नालंदा विवाद में फंसा कलाम का सपना

Image caption नितीश कुमार के हाथों पुरस्कार लेती गोपा सब्बरवाल और अंजना शर्मा.

बिहार में विश्व प्रसिद्ध प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय के खंडहर के पास फिर से अंतरराष्ट्रीय स्तर का विश्वविद्यालय स्थापित किए जाने की प्रक्रिया अचानक गंभीर विवादों में फंस गई है.

'नालंदा इंटरनेशनल युनिवर्सिटी' नाम से बन रहे इस महत्वाकांक्षी विश्वविद्यालय के प्रथम कुलपति के रूप में दिल्ली के एक कॉलेज की रीडर डॉक्टर गोपा सब्बरवाल की नियुक्ति विवाद का मुख्य कारण बनी है.

इस बाबत सबसे चौंकाने वाली ख़बर ये आई कि पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम ने इस विश्वविद्यालय से ख़ुद को पूरी तरह अलग कर लिया है.

डॉक्टर कलाम की ही ख़ास पहल, परिकल्पना और दिशा-दृष्टि के आधार पर बिहार में नीतीश सरकार ने नालंदा इंटरनेशनल युनिवर्सिटी (एनआईयू) खोलने के लिए 446 एकड़ ज़मीन समेत अन्य बुनियादी सहूलियतें उपलब्ध कराईं.

लेकिन इसे विडंबना ही कहेंगे कि आधारभूत संरचना पूरी किए जाने से पहले ही डॉक्टर कलाम के सपनों का यह 'ज्ञान केंद्र' कई तरह के आक्षेपों या सवालों से घिरता हुआ दिख रहा है.

ये नौबत कैसे और क्यों आई के जवाब में सबसे अधिक उंगलियाँ एनआईयू के मेंटर ग्रुप यानी सलाहकार मंडल की तरफ़ उठने लगी हैं.

नोबल पुरस्कार प्राप्त अर्थशास्त्री डॉक्टर अमर्त्य सेन की अध्यक्षता में बने इस मेंटर ग्रुप में देश-विदेश के कुछ 'चर्चित विद्वान' समेत नीतीश कुमार की पार्टी जनता दल युनाईटेड के सांसद और पूर्व नौकरशाह एनके सिंह भी बतौर सदस्य शामिल हैं.

आरोप है कि एनआईयू के लिए विदेशी आर्थिक सहायता-राशि बटोरने और पठन-पाठन के विषय तय करने से लेकर कुलपति नियुक्ति तक के मामलों में मेंटर ग्रुप की अपारदर्शी और मनमानी भूमिका दिख रही है.

समझा जाता है कि इन्हीं सब कारणों से आहत डॉक्टर कलाम ने अपने दामन पर कोई छींटा नहीं पड़ने देने की भलमनसाहत लिए हुए भारी मन से एनआईयू को नमस्कार कह दिया.

उनकी ये पीड़ा तब सामने आई, जब पटना के एक वरिष्ठ पत्रकार केके सिंह ने एनआईयू के कुलपति पद पर डॉक्टर गोपा सब्बरवाल की विवादास्पद नियुक्ति के संदर्भ में प्रोफेसर अमर्त्य सेन को लिखे पत्र की प्रति उन्हें यानी डॉक्टर कलाम को भी ईमेल कर दी.

जवाब में उनके कार्यकारी सचिव ने केके सिंह को अंग्रेज़ी में जो लिखा, उसका हिन्दी अनुवाद है, ''आप को हम ये सूचित करना चाहेंगे कि डॉक्टर एपीजे अब्दुल कलाम अब नालंदा विश्वविद्यालय से जुड़े हुए नहीं हैं.''

कुछ प्रेक्षक इस अलगाव को प्रोफेसर अमर्त्य सेन और डॉक्टर कलाम के बीच अहम का टकराव मानते हैं और कुछ की राय में इन दोनों की सोच-समझ का मौलिक फ़र्क़ आड़े आ गया.

लेकिन इस पूरे प्रकरण का सबसे विवादित पहलू ये सामने आया है कि किस योग्यता के आधार पर मेंटर ग्रुप ने दिल्ली के लेडी श्रीराम कॉलेज में समाजशास्त्र की रीडर डॉक्टर गोपा सब्बरवाल को प्रति माह पांच लाख रूपए से भी अधिक वेतन पर एनआईयू का कुलपति नियुक्त कर लिया?

विवाद ये भी है कि डॉक्टर सब्बरवाल ने दिल्ली विश्वविद्यालय की एक एसोसियेट प्रोफ़ेसर और अपनी सहेली अंजना शर्मा को साढ़े तीन लाख रूपए मासिक वेतन पर एनआईयू का विशेष कार्य पदाधिकारी (ओएसडी) नियुक्त करवा लिया.

