भारतीय लेखक को चीनी सम्मान

  • 8 सितंबर 2011
Image caption दीपक के साथ ये पुरस्कार ब्रिटेन,नीदरलैंड,जापान और अमेरिका के चार और साहित्यकारों को भी दिया गया है

उत्तराखंड के दून विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर बीआर दीपक को चीन ने अपने सर्वोच्च साहित्यिक सम्मान से नवाज़ा है.

दीपक चीन में विदेशी साहित्यकारों को दिए जाने वाले सबसे बड़े सम्मान ‘स्पेशल बुक अवार्ड’ से नवाज़े जाने वाले पहले भारतीय लेखक हैं.

उन्हें ये पुरस्कार चीनी किताबों के प्रकाशन, अनुवाद और सांस्कृतिक आदान-प्रदान में महत्त्वपूर्ण योगदान के लिए दिया गया है.

अपने इस उपलब्धि पर दीपक ने कहा, “ये पहली बार है जब भारत में जो चीनी अध्ययन हो रहा है उसे चीन ने प्रतिष्ठा दी है और सराहा है. मुझे उम्मीद है कि इस पुरस्कार से भारत में चीनी भाषा और संस्कृति के प्रति रूझान बढ़ेगा.”

दीपक की जिस विशेष किताब को ये सम्मान दिया गया है उसमें उन्होंने चीन में 11वीं सदी ई.पू. से लेकर 14वीं सदी तक की अवधि के चीनी साहित्य से चुनी हुई 87 कविताओं का अनुवाद किया है.

'चीन कविताओं का देश'

दीपक बताते हैं, “चीन को कविता का देश माना जाता है और वहां का काव्य बेहद समृद्ध है. वहां का हान वंश हो या थांग वंश हर काल में साहित्य की विशेष शैली रही है.”

उनके अनुसार चीनी कविताओं में छंद बद्ध भी हैं और छंद मुक्त भी. दीपक बताते हैं कि इन कविताओं में युद्ध, प्रेम और कुदरत के प्रति प्यार के बिंब उभरे हुए नजर आते हैं.

दीपक की अनुवाद की हुई चीन के 8वीं सदी के कवि ली पाए की एक मशहूर कविता है-

चांदनी रात-

बिस्तर के आगे छिटकी चांदनी

Image caption दीपक पिछले 15 से भी अधिक वर्षों से चीनी भाषा और साहित्य पढ़ा रह हैं

धरती ने ओढ़ ली है मानो ओस की चादर

सिर उठाया तो दिखता है चांद

सिर झुकाया तो याद आया अपना घर

चीनी कविताओं के इस अनुवाद में प्रोफ़ेसर दीपक को करीब नौ वर्ष लगे. हिंदी के जाने-माने कवि केदारनाथ सिंह ने भी इसमें उनकी मदद की है.

प्रो. दीपक ने चीनी साहित्य के इतिहास पर भी किताब लिखी है जो चीन में प्रकाशित हुई है..

प्रोफ़ेसर दीपक मूल रूप से जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में एसोसिएट प्रोफेसर हैं लेकिन एक वर्ष के लिये देहरादून स्थित दून विश्वविद्यालय में हैं और यहां के भाषाई अध्ययन विभाग के अध्यक्ष हैं. उत्तर भारत में जेएनयू के बाद दून विश्वविद्यालय एकमात्र ऐसा विश्वविद्यालय है जहां चीनी भाषा विभाग है.

प्रो. दीपक ने एडिनबरा विश्वविद्यालय और पीकिंग विश्वविद्यालय से पढ़ाई की है और चीनी अध्ययन में ही डॉक्टरेट और पोस्ट डॉक्टरेट किया है. वो पिछले 15 से भी अधिक वर्षों से चीनी भाषा और साहित्य पढ़ा रह हैं और भारत चीन संबंधों पर उन्होंने महत्तवपूर्ण काम किया है.

उनकी कुछ किताबें चीन के विश्वविद्यालयों में भी पढ़ाई जाती हैं.

साहित्य समाज का दर्पण

दीपक भारत और चीन के बीच विश्वास की कमी पर कहते हैं, “ये हमारा दुर्भाग्य है कि हम अपने पड़ोसियों को कम जानते हैं और पश्चिमी मुल्कों की तरफ ज्यादा देखते हैं.”

उनके अनुसार चीन को समझना है तो उनके साहित्य को समझना होगा.

दीपक कहते हैं, “साहित्य, खासतौर पर कविता किसी भी समाज और उसकी मानसिकता को समझने का सबसे सशक्त माध्यम है और तभी हम उस देश की राजनीति और विदेश नीति को भी समझ सकते हैं. चीन हमारे लिये सामरिक लिहाज से इतना मह्त्त्वपूर्ण है लेकिन वहां के साहित्य और सांस्कृतिक प्रतीकों के बारे में हम काफी कम जानते हैं.”

दीपक ने बताया कि भारतीय साहित्य के महत्त्व को समझता है और वहां हिंदी अध्ययन को काफी बढ़ावा दिया जा रहा है.

प्रो दीपक के साथ-साथ ये पुरस्कार ब्रिटेन,नीदरलैंड,जापान और अमेरिका के चार और साहित्यकारों को भी दिया गया है.