सेन का इस्तीफ़ा या हटाए जाएँगे?

  • 3 सितंबर 2011
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कलकत्ता उच्च न्यायालय के न्यायाधीश सौमित्र सेन को हटाए जाने का प्रस्ताव राज्यसभा में पारित हो जाने के बाद और लोकसभा में इस विषय पर चर्चा होने से पहले उनके इस्तीफ़े से एक नई क़ानूनी बहस शुरु हो गई है.

उनके इस्तीफ़े से पहले ये तय हो चुका था कि पाँच सितंबर को लोकसभा में इस पर चर्चा होगी.

अब सवाल ये उठ खड़ा हुआ है कि इस्तीफ़े के बाद क्या अब लोकसभा में इस पर चर्चा होगी और मतदान होगा?

अटॉर्नी जनरल जीई वाहनवती ने उन्हें हटाने की प्रकिया न रोकने की सिफ़ारिश की है. उनका कहना है कि मौजूदा सत्र में ही इस प्रस्ताव को पारित करना चाहिए.

इससे पहले, जस्टिस सेन ने अपना इस्‍तीफ़ा फैक्‍स के माध्‍यम से राष्‍ट्रपति प्रतिभा पाटिल को सौंप दिया था.

राष्ट्रपति भवन की प्रवक्ता ने शुक्रवार को जानकारी दी कि फैक्स किए गए त्यागपत्र पर हस्ताक्षर असली नहीं पाए गए है और त्यागपत्र की मूल प्रति पहुंचने के बाद ही राष्ट्रपति कोई निर्णय लेंगी.

लेकिन अब ख़बरें आ रही हैं कि सौमित्र सेन ने अपना लिखित इस्तीफ़ा भी राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल को भेज दिया है.

फ़ैसला राष्ट्रपति और स्पीकर पर

सेन ने अपने वकील के माध्यम से कोलकाता में इस्तीफे की घोषणा की थी. सेन ने त्यागपत्र की एक प्रति लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार को भी भेजी है.

लोकसभा में इस पर कार्यवाही पांच सितम्बर को होनी है. फौसला अब राष्ट्रपति और लोकसभा अध्यक्ष को करना है.

अगर जस्टिस सेन के इस्‍तीफे के बाद भी लोकसभा में उन्हे हटाने का प्रस्ताव पर चर्चा होती है तो यह अपने आप में एक इतिहास होगा.

क्योंकि नियमों के मुताबिक अगर कोई जज अपने पद से इस्‍तीफा दे देता है तो उस पर हटाने की कार्रवाई नहीं होती है. पर तकनीकी पहलू ये है कि जस्टिस सेन का इस्‍तीफा अभी मंजू़र नहीं हुआ है.

महत्वपूर्ण है कि 18 अगस्त को सेन के खिलाफ राज्यसभा में महाभियोग का प्रस्ताव पेश किया गया था. बहुजन समाज पार्टी को छोड़कर सभी पार्टियों ने जस्टिस सेन को हटाने की वकालत की थी.

प्रस्ताव के पक्ष में 189 मत और विरोध में 17 मत पड़े थे.

सेन के खिलाफ यदि लोकसभा में प्रस्ताव पारित हो जाता है तो सेन देश के ऐसे पहले न्यायाधीश होगे जिन्हें संसद में प्रस्ताव पारित करके हटाया जाएगा.

उन पर वर्ष 1983 के एक मामले में 33.23 लाख रुपयों के दुरुपयोग का आरोप है.

इससे पहले, 1993 में जस्टिस रामास्वामी के ख़िलाफ़ ऐसा एक प्रस्ताव लोकसभा में आया था लेकिन वह पारित नहीं हो सका था.

इस बीच सिक्किम हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश दिनकरण के ख़िलाफ़ भी भ्रष्टाचार के आरोप में महाभियोग प्रस्ताव लाने की कार्रवाई शुरु की गई थी लेकिन उन्होंने इससे पहले ही अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया.

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