गृह मंत्री चिदंबरम से विशेष बातचीत

पी चिदंबरम
Image caption भारत के गृहमंत्री पी चिदंबरम की बीबीसी से ख़ास बातचीत

भारत के गृह मंत्री पी चिदंबरम ने बीबीसी से एक विशेष बातचीत में अमरीका में हुए 9/11 हमले के दस बरस पूरे होने से लेकर हाल ही में दिल्ली में हुए बम धमाके सभी विषयों पर खुलकर बातें की.

उनसे बातचीत की बीबीसी संवाददाता संजय मजूमदार ने-

सवाल- 9/11 हमलों को दस साल हो गए हैं. इस दौरान कई घटनाएं ख़ासकर इस क्षेत्र.आपकी नज़र में इन सब का भारत पर क्या असर पड़ा?

जवाब-हमलोग दुनिया के सबसे ख़तरनाक पड़ोस में रहते हैं और ज़्यादातर चरमपंथी संगठन इन्हीं इलाक़ों ख़ासकर भारत-अफ़ग़ानिस्तान और कुछ हद तक भारत में सक्रिय हैं.

मेरा ख़्याल है कि हर देश को इस बात का एहसास हो गया है कि इन चरमपंथी संगठनों की पहुंच सिर्फ़ उन देशों तक सीमित नहीं हैं जहां से वो संचालित होतें हैं.

आतंकवाद अब एक वैश्विक समस्या बन गया है.वैश्विक कहने का मतलब ये नहीं कि दुनिया का हर देश इससे प्रभावित है बल्कि इसका अर्थ ये है कि इन चरमपंथी संगठनों की क्षमता वैश्विक हो गई है.

इसलिए आतंकवाद पर क़ाबू पाने के लिए दुनिया के देशों में एक दूसरे से सहयोग बढ़ा है,सूचना और ख़ुफ़िया जानकारियों के आदान-प्रदान में इज़ाफ़ा हुआ है.मेरा मानना है कि 9/11 हमलों का यही सबसे बड़ा असर हुआ है.

पश्चिमी देशों के कई ख़ुफ़िया एजेंसियों का ऐसा मानना है कि ओसामा बिन लादेन के मारे जाने के बाद अल-क़ायदा और कई दूसरे चरमपंथी संगठनों को काफ़ी नुक़सान हुआ है और वे काफ़ी कमज़ोर हो गए हैं.उनके मुताबिक़ अब ये संगठन उस तरह से हमले नहीं कर सकते हैं जैसा कि वे पहले कर सकते थे.क्या आप इस आकलन से सहमत हैं?

नहीं,मेरा ख़्याल है कि ये एक अपरिपक्व निष्कर्ष है.मैं नहीं मानता कि सिर्फ़ इसलिए कि किसी संगठन का प्रमुख मारा गया हो,वो संगठन कोई दूसरा नेता नहीं

पैदा कर सकता है.अगर किसी संगठन का नेटवर्क कमोबेश सुरक्षित है और वो संगठन में नए लोगों को भर्ती करने में सक्षम है तो संगठन नया नेता भी चुन सकता है.

उदाहरण के तौर पर इलयास कश्मीरी एक ऐसे आदमी हैं या कई दूसरे नेता जिन्हें हम नहीं जानते वे संगठन के मुखिया बन सकते हैं.इसलिए हमें इस बात से ज़्यादा ख़ुश नहीं होना चाहिए कि किसी संगठन के मुख्य नेता मारे गए हैं,वो संगठन के लिए एक तत्कालिक धक्का हो सकता है.

आपने अभी कहा कि 9/11 हमले के बाद कई देशों ने एक दूसरे से ख़ुफ़िया जानकारियों को बांटना शुरू कर दिया.भारत और अमरीका भी एक दूसरे से बहुत सहयोग कर रहे हैं.इससे भारत को कितना फ़ायदा हुआ है और क्या आपको लगता है कि अमरीका से निकट संबध होने के कारण भारत कुछ चरमपंथी संगठनों के निशाने पर आ गया है?

हमलोग इसलिए निशाने पर नहीं है क्योंकि भारत दूसरे देशों के साथ मिलकर काम कर रहा है.हमलोग दूसरे देशों के साथ सहयोग इसलिए कर रहें है क्योंकि भारत चरमपंथी संगठनों का निशाना रहा है.

भारत लश्कर और हुजी जैसे कई अंतरराष्ट्रीय चरमपंथी संगठनों के निशाने पर रहा है जिनके पास एक से ज़्यादा देशों में हमला करनी की क्षमता है.मुझे नहीं लगता कि भारत इसलिए निशाना बन रहा है क्योंकि हमने अमरीका से सहयोग किया है.

हम ब्रिटेन, फ़्रांस, रूस और मध्य पूर्व के भी कई देशो के साथ सहयोग कर रहे हैं और ये सहयोग बहुत ज़रूरी हैं क्योंकि इससे हमें कई महत्वपूर्ण जानकारियां मिलती हैं.

