमार ने कहा है कि लोकायुक्त अधिनियम में बदलाव कर मुख्यमंत्री पद को भी लोकायुक्त के दायरे में लाया जाएगा.

उत्तर प्रदेश की जहां तक बात है, तो वहां भी लोकायुक्त अपने अधिकारों से ख़ासे संतुष्ट नहीं हैं.

राज्य लोकायुक्त का कहना है कि उनके अधिकारों का जब तक कोई महत्व नहीं है, जब तक उनके पास स्वतः संज्ञान लेने का अधिकार न हो.

हालांकि हाल ही में राज्य मंत्री अवध पाल सिंह यादव को लोकायुक्त ने भ्रष्टाचार का दोषी पाया था, जिसके बाद उन्हें इस्तीफ़ा देना पड़ा था.

बीबीसी के उत्तर प्रदेश संवाददाता रामदत्त त्रिपाठी का कहना है कि लोकायुक्त के दायरे में मुख्यमंत्री के न होने से उनके अधीन विभागों के अधिकारियों को लगता है कि उन पर कोई आंच नहीं आ सकती.

स्वाभाविक है कि ऐसे में राज्य में सूचना अधिकार को लोग लोकायुक्त से ज़्यादा महत्तव देते हैं.

कुछ यही हाल छत्तीसगढ़ में भी है, जहां लोकायुक्त को केवल निचले स्तर के अधिकारियों के ख़िलाफ़ जांच का अधिकार है.

Image caption कर्नाटक लोकायुक्त संतोष हेगड़े की जांच रिपोर्ट ने मुख्यमंत्री येडयुरप्पा को सत्ता त्यागने पर मजबूर कर दिया था.

लेकिन फिर कर्नाटक और मध्य प्रदेश जैसे उदाहरण भी हैं, जहां लोकायुक्त की मज़बूती की मिसाल दी जाती है.

कर्नाटक लोकायुक्त संतोष हेगड़े की अवैध खनन पर जांच की वजह से मुख्यमंत्री येडयुरप्पा को हाल ही में इस्तीफ़ा देना पड़ा था.

दरअसल कर्नाटक में लोकायुक्त को सशक्त बनाने के लिए राज्य भ्रष्टाचार निरोधी ब्यूरो और लोकायुक्त मिल कर भ्रष्टाचार के मामलों की जांच करते हैं.

हाल ही में गुजरात में राज्यपाल ने अप्रत्याशित कदम उठाते हुए राज्य सरकार की सलाह के बिना ही लोकायुक्त की नियुक्ति कर डाली.

गुजरात में पिछले सात सालों से लोकायुक्त का पद खाली था. अब नरेंद्र मोदी ने राज्यपाल के इस फ़ैसले को कोर्ट में चुनौती दे दी है.

नए लोकपाल से उम्मीद?

लोकायुक्त किसी मामले में जांच करने के बाद राज्यपाल को केवल अपने सुझाव दे सकता है, लेकिन उस जांच में दोषी पाए जाने के ख़िलाफ़ कार्रवाई करना उसके अधिकार क्षेत्र में नहीं आता.

जहां कई राज्यों में लोकायुक्त के पास मुख्यमंत्री से लेकर वरिष्ठ सरकारी अधिकारी और निचले स्तर के अधिकारियों के ख़िलाफ़ जांच करने का अधिकार होता है, वहीं कुछ राज्यों में लोकायुक्त का गठन महज़ एक औपचारिकता भर बन कर रह गया है जिसे केवल निचले स्तर के अधिकारियों के ख़िलाफ़ जांच करने का अधिकार है.

तो ऐसे में सवाल उठता है कि क्या राज्य प्रशासन के सामने लोकायुक्त के हाथ बंधे हुए हैं?

अगर ऐसा है, तो क्या अन्ना टीम द्वारा सुझाया गया विकल्प भ्रष्टाचार से लड़ने का मज़बूत हथियार है?

लोक सभा के पूर्व महासचिव और संविधान विशेषज्ञ सुभाष कश्यप का कहना है कि लोकपाल में सभी शक्तियों को केंद्रित करना कोई समाधान नहीं होगा.

बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा, “किसी भी संस्था को इतना शक्तिशाली नहीं बनाना चाहिए कि उसके निरंकुश होने का ख़तरा पैदा हो जाए. अन्ना विकेंद्रीकरण की बात करते हैं, लेकिन मेरे विचार में एक लोकपाल संस्था में ही सत्ता केंद्रित नहीं होनी चाहिए. राज्य स्तर के भ्रष्टाचार की राज्य स्तर पर ही जांच होनी चाहिए, पंचायत भ्रष्टाचार की जांच ग्राम सभा में और केंद्रीय स्तर के भ्रष्टाचार की जांच केंद्र द्वारा की जानी चाहिए. लोकपाल का गठन इन सभी स्तरों पर होना चाहिए, ताकि प्रभावशाली रूप से हर स्तर के भ्रष्टाचार को मिटाया जा सके.”

लोकपाल पर संदेह जताते हुए सुभाष कश्यप ने कहा कि इस बात की कोई गारंटी नहीं कि आने वाली नई लोकायुक्त संस्था ख़ुद ही भ्रष्ट हो जाए.

उन्होंने कहा, “केंद्रीय लोकपाल संस्था में भी वही नौकरशाह नियुक्त किए जाएंगें, जिनसे वर्तमान सरकारी प्रणाली बनती है. ऐसे में ये सुनिश्चित करना मुश्किल होगा कि वे सभी अधिकारी ईमानदार हों. आख़िर वे नौकरशाह आसमान से थोड़े ही उतरेंगें? आएंगें तो वे हमारे वर्तमान समाज से ही न?”

वर्तमान लोकायुक्त या संभवतः आने वाली नई लोकपाल संस्था का प्रारूप जो भी हो, विशेषज्ञों का कहना है कि महज़ क़ानून बना देने से भ्रष्टाचार का सामना नहीं किया जा सकता.

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