भू-अधिग्रहण विधेयक के मसौदे पर रस्साकशी

भूमि अधिग्रहण और पुनर्वास के लिए ग्रामीण विकास मंत्रालय के बनाए हुए नए विधेयक का मसौदा कैबिनेट ने मंज़ूर कर लिया है.

संसद में इस विधेयक का मसौदा पेश होने में भले ही कुछ वक़्त लगे, लेकिन इस प्रक्रिया के शुरुआती दौर में ही उद्योग जगत और किसानों में रस्साकशी शुरू हो गई है.

जहां किसानों का कहना है कि नया मसौदा उद्योग जगत के हित में ज़्यादा दिखाई देता है, वहीं उद्योग और वाणिज्य संगठन फ़िक्की का कहना है कि ये मसौदा उद्योग जगत के लिए ‘बोझिल’ साबित होगा.

एक प्रेस विज्ञप्ति जारी कर फ़िक्की ने कहा है कि प्रस्तावित भूमि अधिग्रहण और पुनर्वास विधेयक के कुछ प्रावधानों में बदलाव किए जाएं, क्योंकि वे उद्योग जगत के लिए मुश्किलें पैदा कर सकते हैं.

फ़िक्की चाहता है कि सरकार निजी कंपनियों के लिए अगर भूमि अधिग्रहण करे, तो 80 प्रतिशत प्रभावित परिवारों के बजाय 50 प्रतिशत परिवारों की ही सहमति पर्याप्त होनी चाहिए.

इसके अलावा 100 एकड़ भूमि अधिग्रहण पर पुनर्वास प्रावधानों के लागू किए जाने के सरकारी मत पर फ़िक्की की मांग है कि उसे बढ़ा कर 500 एकड़ कर दिया जाए.

साथ ही संगठन का कहना है कि भूमि अधिग्रहण विधेयक में ‘सार्वजनिक मक़सद’ की परिभाषा को थोड़ा लचीला बनाया जाए, ताकि निवेश प्रक्रिया को आसान बनाया जा सके.

फ़िक्की की इन मांगों को किसान संगठनों और कार्यकर्ताओं ने बेबुनियाद बताया है और कहा है कि उद्योग जगत सरकार की उद्योग समर्थक नीतियों का फ़ायदा उठाना चाहता है.

भारतीय किसान समाज के अध्यक्ष कृष्णबीर चंद्र ने आक्रोशित स्वर में फ़िक्की की मांगों का खंडन करते हुए कहा, “आदत ख़राब हो गई है उद्योग जगत की. उद्योग जगत की लॉबिज़ सरकार के गलियारों में लॉबिंग करती हुई फिरती हैं, इसलिए ऐसी मांगें की जा रही हैं.”

दूसरी ओर छत्तीसगढ़ में सामाजिक कार्यकर्ता और वकील सुदीप श्रीवास्तव ने कहा, “निजी कंपनियां जब भूमि अधिग्रहण करने आती हैं, तो वे प्रभावित किसान समूह में से सबसे प्रभावशाली किसान को लालच दे कर दूसरों को अपनी ज़मीन बेचने के लिए राज़ी करने पर मजबूर करते हैं. सरकार और पूरा सिस्टम उद्योग जगत को फ़ायदा पहुंचाने के लिए एक माफ़िया की तरह काम करता है.”

छह गुना ज़रूरत से ज़्यादा या कम?

Image caption किसानों का कहना है कि उनकी ज़मीन उनसे लीज़ पर ली जानी चाहिए.

इस विधेयक को तैयार करने में मुख्य भूमिका निभाने वाले तृणमूल सांसद देबब्रत बंधोपाध्याय ने बीबीसी को बताया कि मसौदा तैयार करने की प्रक्रिया में कुछ मतभेद ज़रूर आड़े आए, लेकिन उन सब पर अब सहमति बन चुकी है.

'भूमि अधिग्रहण तथा पुनर्वास और पुनर्स्थापना विधेयक 2011' के मसौदे के अनुसार मुआवज़े की राशि शहरी क्षेत्र में निर्धारित बाजार मूल्य के दोगुने से कम नहीं होनी चाहिए, जबकि ग्रामीण क्षेत्र में ये राशि बाजार मूल्य के छह गुणा से कम नहीं होनी चाहिए.

