हट सकते हैं पोखरियाल?

  • 9 सितंबर 2011
रमेश पोखरियाल निशंक इमेज कॉपीरइट pti
Image caption हाल ही में मुख्यमंत्री निशंक की फ़र्ज़ी पीएचडी डिग्री का मामला भी प्रकाश में आया है.

उत्तराखंड में पिछले दस वर्षों में पाँच मुख्यमंत्री बदल चुके हैं और शायद अब छठी बार मुख्यमंत्री बदला जा सकता है.

ऐसी ख़बरें हैं कि भाजपा आलाकमान ने मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक को चुनाव तक दिया गया अभयदान वापस ले लिया है और पूर्व मुख्यमंत्री मेजर जनरल भुवन चंद्र खंडूरी को दोबारा मुख्यमंत्री बनाया जा सकता है.

प्रदेश में ये परिवर्तन, निशंक पर भ्रष्टाचार के बढ़ते आरोपों, हाल ही में हुए दो चुनावी सर्वेक्षणों और खंडूरी, भगत सिंह कोश्यारी और कुछ विधायकों और कार्यकर्ताओं के बग़ावती तेवर को देखते हुए किया जा रहा है.

इन दोनों सर्वेक्षणों में ये कहा गया था कि निशंक के मुख्यमंत्री रहते आगामी विधानसभा चुनाव में भाजपा मुश्किल से दस सीटें जीत पाएगी.

पार्टी के वरिष्ठ नेता और पूर्व पर्यटन मंत्री टीपीएस रावत द्वारा गठित उत्तराखंड रक्षा मोर्चा ने आग में घी का काम किया है

चर्चा ये भी थी की अगर भाजपा आलाकमान ने उनकी बात नहीं सुनी तो खंडूरी तीसरे मोर्चे का गठन करेंगे.

बताया जाता है कि इससे पार्टी आलाकमान फ़ौरन हरक़त में आया और पार्टी की संसदीय बोर्ड की बैठक में निशंक को बदलने का फैसला लिया गया.

असमंजस की स्थिति

इसकी जानकारी देते हुए मुख्यमंत्री के पर्यटन सलाहकार प्रकाश सुमन ध्यानी ने कहा, " हो सकता है निशंक जी ने ख़ुद ही पद छोड़ने की इच्छा जताई हो क्योंकि हमारे सामने 2012 के चुनाव जीतने का मिशन है "

हालांकि भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष बिशन सिंह चुफाल ने कहा कि उन्हें इस परिवर्तन के बारे में सूचना नहीं है.

लेकिन साथ ही उन्होने ये भी माना कि पार्टी की संसदीय बोर्ड की बैठक हुई है निर्णय ले लिया गया है लेकिन क्या, हमें नहीं मालूम. निशंकजी को दिल्ली बुलाया गया है इसके बाद ही निर्णय की घोषणा होगी.

ये पूछे जाने पर कि क्या इस निर्णय पर कोई रायशुमारी होगी उनका कहना था कि संसदीय बोर्ड ने जब निर्णय ले लिया है तो उसमें रायशुमारी कैसी.

बड़े फ़ेरबदल संभव

ख़बर है कि बिशन सिंह चुफाल को भी हटाकर पूर्व मुख्यमंत्री भगत सिंह कोश्यारी को पार्टी का नया अध्यक्ष बनाया जा सकता है.

इस तरह से सत्ताधारी भाजपा में इतिहास ही दोहराया जा रहा है क्योंकि दो साल पहले ऐसी ही खींचतान और गुटबाज़ी के बीच खंडूरी को हटाकर निशंक को उत्तराखंड की बागडोर सौंपी गई थी.

निशंक ने पिछले दो साल के दिन-रात हटाए जाने की अटकलों के बीच ही काटे हैं.

'मैनेजमेंट' में माहिर माने जाने वाले निशंक ने ख़ूब घोषणाएँ कीं, हेलिकॉप्टर से बेशुमार दौरे किए और समय-समय पर दिल्ली दरबार भी जाते रहे.

लेकिन उनका कार्यकाल घोटालों के लिए अधिक जाना गया. बिजली परियोजनाओं के आवंटन, कुंभ के आयोजन और सिटूरजिया जैसे मामलों में ठेकेदारों और प्रभावशाली लोगों और कंपनियों को फ़ायदा पंहुचाने के आरोप लगे.

सीएजी की रिपोर्ट में ऐसे कई मामलों में निशंक सरकार को आड़े हाथों लिया गया लेकिन मुख्यमंत्री निशंक हमेशा पार्टी हाईकमान से आशीर्वाद लेकर लौटते रहे.

बेदाग़ की दलील

निशंक अपने आप को बेदाग़ बताते रहे हैं लेकिन जवाब भी अकेले ही देते रहे हैं और अकेले इसलिए क्योंकि बीजेपी में निशंक कोई एकछत्र समर्थन नहीं रखते हैं.

हालात ये बन गए कि भाजपा सरकार के कामकाज का प्रचार-प्रसार पार्टी संगठन इतना नहीं कर रहा जितना कि मुख्यमंत्री को ख़ुद करना पड़ा. उनके मंत्रिमंडल के सभी सहयोगियों ने एक तरह से उनसे किनारा कर लिया है.

हाल ही में मुख्यमंत्री निशंक की फ़र्ज़ी पीएचडी डिग्री का मामला भी प्रकाश में आया और कांग्रेस ने उनकी शैक्षिक योग्यता के सवाल पर राज्यपाल का दरवाज़ा खटखटा डाला.

दूसरे उत्तराखंड के पूर्व आंदोलनकारियों की सूची में भी मुख्यमंत्री का नाम डालने के मुद्दे पर निशंक को विपक्ष समेत खु़द अपनी पार्टी के नेताओं की जमकर खरीखोटी सुनने को मिली.

भाजपा आलाकमान के पास ये आरोप और निशंक सरकार पर राजनीतिक हमलों की रिपोर्टें तो पहुँचती ही रहीं, इधर उसकी परेशानी ये भी बनी कि अन्ना हज़ारे आंदोलन की रोशनी में निशंक को कितने दिन और सीएम बनाए रखा जा सकता है.

माना जा रहा है कि जैसे कर्नाटक में येदियुरप्पा को हटाया वैसे ही उत्तराखंड में भी बीजेपी अपना नैतिक आधार और मज़बूत करना चाहती है.

राज्य में फरवरी के पहले विधानसभा चुनाव होने हैं.

चुनाव से ठीक पहले मुख्यमंत्री बदलने से बीजेपी को कितना फ़ायदा होगा ये देखने लायक बात है क्योंकि भाजपा ने यही दांव साल 2002 में भी खेला था जिसमें चुनाव से तीन महीने पहले नित्यानंद स्वामी को हटाकर भगत सिंह कोश्यारी को बागडोर सौंपी गई थी लेकिन पार्टी चुनाव में हार से नहीं बच पाई थी.

फिलहाल खंडूरी समर्थक जश्न की तैयारियों में मगन है और मुख्यमंत्री आवास पर सन्नाटा है. सबको इंतजार है शनिवार को होनेवाली विधायक दल की बैठक का जिसमें मुखिया बदलने के इस फैसले पर मुहर लगने की संभावना है.

संबंधित समाचार