'सीट ज़रूर मिलेगी'..

रेल में सफ़र भला कौन नही करता. अगर आप मुझसे ये पूछेंगे कि आख़िरी बार ट्रेन में कब बैठे तो याद करना और बताना बेहद मुश्किल होगा क्योंकि महीने में कम से कम दो या तीन बार तो बाहर जाना ही पड़ता है.

बिज़नेस के सिलसिले में बाहर कब जाना पड़ जाए कोई पहले से तय तो होता नही. चूँकि मैं दुकान पर नही बैठता इसलिए कभी भी निकलने में आसानी होती है.

मान लीजिए कि आज व्यापारी का फ़ोन आ जाए और वो कहे कि कल आ जाओ तो मैं उसी वक्त निकल लूँगा.

अब ऐसे में आप अपना रिज़र्वेशन तो करा नही सकते, इसलिए बिना रिज़र्वेशन के ही जुगाड़ करके जाना पड़ता है. हाँ जनरल टिकट या प्लेटफार्म टिकट ज़रूर लेता हूँ.

भ्रष्टाचार से सामना' श्रृँखला की पहली कड़ी पढ़ें

टीटी के भरोसे

जनरल बोगी में तो पैर रखने की जगह होती नही इसलिए 'थ्रीटायर' या 'एसी' में जाना पड़ता है.

यहाँ टीटी से मिले बिना काम नही चल सकता, और इसका सिर्फ़ एक ही तरीका है कि आप उन्हे किनारे ले जाओ और बात करो. यहाँ बस ये ध्यान रखना है कि आपके पीछे कोई है तो नही.चुपचाप बात कीजिए.

जितना मोल- भाव हो सके कर लें. बर्थ मिल जाएगी. ये राशि कुछ भी हो सकती है दो सौ से पाँच सौ तक कुछ भी.

कभी-कभी रसीद भी कटवानी पड़ती है.पर ऊपर की ऱकम अलग होती है.

'भ्रष्टाचार से सामना' श्रृँखला की दूसरी कड़ी -'कमेटी आ गई, भागो'....

टीटी ये करता है कि या तो वो अपनी बर्थ दे देता है या फिर ऐसे किसी आदमी की जो आया ही नही.

ऐसे लोग कम ही होते हैं जो वेटिंग लिस्ट वाले को सीट दे दें.

दलालों का चक्कर

एक बार का वाक़या आपको बताता हूँ कि जब मैं स्टेशन पहुँचा तो वहाँ पर घूम रहा एक दलाल मेंरे पास आया.

उसने मुझसे पूछा कि कहाँ जाना है मैने जवाब दिया कि बम्बई. उसने कहा कि हज़ार रूपए लगेंगे साथ में टिकट अलग से.

मैने कहा कि ये तो बहुत ज़्यादा हैं इस पर उसका जवाब था कि कोटे से आपका टिकट होगा और वो भी कन्फर्म. इसमें पैसा लगता है मुफ्त में कुछ नही मिलता.

'भ्रष्टाचार से सामना' श्रृँखला की तीसरी कड़ी -' कुछ चाय पानी हो जाए'

मैंने सोचा कि जब पैसे ही देने हैं तो क्यों न टीटी को ही क्यों न दे दिए जाएं.

ऐसा नही है कि हर बार निशाना ठीक जगह पर ही लगे.

कभी-कभी ऐसे टीटी भी मिल जाते हैं जो बिलकुल नही मानते और जनरल में जाने को कहते है. कुछ पेनाल्टी भी ठोक देते हैं, पर इनकी संख्या बहुत कम है.

हमें भी मालूम है कि रिश्वत देना भी उतना ही बड़ा अपराध है जितना कि लेना.

पर क्या करें कोई चारा भी तो नही है.

('भ्रष्टाचार से सामना' श्रृँखला की चौथी कड़ी में आशुतोष की आपबीती बीबीसी संवाददाता मोहन लाल शर्मा से की गई बातचीत पर आधारित है. इनकी पहचान गोपनीय रखते हुए हमने इनका नाम बदल दिया है.)

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