ऐसे सवालों के घेरे में आई डॉक्टर सब्बरवाल ने अपने एक बयान में कहा है, ''प्रोफेसर अमर्त्य सेन जैसे विद्वान की अध्यक्षता वाले मेंटर ग्रुप ने मुझे योग्य पाकर ही कुलपति चुना होगा. वैसे इस पद के लिए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) द्वारा निर्धारित योग्यता जैसी कोई शर्त एनआईयू पर लागू नहीं होती. क्योंकि लगभग एक साल पहले केंद्र सरकार द्वारा बनाये गये एक अलग क़ानून के तहत इस विश्वविद्यालय का गठन हुआ है. और जहाँ तक डॉक्टर कलाम की बात है, तो वह प्रोफेसर अमर्त्य सेन के अनुरोध के बावजूद एनआईयू का प्रथम विज़िटर पद स्वीकारने को तैयार नहीं हुए थे.''

यूजीसी के नियमानुसार किसी विश्वविद्यालय के कुलपति पद पर प्रोफ़ेसर के रूप में कम-से-कम दस वर्षों के अध्यापन-अनुभव वाले व्यक्ति की ही नियुक्ति हो सकती है. डॉक्टर सब्बरवाल प्रोफ़ेसर से नींचे के रैंक में रीडर हैं.

ये भी कहा जा रहा है कि सम्बंधित केन्द्रीय अधिनियम को राष्ट्रपति की मंज़ूरी मिलने से पहले ही डॉक्टर सब्बरवाल की नियुक्ति मेंटर ग्रुप ने कर दी थी. जबकि ऐसी नियुक्ति विज़िटर की मंज़ूरी से होनी चाहिए.

पटना विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र के वरिष्ठ प्राध्यापक प्रोफेसर नवल किशोर चौधरी ने मेंटर ग्रुप की भूमिका को आड़े हाथों लेते हुए कहा,''शैक्षणिक जगत में डॉक्टर सब्बरवाल की ऐसी क्या पहचान है और उनके पास ऐसी कौन सी उच्चस्तरीय योग्यता है, जिसके आधार पर उन्हें विश्व स्तर के इस विशिष्ट विश्वविद्यालय में प्रथम कुलपति पद पर इतनी ऊंची तनख्वाह देकर बिठाया गया.''

उधर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इस मामले में अपना पल्ला झाड़ते हुए सिर्फ ये कहा कि अब एनआईयू का सारा दायित्व केंद्र सरकार पर है और शुरुआती ज़रूरतों के मुताबिक़ ज़मीन या अन्य सहयोग दे देने के बाद मौजूदा विवादों से राज्य सरकार का कोई लेना-देना नहीं है.

लेकिन नीतीश कुमार की इस सफ़ाई को ज़िम्मेदारी से बचने की बेतुकी दलील मानते हुए वरिष्ठ पत्रकार केके सिंह कहते हैं, ''कौन नहीं जानता कि पहले प्रत्यक्ष लेकिन बाद में एनके सिंह के ज़रिए अप्रत्यक्ष रूप से इस पूरे प्रकरण में नीतीश कुमार अपनी अहम भूमिका निभाते रहे हैं. इसलिए ज़ाहिर है कि मेंटर ग्रुप द्वारा की गयी नियुक्ति वाला फ़ैसला नीतीश कुमार की सहमति से ही लागू हुआ होगा.''

एनआईयू के मेंटर ग्रुप या गवर्निंग बोर्ड की जो देश-विदेश में कई बैठकें हुई हैं, उन पर अबतक दो करोड़ रूपए से भी अधिक ख़र्च हुआ, बताते हैं.

बावजूद इसके, एनआईयू में वर्ष 2013 तक पढ़ाई शुरू हो जाने संबंधी घोषणा पर अमल जैसी तत्परता कहीं दिख नहीं रही. बस दिल्ली के आरकेपुरम में बिहार सरकार ने ढाई लाख रूपए मासिक किराये पर जो खूबसूरत मकान उपलब्ध करा दिया है, उसी में एनआईयू का दफ़्तर चल रहा है.

इस बीच एक और विवाद पढ़ाई के विषयों को लेकर पैदा हो गया है. नालंदा विश्वविद्यालय की शैक्षणिक विशिष्टता में शामिल बौद्ध साहित्य-दर्शन से जुड़े अध्ययन को मेंटर ग्रुप के शासी निकाय द्वारा हाशिये पर डाल दिये जाने का आरोप लगा है.

'नालंदा महाविहार' को यहाँ पठन-पाठन से दूर कर दिये जाने की आशंका से क्षुब्ध बोद्धों ने विरोध के संकेत दे दिए हैं.

जो भी हो, इतना तो तय है कि 'प्रथम ग्रासे मक्षिका पातः' जैसे इन विवादों से अब इस अंतर्राष्ट्रीय विश्वविद्यालय को उबारने के लिए प्रबंधन-क्षमता, पारदर्शिता और नियुक्तियों में योग्यता पर लगे संदेह के दाग केंद्र सरकार को जल्दी धोने होंगे.

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