पैदल यात्रियों की नहीं है पूछ

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किसी देश का ताना बना समझना हो तो इसकी दौड़ती-भागती सड़कों पर खड़े होकर बहुत सी बारिकियाँ समझी जा सकती हैं.

दिल्ली के व्यस्त इलाक़े कनॉट प्लेस की एक सड़क पर खड़े होकर मैने यही समझने की कोशिश की. केवल दस-पंद्रह मिनट में ही एक बात समझ आ गई कि यहाँ सड़कों पर पैदल चलने वालों की ज़्यादा पूछ नहीं है.

कुछ दिन पहले ही ‘क्लीन एयर इनिशिएटिव फ़ॉर एशियन सिटीज़’ संस्था ने भारत के छह शहरों में सर्वे किया है.

मकसद या जानना था कि पैदल चलने के हिसाब से ये शहर कितने अच्छे और सुरक्षित हैं...जैसे सड़क पार करने के लिए क्रासिंग है, फ़ुटपाथ सही लंबाई और ऊँचाई का है, विकलांग लोगों के लिए कितनी सुविधाएँ हैं, महिलाएँ कितनी सुरक्षित महसूस करती हैं.

हैरानी की बात नहीं कि अन्य एशियाई शहरों की तुलना में भारतीय शहर काफ़ी पीछे हैं.

संस्था से जुड़ा पार्थो बासु कहते हैं, “हम लोगों ने सर्वे तो केवल छह शहरों में किया है लेकिन औसतन पूरे भारत का स्कोर बहुत ख़राब है. वो इलाक़े जहाँ भारी यातायात भी है और पैदल यात्रियों को भी वहीं से चलना होता है, उन जगहों पर तो वॉकेबिलिटी इंडेक्स (पैदल चलने की स्थिति का सूचकांक) बेहद कम है.”

हम भी हैं सड़क पर

पुणे को वॉकेबिलिटी इंडेक्स में 100 में 54 अंक दिए गए हैं और वो नंबर एक है. जबकि बड़ा मेट्रो शहर चेन्नई छह शहरों में सबसे नीचे है. उसे 40 नंबर दिए गए हैं.

सही और अच्छे फ़ुटपाथ होना केवल पैदल यात्रियों की सुरक्षा का ही मुद्दा नहीं है बल्कि इससे कई और आर्थिक और सामाजिक पहलू भी जुड़े हुए हैं.

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Image caption मोटर गाड़ियों की बढ़ती संख्या के साथ सड़क दुर्घटनाएँ भी बढ़ रही हैं

पिछले कुछ वर्षों में गाँवों से शहर आकर बसने और सड़क किनारे अपनी छोटी-मोटी दुकान चलाने वालों की संख्या बढ़ी है. इन फेरीवालों को वक़्त-बेवक़्त हटा दिया जाता है.

पार्थो बासु कहते हैं कि राजकोट और सूरत जैसे शहरों में पाया गया कि इन खोमचों के कारण लोग फ़ुटपाथ पर चलने में ज़्यादा सहज और सुरक्षित महसूस करते हैं, ख़ासकर महिलाएँ... क्योंकि खोमचों से रोशनी आती है और इलाक़ा सुनसान नहीं होता.

वे कहते हैं, “फ़ुटपाथों को लेकर समग्र नीति बनाने की ज़रूरत है. संतुलित नीति में इन खोमचे वालों की भी जगह मिल सकेगी क्योंकि पैदल यात्रियों को भी इनकी ज़रूरत है. हर कोई तो खाने के लिए होटल नहीं जा सकता. फ़ुटपाथ किनारे ठेले भी ज़रूरी हैं.”

शहरों में वाहनों की संख्या भी लगातार बढ़ रही है और सड़क दुर्घटनाओं का दर भी.

पैदल यात्रियों के लिए सही सुविधा होने से वे सड़कों पर ग़लत तरीके से चलते हैं जिससे वाहन चालकों को भी दिक्कत होती है.

लेकिन अगर सड़कों, गलियों को पदयात्रियों के हिसाब से और बेहतर बनाया जाए तो एक साथ कई समस्याओं का निपटारा हो सकता है....पैदल चलने भी ख़ुश और गाड़ी वाले भी बिना दिक्कत के गाड़ी चला सकते हैं.

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