' मैं दारजी-दारजी कहकर चीख रहा था''

 धमाकों के बाद वहां तैनात सुरक्षाकर्मी इमेज कॉपीरइट BBC World Service
Image caption धमाके के बाद वहाँ अंध्रेरा छा गया और चारों तरफ धुंआ छा गया

दिल्ली हाई कोर्ट में बुधवार सुबह हुए धमाके में दिल्ली के गीता कालोनी निवासी हरजीत सिंह के पिता इंदर सिंह की भी मौत हो गई. सरकारी नौकरी से सेवानिवृत्त हुए इंदर सिंह की आयु 80 साल से अधिक थी. वे एक मुकदमे की तारीख पर अपने बेटे के साथ गए थे, जो इस धमाके में बाल-बाल बच गए.

बीबीसी से हरजीत सिंह ने कहा,'एक मुकदमे के सिलसिले में मैं अपने पिताजी के साथ हाईकोर्ट गया हुआ था. हम लोग हाई कोर्ट के अंदर जाने के लिए पास बनवा रहे थे. मैं सामान्य कतार में खड़ा था और पिताजी वरिष्ठ नागरिकों वाली लाइन में खड़े थे. हमारे बीच करीब 20 फीट का फासला था.'

अफरा-तफरी

अभी हमें लाइन में खड़े हुए दो-तीन मिनट ही हुए थे कि एक जोरदार धमाका हुआ. धमाके की आवाज बहुत तेज थी. हालत यह थी कि धमाकों के करीब 40 सेकेंड बाद भी मुझे कुछ सुनाई नहीं दे रहा था. धमाके के बाद वहाँ चारों तरफ धुआं फैल गया. वहाँ से मैं बाहर की ओर भागा, जिधर कुछ रोशनी थी. वहां खड़े अन्य लोग भी डर कर इधर-उधर भागने लगे.

कुछ धुंआ छंटने पर मैं एक बार फिर उधर गया. लेकिन धुंए के कारण कुछ दिख नहीं रहा था और मैं वापस आ गया. उसके कुछ देर बाद मैं फिर वहाँ पहुंचा और और दारजी–दारजी की आवाज लगाकर मैं अपने पिता जी को खोजने लगा. धुंआ जब कुछ छंटा तो देखा कि वहाँ 17-18 लोग नीचे पड़े हुए थे. लोगों के रोने-चीखने की आवाज आ रही थी. लोग मदद के लिए चिल्ला रहे थे.

नीचे गिरे लोगों के पैरों में काफी चोट लगी थी. चारों तरफ खून फैला था. इसके बाद पास की सड़क से लोग मदद के लिए आए. लोग पीसीआर और एंबुलेंस के लिए आवाज लगा रहे थे. मेरे पिता जी के हाथ में उनका नाम गुदा था. इसके बाद भी मुझे उन्हें खोजने में कुछ समय लगा. मुझे दो-चार लोगों को उलट-पुलट कर देखना पड़ा.

लचर सुरक्षा व्यवस्था

इतने में एक पीसीआर आई और उसके दो जवानों की मदद से मैंने अपने पिता जी को उसमें लादा, मेरे साथ दो और लोग भी थे. उनके साथ मैं राममनोहर लोहिया अस्पताल पहुँचा.लेकिन वहां डाक्टरों ने पिताजी को मृत घोषित कर दिया.

इसके बाद मुझे कोई यह बताने वाला नहीं मिला की वे मेरे पिता जी के शव को मुझे कब सौंपेंगे.

पिछले एक साल से मैं एक मुकदमें के सिलसिले में हाई कोर्ट आ रहा हूँ. यहां की सुरक्षा व्यवस्था वैसे तो काफी कड़ी है. यहां आने वाले लोगों की काफी जांड-पड़ताल होती है. अंदर कुछ नहीं ले जाने दिया जाता है. हमारे मोबाइल फोन भी बाहर ही रखवा लिए जाते हैं. लेकिन जहाँ विजिटर पास बनते हैं, वह काफी खुला इलाका है. वहाँ कोई भी आ-जा सकता है. वहां किसी की भी जाँच नहीं होती है. वहीं यह बम धमाका हुआ है.

मेरे पिता इंदर सिंह जी 1986 में सरकारी नौकरी से रिटायर हुए और उनकी उम्र 80 साल से अधिक थी.

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