'कमेटी आ गई, भागो'....

मैं आपसे बात ज़रुर करूँगा लेकिन इस शर्त पर कि आप न तो मेरा नाम, न मेरी दुकान का पता और न ही मेरी फोटो छापोगे.

आप देख ही रहे हो कि इस पेड़ के नीचे खाने के सामान की दुकान लगाता हूँ.छोले-भटूरे, कढ़ी-चावल, ब्रेड-पकौड़े और समोसे बेचता हूँ.

पंद्रह साल हो गए इसी जगह, इसी पटरी पर रेहड़ी लगाते हुए. पहले बाप लगाते थे और अब मैं लगाता हूँ.

अब क्या बताऊँ आपको, रोज़ी पर बैठा हूँ इसलिए ग़लत नही बोलूँगा.

पढ़ें 'भ्रष्टाचार से सामना' श्रृँखला की पहली कड़ी

दोतरफ़ा मार

पुलिस को हर महीने पाँच सौ से हज़ार रूपए देता हूँ.और इतने ही करीब नगर निगम वाले ले जाते हैं. मतलब एक दुकान के लिए दो-दो जगह पैसे

तरीक़ा ये होता है कि एरिया इंस्पेक्टर अपना एक बंदा हमारे पास भेजता है, उससे हम कहते हैं कि इतना पैसा देंगे और इसके बाद वो ओके करता है.

हर महीने की दस तारीख़ को उनका बंदा आता है और पैसा ले जाता है.

दिक़्कत तब होती है जब इलाके के पुराने अफ़सर की जगह नया आदमी आ जाता है. नया अफ़सर नया बंदा भेजता है , उसके रेट भी ज़्यादा होते हैं.

कभी- कभी तो ऐसा भी होता है कि जो आदमी पैसे ले जाता है उसका ट्रांसफ़र हो जाता है तो नया बंदा भी आकर पैसे माँगता है, इससे एक महीने के भीतर दो-दो बार पैसे देने पड़ते हैं.

अगर बात इतनी ही होती भी ठीक था,पैसे देने के बाद भी कमेटी वाले कभी भी आ धमकते हैं.

अचानक भगदड़ मचती है और हम सभी रेहड़ी पटरी वालों को सिर पर सामान ढोकर भागना पड़ता है.

हालाँकि ये ज़रूरी नहीं है कि सभी बच जाएँ. कुछ लोग अपना सामान अगल-बगल की दुकानों में छिपा देते हैं. जो नहीं छिपा पाते उनका सामान नगर-निगम की कमेटी वाले ले जाते हैं.

जुर्माना

कभी भटूरे का भगौना तो कभी चावल या कभी कभी पूरी ही दुकान. इसके बाद वो जुर्माना लगाते हैं और जुर्माना भरने के बाद ही हम अपना सामान वापस ले पाते हैं.

कभी कभी जुर्माने की रक़म माल की कीमत से ज़्यादा होती है तो हम अपना सामान लेने भी नहीं जाते.

ऐसा इसलिए होता है क्योंकि इन्हें भी अपनी फ़ाईलों में ये दिखाना होता है कि कितनी बार छापे डाले और क्या क्या बरामद हुआ.

लेकिन ये कमेटी वाले हमें भगा ज़रूर सकते हैं पर हाथ नहीं लगा सकते.

ये तो वही बात हुई कि दुकान लगाने के पैसे भी दो और उसके बावजूद भागते फिरो. लेकिन दिन बीत जाते हैं. अगले दिन हम फिर से इसी जगह पर अपनी दुकान लगा लेते हैं.

26 जनवरी , 15 अगस्त या फिर ऐसे किसी दिन जब पुलिस की गश्त ज़्यादा होती है तो हम दुकान नहीं लगाते,हमें बता दिया जाता है कि कल दुकान नही लगाना .

हालाँकि कुछ सोसाईटी वाले हैं जो हम लोगों की मदद के लिए काम कर रहे हैं ताकि हमें एक ठिकाना मिल जाए अपनी दुकान लगाने के लिए और हमें रोज़-रोज़ इधर उधर भागना न पड़े और घूस न देनी पड़े.

हमने किया ही क्या है? जबसे होश संभाला है, जबसे दुकान लगाई है, लोगों की जेबें ही भरते आ रहे हैं.

अशोक कुमार की आप बीती बीबीसी संवाददाता मोहन लाल शर्मा से की गई बातचीत पर आधारित है.अगली कड़ी में आप पढ़ेंगे अमित वर्मा की कहानी 'कुछ चाय- पानी हो जाए'..

('भ्रष्टाचार से सामना' श्रृँखला की दूसरी कड़ी में आपबीती सुनाने वाले इस व्यक्ति की पहचान गोपनीय रखते हुए हमने इनका नाम बदल दिया है.)

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