भ्रष्टाचार से सामना...

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सवाल ये है कि आख़िर क्यों भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ अन्ना हज़ारे के आंदोलन में लाखों की तादाद में आम आदमी सड़क पर उतर आये ... जवाब बेहद सीधा और स्पष्ट है कि वो भ्रष्टाचार से त्रस्त है.

ये भ्रष्टाचार रिश्वत की शक्ल में हो सकता है. उपहारों का चोला ओढ़ सकता है या फिर किसी और रूप में सामने आ सकता है.

'भ्रष्टाचार से सामना' श्रृँखला के तहत अगले कुछ दिनों तक हम आपकी मुलाकात कुछ ऐसे आम लोगों से करवाएंगे जिन्होनें अपने कामों को करवाने के लिए रिश्वत दी.

चाहे ग़रीब हो या मध्यम वर्ग , जो आते तो हैं अलग- अलग क्षेत्रों से पर उनकी पीड़ा एक ही है.

पहली कड़ी मे ऐसे ही एक व्यक्ति विकास कुमार की आपबीती.

पेशे से बिल्डर हूँ .लगभग पिछले आठ सालों से मैं निर्माण क्षेत्र यानि कंस्ट्रक्शन बिज़नेस में काम कर रहा हूँ.

इस क्षेत्र के बारे में कहा जाता है कि यहाँ बिना घूस दिये कोई काम हो ही नही सकता.तकनीकि भाषा में यहाँ इसे सुविधा शुल्क कहा जाता है.

हाँलाकि पैसे पहले भी दिए जाते रहे हैं पर इधर चार पाँच सालों में मैने पाया कि अब सब कुछ फिक्स हो गया है. कोई मोल तोल नही. अगर नक्शा पास कराना है तो इतने पैसे ..अगर रजिस्ट्री करानी है तो इतने पैसे..

हमें मालूम है कि कब कहाँ और किसे कितने पैसे देने पडेंगे.

2004 में हमने उ.प्र. के गाज़ियाबाद ज़िले में एक नए प्रोजेक्ट पर काम करना शुरू किया. ये एक बहुमंज़िली इमारत की योजना थी.

निविदाओं के आधार पर विकास प्राधिकरण से भूखंड का आबंटन तो हो गया यानि ज़मीन तो मिल गई, पर इसके आगे की कहानी तो अभी शुरू होनी बाकी थी.

सुविधा शुल्क के नाम पर

हम नक्शा लेकर विकास प्राधिकरण के दफ़्तर पहुँचे तो नक्शा पास कराने के लिए सुविधा शुल्क की माँग की गई, हमने इसे तत्काल मुहैया कराया.

निर्माण का काम शुरु हुआ, जिस दिन पहली मंज़िल की छत पड़नी थी, उस दिन प्राधिकरण के लोग दल बल समेत आ धमके.

सारे मज़दूरों से उन्होंने काम बंद करने को कहा. भला मज़दूर क्या कर सकते थे? काम छोड़कर सब नीचे आ गए.

इस तरह की घटनाएं एक बार नही बार बार होती रहीं. उनका सीधा सा हिसाब है एक मंज़िल की छत का पैसा मिलने के बाद जब तक दूसरी का पैसा नही मिलेगा तब तक वो नही डलेगी.

कई बार तो एसा भी हुआ कि कंक्रीट की जो गाडियां खड़ी थी इसलिए वापस कर दी गईं क्योंकि प्राधिकरण के जिस अधिकारी को पैसा पहुँचाना था उसने पैसा बढ़ा दिया,उन्होंने कहा कि या तो उतना पैसा दो,या काम बंद कर दो. वरना हम नोटिस जारी करेंगे.

पैसे की बंदरबाँट

जब बिल्डिग पूरी बन गई तब हमें उसकी कंपाउडिंग करनी थी, नियमानुसार उसकी एक फ़ीस होती है.

अधिकारी जो कंपाउडिंग करते हैं उन्होंने तय किया कि इसके लिए प्रति एकड़ 40 लाख देने होंगे.अगर प्रोजेक्ट तीन एकड़ का है तो आप एक करोड़ 20 लाख देकर जाएंगे, तभी उसकी कंपाउडिंग होगी वरना नही.

हमने कहा कि हमने नियमानुसार ही बिल्डिंग बनाई है, उनका कहना था कि जब फ़ाइल हमारे पास आई है तो जब तक एक करोड़ 20 लाख रूपये आप नही दे देते तब तक आपकी फ़ाइल स्वीकृत नही होगी, फ़ाइल उठाकर ले जाइए.

जब समझौता करने की कोशिश करो तो कहते हैं कि उन पर भी ऊपर से इतना प्रेशर है कि कुछ नही किया जा सकता.

इस व्यवसाय में ऊपर से नीचे तक इतने पेंच है कि कोई भी बिना पैसा दिए धेले भर का काम भी नही करा सकता.

जहाँ तक पैसे की बंदरबाँट का सवाल है ये एक ऐसी श्रृँखला है जिसमें ऊपर से नीचे तक सबके हिस्से हैं, कहा तो ये भी जाता है कि पैसा नेताओं तक भी जाता है.

अधिकारियों को मालूम है कि ये पैसा नही देगा तो जाएगा कहाँ, इसलिए सबकुछ खुले आम जारी है.

('भ्रष्टाचार से सामना' श्रृँखला में आपबीती सुनाने वाले इस व्यक्ति की पहचान गोपनीय रखते हुए हमने इनका नाम बदल दिया है. ताकि भविष्य में इन्हें इस स्वीकारोक्ति का ख़ामियाज़ा न भुगतना पड़े.)

अगली कड़ी में आप पढ़ेंगे, दिल्ली के फुटपाथ पर छोले-भटूरे बेचने वाले अशोक कुमार की आपबीती.. 'कमेटी आ गई, भागो'...

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