जहां देबब्रत बंधोपाध्याय कहते हैं कि ये प्रावधान नए विधेयक के मसौदा का सबसे बड़ा सकारात्मक बिंदु है, वहीं सुदीप श्रीवास्तव का कहना है कि इस प्रावधान को सकारात्मक रंग केवल मीडिया की बदौलत मिला है और इसमें कई ख़ामियां हैं.

छत्तीसगढ़ का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा, “छत्तीसगढ़ में ज़मीन का न्यूनतम रेट छह लाख रुपए प्रति एकड़ है और अधिकतम रेट दस लाख प्रति एकड़. लेकिन छत्तीसगढ़ में ऐसे बहुत से इलाक़े हैं, जहां सर्किल रेट केवल 50 से 60 हज़ार रुपए है. अगर इस बिल का फ़ॉर्मूला लगाया जाए तो उन इलाक़ों के किसानों को छह गुना यानी लगभग तीन लाख रुपए दिए जाएंगें, जबकि न्यूनतम रेट सात लाख के आसपास है. ऐसे में किसान ख़ुद को ठगा ना महसूस करे, तो क्या करे.”

लेकिन जब मैंने ‘भूमि अधिग्रहण प्रतिरोध आंदोलन’ नाम की संस्था के अध्यक्ष रूपेश कुमार से इस प्रावधान के बारे में पूछा, तो उन्होंने कहा कि हालांकि कुछ किसान इस प्रावधान से थोड़े संतुष्ट थे, लेकिन ज़्यादातर इससे कतई ख़ुश नहीं हैं.

उन्होंने कहा, “जिन इलाक़ों में सर्किल रेट वाजिब है, वहां के किसानों को इस प्रावधान पर आपत्ति नहीं है, लेकिन कई इलाक़ों में ये रेट बेहद मामूली है. सभी किसान इस प्रावधान से ख़ुश नहीं है. साथ ही हमारा ये कहना है कि इस मसौदे को जब पारित किया जाए, तो इसमें उन किसानों को भी कवर किया जाए, जो अपनी ज़मीनों के बदले मुआवज़ा लेने पर मजबूर किए गए.”

तो वहीं कुछ किसानों का कहना है कि नए विधेयक में ऐसा प्रावधान होना चाहिए जिसके तहत ज़मीन अधिग्रहित होने के बाद भी किसानों के वंशजों का हक़ ज़मीन पर बना रहे.

भारतीय किसान समाज के अध्यक्ष कृष्णबीर चंद्र ने कहा, “किसानों से ज़मीन 33 साल के पट्टे पर ली जानी चाहिए ताकि उनकी आने वाली पीढ़ियां अवसरों के अभाव में अपराध की ओर न बढ़ें. किसान समुदाय के भविष्य के बारे में सोच कर मुझे डर लगता है. अगर ऐसे क़ानून बनते रहे, तो किसान कुछ ही समय में सड़कों पर आ जाएंगें. क्यों नहीं सरकार बारमेड़ के उन बंजर इलाकों में भूमि अधिग्रहण करती? उपजाऊ ज़मीन को ही क्यों निशाना बनाने की योजना बनाई जा रही है?”

ग्रामीण विकास मंत्रालय ने ये नया मसौदा लोगों की प्रतिक्रियाएं जुटाने के लिए सार्वजनिक किया था, लेकिन किसान नेताओं का कहना है कि उनके सुझाए बदलावों को ही मंत्रालय ने स्वीकृति नहीं दी.

भूमि अधिग्रहण और पुनर्वास क़ानून की शक्ल क्या होगी, ये तो अब संसद में होने वाली बहस तय करेगी. लेकिन एक बात जो तय है, वो ये कि जिस समुदाय के ‘हित’ को ध्यान में रख कर ये मसौदा तैयार किया गया है, वो ही इससे संतुष्ट नहीं दिखाई पड़ रही.

संबंधित समाचार