'कांग्रेस भी हो जाँच के दायरे में'

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Image caption लोकसभा के भीतर पैसे पहुंचने को लेकर भी कई सवाल खड़े हुए थे.

दिल्ली की एक अदालत ने जब समाजवादी पार्टी के पूर्व महासचिव और राज्यसभा सांसद अमर सिंह और भाजपा के दो पूर्व सांसदों फग्गन सिंह कुलस्ते और महाबीर सिंह भगोरा को गिरफ़्तार कर न्यायिक हिरासत में भेजा तो 'नोट के बदले वोट' मामले में राजनीति एक बार फिर गरमा गई.

भाजपा और विपक्षी दलों ने मांग की है कि उसकी जाँच की जानी चाहिए जिसे इस मामले से फ़ायदा पहुँचा.

उनका कहना है कि जिसने मामला उठाया उसे पकड़ लिया गया, जिसन कथित तौर पर पैसों का इंतज़ाम किया उसे भी पकड़ लिया गया लेकिन जिस कांग्रेस सरकार के लिए ये सब किया गया, उसकी कोई जाँच नहीं हुई.

सुप्रीम कोर्ट की कड़ी फटकार के बाद जाँच यहाँ तक पहुँची है लेकिन अभी ये पता लगना बाक़ी है कि जो नोट संसद में लहराए गए उसका स्रोत क्या था.

हालांकि कांग्रेस ने पल्ला झाड़ लिया है और कहा है कि उसे अपनी सरकार बचाने के लिए वोटों की ज़रुरत कभी थी ही नहीं.

'किसके लिए?'

Image caption अमर सिंह के वकीलों का कहना है कि उनके ख़िलाफ कोई सबूत नहीं हैं

वामपंथी भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी के सांसद गुरूदास दासगुप्ता ने कहा है कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को सफ़ाई देनी चाहिए कि अमर सिंह के पीछे कौन था?

गुरूदास दासगुप्ता का कहना था कि अगर इस पूरे मामले पर नज़र दौड़ाई जाए तो ये साफ़ हो जाएगा कि इसका सबसे बड़ा लाभ सरकार को ही मिलना था.

मार्क्सवादी कम्यूनिस्ट पार्टी के मोहम्मद सलीम ने कहा कि जांच एजेंसी बिना दबाव के काम नहीं कर सकती इसलिए मीडिया को चाहिए कि वो बराबर दबाव बनाए रखे.

मुख्य विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ता शाहनवाज़ हुसैन ने कहा, "जिन लोगों ने रिश्वत दिए जाने की बात की उन्हें गिरफ़्तार कर लिया गया, जिसने रिश्वत दी उन्हें गिरफ़्तार कर लिया गया है; लेकिन उनका क्या जिसके लिए ये सारा लेन-देन हुआ?"

शाहनवाज़ हुसैन ने आरोप लगाया कि अमर सिंह कांग्रेस के लिए काम कर रहे थे इसलिए कांग्रेस पार्टी को भी इस जांच के दायरे में लाया जाना चाहिए.

लेकिन पूरे मामले को संसद में उठानेवाले लोगों में शामिल बीजेपी सांसद अशोक अर्गल से जब यही सवाल पूछा गया तो उन्होंने ख़ुद सवाल के लहजे में कहा कि अगर हमें भ्रष्टाचार करना होता तो हम टीवी चैनल को ये बात क्यों बताते, नोट लेकर संसद में क्यों जाते?

"सबको मालूम है कि यूपीए सरकार ने विश्वास मत हासिल करने के लिए क्या क्या किया."

अमर सिंह के पुराने राजनीतिक दल समाजवादी पार्टी ने भी अमर सिंह का बचाव किया है.

समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता मोहन सिंह ने कहा, "जैसा कि सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि पैसे के स्रोत का पता लगाया जाना चाहिए. अमर सिंह को बलि का बकरा बनाया जा रहा है."

उन्होंने कहा कि जिसको इसका फ़ायदा हुआ है उनके ख़िलाफ़ जांच होनी चाहिए.

'हमें नहीं थी ज़रूरत'

कांग्रेस प्रवक्ता अभिषेक सिंघवी ने इन आरोपों पर कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि जो लोग पूरी जांच प्रक्रिया पर सवाल उठा रहे हैं वो ये भूल रहे हैं कि पूरी छानबीन सुप्रीम कोर्ट की देख-रेख में हुई है.

अभिषेक सिंघवी ने कहा कि सीबीआई की जांच पर सवाल उठाने का मतलब है देश की सबसे ऊंची अदालत के काम-काज पर ही सवाल उठाना.

उन्होंने दावा किया कि कांग्रेस का इस पूरे मामले से कुछ लेना देना नहीं है.

केंद्रीय संसदीय कार्यमंत्री पवन बंसल ने कहा कि कांग्रेस को वोट ख़रीदने की ज़रूरत ही नहीं थी.

उन्होंने कहा "कांग्रेस को वोट की ज़रुरत नहीं थी, आप रिकॉर्ड निकाल कर देखिए कि कितने वोटों से कांग्रेस जीती थी. इनके एक-दो वोटों की हमें क्या ज़रुरत थी. कचहरी में मसला है, साबित हो जाएगा सब कुछ."

कांग्रेस इस मामले में विपक्षी दल बीजेपी पर उंगली उठाती रही है.

22 जुलाई, 2008 को मनमोहन सिंह सरकार को विश्वास मत हासिल करना था क्योंकि वामपंथियों ने सरकार से समर्थन वापस ले लिया था और ऐसा लग रहा था कि कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार ने बहुमत खो दिया है.

कांग्रेस ने विश्वास प्रस्ताव 19 मतों से जीता था. लेकिन इससे पहले भाजपा के तीन सांसदों ने लोकसभा में नोटों के बंडल लहराते हुए कहा था कि उन्हें अमर सिंह की ओर से एक-एक करोड़ रुपए दिए गए जिससे कि वे यूपीए के ख़िलाफ़ वोट न दें.

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