आपने जिन चरमपंथी संगठनों का ज़िक्र किया उनमें ज़्यादातर पाकिस्तान की धरती से संचालित होते हैं. आपने कई देशों के साथ सहयोग की बात कही लेकिन पाकिस्तान के बारे में आपकी क्या राय है.क्या आपको लगता है कि हालात ऐसे हैं कि पाकिस्तान के साथ ख़ुफ़िया जानकारियों का आदान-प्रदान हो सकता है या अभी-अभी पाकिस्तान एक चिंता बना हुआ है?

हमलोग अभी उस मुक़ाम पर नहीं पहुंचे हैं कि भारत पाकिस्तान के साथ ख़ुफ़िया जानकारियों को बांटे या हमें पाकिस्तान से उम्मीद नहीं करनी चाहिए कि वो अपनी ख़ुफ़िया जानकारी भारत के साथ बांटे.

इसकी वजह बिल्कुल साफ़ है.पाकिस्तान या पाकिस्तानी सत्ता के कुछ हिस्से अभी भी वैसे चरमपंथी संगठनों की मदद कर रहें हैं जिनका पाकिस्तानी सरकार से कोई संबंध नहीं है.

हालाकि पहले मैंने सरकार समर्थित चरमपंथी संगठन और गैर सरकारी चरमपंथी संगठनों में किसी फ़र्क़ को नकार दिया था लेकिन अगर मान भी लिया जाए कि इन दोनों में कोई फ़र्क़ है तो भी पाकिस्तानी सत्ता से जुड़े ऐसे कई लोग हैं जो इन संगठनों को लगातार अपना समर्थन जारी रखे हुए हैं.

इन हालात में हम पाकिस्तान के साथ कैसे कोई ख़ुफ़िया जानकारी बांट सकते हैं या फिर हम पाकिस्तान से इस बात की आशा कैसे कर सकते हैं कि वो हमें सही और कार्रवाई योग्य ख़ुफ़िया जानकारी देगा.

हाल के दिनों में पाकिस्तान और अमरीका के संबंधों में भी काफ़ी तनाव देखा जा रहा है.आप उसका क्या प्रभाव देखते हैं?

पाकिस्तान और अमरीका के बीच ख़राब हो रहे रिश्तों का एक असर तो हम ये देख रहें है कि पाकिस्तानी सत्ता के कुछ हिस्से भारत-पाक सीमा पर दबाव बढ़ाने की कोशिश कर रहें हैं.

मुझे नहीं पता कि इन सबका उद्देश्य क्या है और इसका क्या नतीजा निकलेगा लेकिन इतना ज़रूर है कि सीमा पर हालात उतने अच्छे नहीं हैं जितना कुछ महीने पहले थे. सच तो ये है कि सीमा पर हालात में तनाव बढ़ गया है.

मुंबई में 2008 में हमले हुए.शायद 9/11 के बाद होने वाला ये सबसे बड़ा हमला था. उसके बाद भी भारत में हमले होते रहें हैं. हाल ही में मुंबई और कुछ ही दिन पहले दिल्ली में बम धमाके हुए.इन हमलों में आप क्या कोई ख़ास स्वरूप देखते हैं. आपकी समझ में किस तरह के संगठन इन हमलों को अंजाम दे रहें हैं?

मुंबई के 2008 हमले के बाद तीन प्रमुख हमले हुए हैं और शायद एक हमला विफल हो गया था.दिल्ली हाईकोर्ट में 25मई, 2011 को हुआ हमला विफल हो

गया था. इसलिए मैं मानता हूं कि कुल चार हमले हुए हैं.

पूने,मुंबई और दो बार दिल्ली में हमले हुए जिसमें कई लोग मारे गए.

पूने और मुंबई में हुए हमले के बारे में मैं लगभग निश्चित तौर पर कह सकता हूं ये हमले भारतीय या भारत में सक्रिय चरमपंथियों के ज़रिए किए गए हैं.

दि्ल्ली में होने वाले हमले के बारे में मैं अभी दावे के साथ कुछ नहीं कह सकता लेकिन हमले के तरीक़े से अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि ये हमले भी भारतीय चरमपंथियों के ज़रिए किए गए हैं.

जैसा कि आप जानते हैं हूजी और इंडियन मुजाहिदिन नामक संगठन ने हमले की ज़िम्मेदारी ली है.उन दावों की जांच हो रही है.

इन सबसे मैं ये कह सकता हूं कि भारत में होने वाले हमलों के लिए हम सीमा पार आतंकवाद को ज़िम्मेदार नहीं ठहरा सकते.

सीमा पार से संचालित आतंकवाद अभी भी एक ख़तरा बना हुआ है लेकिन हमें भारतीय चरमपंथियों पर भी नज़र रखनी होगी जो इस तरह के हमले करने में समर्थ हैं.

इसका मतलब ये है कि अब आपको इस चुनौती से निपटने के लिए कुछ नया करना होगा.पहले आपने अपनी सुरक्षा व्यवस्था को मज़बूत करने और दूसरे देशों पर दबाव डालने की कोशिश की थी लेकिन क्या अब आपको कुछ नया करने की ज़रूरत है क्योंकि ये सगंठन दूसरे तरह के हैं?

