मंदिरों का रक्षक है ये मुसलमान

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Image caption मिदनापुर ज़िले का पथरा गांव, लगभग 300 साल पुराने जैन और शिव मंदिरों का बसेरा है.

बीबीसी की खास पेशकश सिटीज़न रिपोर्ट में इस हफ्ते पेश है मिदनापुर के रहने वाले यासीन पठान की कहानी. यासीन की ये कहानी उनकी कोशिशों के लिए खास है और इसलिए भी कि देश की ऐतिहासिक धरोहर को बचाने के लिए उन्होंने मज़हब और मज़हबी सोच की बंदिशों को तोड़ा.

'' मेरा नाम यासीन पठान है और मैं पेशे से एक स्कूल टीचर हूं. मैं पश्चिम बंगाल के मिदनापुर ज़िले का रहने वाला हूं.

मिदनापुर ज़िले का पथरा गांव, लगभग 300 साल पुराने जैन और शिव मंदिरों का बसेरा है. बेजोड़ स्थाप्तय के नमूनों के रुप में इस गांव में कभी 84 से ज़्यादा मंदिर हुआ करते थे लेकिन बिना रखरखाव और संरक्षण के ये मंदिर धीरे-धीरे खत्म हो गए हो गए और इनकी संख्या 32 ही रह गई. इन प्राचीन मंदिरों के बारे में जानने की उत्सुकता ने बचपन में ही मुझे इन मंदिरों से जोड़ दिया.

जिस गांव में रहता हूं उसका नाम है हाथिहलका और मेरे पड़ोस में बसा है पथरा गांव. हाथिहलका गांव पूरी तरह मुसलमानों का गांव है और पथरा में हिंदुओं का बसेरा है. बचपन में अक्सर मैं इन मंदिरों को देखने जाता था और मुझे यह देखकर बहुत दुख होता था कि यहां आने वाले लोग जिनमें से ज़्यादातर खुद हिंदू श्रद्धालु थे यहां से ईंटे, पत्थर, मंदिर के अवशेष उठा कर ले जाते थे.

कई सवाल उठे

समय के साथ इन मंदिरों की हालत बद से बद्तर होती जा रही थी. ऐसे में इनके इतिहास और इनके महत्व को जानने के बाद मैंने ठान लिया कि इन मंदिरों और उनके बचेखुचे अवशेषों को मैं बर्बाद नहीं होने दूंगा.

इसी के साथ शुरु हुई मंदिरों के संरक्षण के लिए मेरी कोशिशें. मैंने मंदिरों की निगरानी शुरु की और उन्हें नुकसान पहुंचाने वालों को रोकना शुरु किया.

लेकिन मुसलमान होने के नाते मेरे लिए मंदिरों की रक्षा का बीड़ा उठाना आसान नहीं था. जब मैंने स्थानीय लोगों और श्रद्धालुओं को मंदिरों के अवशेष ले जाने से रोका तो मुझपर कई तरह के सवाल उठे.

पथरा गांव के लोगों ने मेरा विरोध किया और मुझसे कहा गया कि क्योंकि मैं मुसलमान हूं इसलिए मंदिरों में घुसने या उनके बारे में कुछ कहने-करने का मुझे अधिकार नहीं. मुझे कई तरह की धमकियां भी दी गईं. खुद मेरी बिरादरी के लोगों ने मुझे काफ़िर कहकर अलग-थलग कर दिया औक मुझसे कहा गया कि मैं मंदिरों में आना-जाना छोड़ दूं.

लेकिन मैं अपनी मुहिम में लगातार जुटा रहा और कई लोगों को अपने साथ जोड़ने में कामयाब हुआ.

1992 में इस मामले को लेकर जागरुकता फैलाने और ज़्यादा से ज़्यादा लोगों को इस मुहिम से जोड़ने के लिए मैंने 'पथरा आर्कियोलॉजिकल कमिटी' बनाई. इस समिती में हमारे गांव के कुछ मुसलमान भाई शामिल हुए, पथरा गांव के कुछ हिंदू भाई शामिल हुए और आस-पास के इलाकों के आदिवासियों को भी हमने इस समिती का हिस्सा बनाया.

प्रशासन को मुस्तैद किया

हमारा मकसद था इस इलाके की संपदा की रक्षा करना और इन्हें पहचान दिलाना. समय के साथ जो लोग मेरे खिलाफ़ थे उन्होंने मेरे खिलाफ़ बोलना बंद कर दिया और बढ़ती निगरानी के चलते चोरी की घटनाएं भी बेहद कम हो गई हैं.

स्थानीय लोगों को इस मुहिम से जोड़ने के अलावा मंदिरों के संरक्षण के लिए प्रशासन की मदद भी ज़रूरी थी. मैंने इन मंदिरों के संरक्षण का मुद्दा दिल्ली तक पहुंचाने का फैसला किया और अपने इलाके का विधायक से मिला.

इसके बाद 1994 में जब प्रणब मुखर्जी योजना आयोग में थे तब इन मंदिरों पर किए गए काम और उनके इतिहास से जुड़ी जानकारियां लेकर मैं उनसे मिला. कुछ महीने बाद प्रणब मुखर्जी ने इन मंदिरों के लिए 20 लाख रुपए की सहायता राशि घोषित की और भारतीय पुरात्विक विभाग को इन मंदिरों का ज़िम्मा सौंप दिया गया.

इन मंदिरों के संरक्षण का काम अब शुरु हो चुका है और मंदिरों के आस-पास रहने वाले लोग अब इन्हें अपनी धरोहर का हिस्सा मानते हैं. मेरे बारे में जानकर देस-परदेस से जब कोई मुझसे मिलने आता है और मुझसे इन मंदिरों के बारे में जानना चाहता है तो मुझे लगता है कि मेरी कोशिश सफल हुई है.

मेरा मानना है कि इतिहास को संजोने की ज़िम्मेदारी हर व्यक्ति पर बराबर है और इसके लिए जाति और धर्म की सीमाओं से ऊपर उठना ज़रूरी है.''

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