नक्सलवाद पर चर्चा के लिए अहम बैठक

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Image caption सम्मेलन के बाद कई महत्तवपूर्ण घोषणाएं की जाएंगीं.

नक्सलवाद की समस्या पर एक नए नज़रिए से विचार करने के मक़सद से दिल्ली में 60 ज़िलों के कलेक्टरों की एक बैठक हो रही है.

ग्रामीण विकास मंत्रालय एवं योजना आयोग ने इस सम्मेलन का आयोजन किया है जिसकी शुरुआत गृह मंत्री पी चिदंबरम ने की. प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी इस सम्मेलन को संबोधित करेंगे और नक्सल-प्रभावित क्षेत्रों के लिए वे कुछ अहम घोषणाएं भी कर सकते हैं.

सम्मेलन में बिहार, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, आंध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश के नक्सल प्रभावित क्षेत्रों के कलेक्टर अपने क्षेत्र के ज़मीनी अनुभव का ब्यौरा देंगें और साथ ही अपने सुझाव पेश करेंगे.

ग़ौरतलब है कि प्रधानमंत्री नक्सलवाद को भारत की सुरक्षा के लिए सबसे बड़े ख़तरा बता चुके हैं और इस समस्या को संबोधित करने के लिए कई योजनाओं की घोषणा भी हो चुकी है.

लेकिन ये पहली बार है कि नक्सलवाद की समस्या को संबोधित करने के लिए सुरक्षा के मुद्दे के अलावा ग्रामीण विकास कार्यक्रमों पर इतने बड़े पैमाने पर ज़ोर डाला गया है.

सम्मेलन के शुरुआत में ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश ने कहा, “मैंने ख़ुद नक्सल प्रभावित राज्यों का दौरा किया है और वहां के कलेक्टरों से बातचीत की है. उनके सुझावों के आधार पर हमने अपनी प्रमुख ग्रामीण योजनाओं में कुछ बदलाव लाने का फ़ैसला लिया है.''

रमेश के मुताबिक़, "हर एकीकृत कार्य योजना (आईएपी) जिलों की अपनी अपनी कुछ ज़रूरतें हैं. आदिवासियों की ज़रूरतों को संबोधित करने के लिए हम खनिज अधिनियम में कुछ बदलाव लाने पर विचार कर रहे हैं ताकि इससे जुड़े राजस्व को आदिवासियों के साथ बांटा जा सके. इसके अलावा वनाधिकार और वन संवर्धन क़ानून में भी कुछ बदलावों की ज़रूरत है."

‘अलादीन का चिराग नहीं’

पिछले साल सरकार ने एकीकृत कार्य योजना यानि आईएपी बनाई थी जिसके तहत नक्सल प्रभावित ज़िलों में स्कूल, सड़क, पीने का पानी, स्वास्थ्य केंद्र जैसी जन सुविधाओं को मज़बूत बनाने की बात कही गई थी.

इस योजना के तहत 60 नक्सल प्रभावित ज़िलों को कुल 1,500 करोड़ रुपए आवंटित किए गए थे. हर ज़िले को 25 करोड़ रुपए देने की घोषणा की गई थी, लेकिन अब इस राशि में बढ़ोतरी की जाने की संभावना है.

साथ ही कयास लगाए जा रहे हैं कि एकीकृत कार्य योजना का विस्तार 40 और ज़िलों में किया जाएगा.

कुल मिला कर इस सम्मेलन का फ़ोकस आदिवासियों और प्रशासन के बीच विश्वास बहाली के प्रयासों पर रहेगा, ताकि उन्हें नक्सलियों की ओर मुड़ने से बचाया जा सके.

जहां तक नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में सुरक्षा प्रणाली और क़ानून व्यवस्था की मज़बूती की बात है, तो गृह मंत्री पी चिदंबरम ने सम्मेलन की शुरुआत में कहा कि क़ानून व्यवस्था बनाए रखना राज्य सरकार की ज़िम्मेदारी है और केंद्रीय सरकार केवल केंद्रीय सुरक्षा बल ही वहां भेज सकती है.

साथ ही उन्होंने कहा कि सरकार इन क्षेत्रों के लिए एक विशेष बल बनाने पर भी विचार कर रही है.

उनका कहना था, “हम नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में आड़े आने वाली मुसीबतों को समझते हैं. हम एक विशेष बटालियन का विकास करने पर विचार कर रहे हैं, जिसमें सुरक्षा और इंजीनियरिंग उसके अंश होंगें. इन क्षेत्रों में विकास सुनिश्चित करने की ज़िम्मेदारी इस बटालियन की ही होगी. लेकिन इस बटालियन को तैयार करने में थोड़ा वक्त लगेगा. इन्हें अलाद्दीन का चिराग रगड़ने से पैदा नहीं किया जा सकता.”

इन 60 ज़िलों के कलेक्टरों की मांग है कि वहां नक्सलवाद को आड़े हाथों लेने के लिए सुरक्षा बलों की तादाद में बढ़ोतरी की जाए.

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