कुछ अलग नहीं बल्कि हमें और ज़्यादा करने की ज़रूरत है.जहां तक सीमा-पार आतंकवाद का ताल्लुक़ है हमें अपने मित्र देशों पर दबाव डालते रहना होगा ताकि वे पाकिस्तान पर उसकी धरती से संचालित चरमपंथी गतिविधियों को रोकने के लिए दबाव डालते रहें.

लेकिन अब चूंकि भारतीय चरमपंथी संगठन भी सक्रिय हैं इसलिए उनपर क़ाबू पाने के लिए हमें अपनी आतंकवाद निरोधक क्षमताएं विकसित करनी होंगी.हमें इन संगठनों के पीछे लगना होगा और उन्हें समाप्त करना होगा.

लेकिन इन सबके लिए ख़ुफ़िया जानकारी जमा करने के लिए क्या कर रहे हैं. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आपने कई दे्शों से सहयोग किया जिनसे आपको बहुत सहायता भी मिली लेकिन देश के अंदर सक्रिय इन चरमपंथी संगठनों के बारे में क्या आपके पास पुख़्ता ख़ुफ़िया जानकारी है?

मैं इसबारे में बिल्कुल भी संतुष्ट नहीं हूं. भारत एक विशाल देश है जहां कई धर्मों और जाति के लोग रहते हैं.भारत के शहरों में लोग जिस तरह बसते हैं उसकी वजह से ख़ुफ़िया जानकारी जमा करना बहुत मुश्किल होता है.

हर संगठन के बारे में ख़ुफ़िया जानकारी जमा करने की हमारी क्षमता से मैं बिल्कुल भी संतुष्ट नहीं हूं.लेकिन दर असल ये ज़िम्मेदारी राज्य सरकारों की है.

केंद्र सरकार की मौजूदगी कुछ हद तक राज्यों में ज़रूर हैं लेकिन चरमपंथी संगठनों के बारे में जानकारी इकठ्ठा करने की प्राथमिक ज़िम्मेदारी राज्य सरकारों की है.राज्य सरकारें अपनी क्षमताओं में बढ़ोतरी कर रहें हैं.पिछले दो साल में राज्य सरकारों ने अपनी क्षमताओं में काफ़ी इज़ाफ़ा किया है लेकिन अभी हमें एक लंबा सफ़र तय करना है जिसके बाद ही हम कह सकते हैं कि हमारे पास प्रयाप्त क्षमता है.

9/11 हमले को दस साल हो गए हैं.कई चिज़े बदली हैं और कितनी बदल रहीं है.नैटो सेना अफ़ग़ानिस्तान छोड़ कर जा रही है.पाकिस्तान में हालात विस्फोटक बने हुए हैं. इन सबमें आपकी सबसे बड़ी चिंता क्या है?

हम सब इस बात से सहमत हैं कि आतंकवाद का केंद्र बिंदु पाकिस्तान-अफ़ग़ानिस्तान है. इसलिए विदेशी सेना के अफ़ग़ानिस्तान छोड़ने से मेरी सबसे बड़ी चिंता ये है कि अगर इन चरमपंथी संगठनों पर क़ाबू पाने के लिए कोई नहीं रहेगा तो क्या ये और अधिक आक्रामक हो जाएंगे.

ये संगठन बहुत आसानी से अपना ध्यान भारत पर केंद्रित कर दे सकते हैं.भारत विविधताओं से भरा समाज है और भारत, पाकिस्तान तथा अफ़ग़ानिस्तान में कुछ ऐसे लोग हैं जो एक दूसरे से हाथ मिला सकते हैं.ये एक चिंता का विषय है.

मेरे लिए दूसरी चिंता ये है कि पूरी दुनिया के युवाओं में बढ़ती उग्र विचारधारा पर कैसे क़ाबू पाया जाए.

अगर भारत के य़ुवाओं में भी उग्र विचारधारा पनपती है तो इससे सुरक्षा एजेंसियों के लिए और कठिनाईयां पैदा होंगी.

हमें युवाओं को उस रास्ते पर चलने से रोकना होगा.और ये केवल पुलिसिया काम नहीं है.ये पुलिसिया कार्रवाई से कहीं ज़्यादा बड़ा काम है.

ये सब चिंता का विषय है लेकिन मेरी सबसे बड़ी चिंता है कि मैं भारत के लोगों से कैसे संवाद करूं.

भारत में क़ानून-व्यवस्था को बनाए रखना आसान काम नहीं है. सरकार अपनी क्षमता में बढ़ोतरी कर सकती है और अपने नेटवर्क में इज़ाफ़ा कर सकती है लेकिन बावजूद इसके ऐसे मामले हो सकते हैं कि चरमपंथी सुरक्षा व्यवस्था में कुछ ख़ामियों का फ़ायदा उठाने में कामयाब हो जाए.

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