'बदले बदले से सरकार नज़र आते हैं...'

अनाज लेने आए लोग
Image caption माड़िया जनजाति के लोगों को न तो रोका गया न उनके नाम की सूची बनी

छत्तीसगढ़ के सबसे संवेदनशील अबूझमाड़ में रहने वाले माड़िया आदिम जनजाति के लोगों के लिए सोमवार का दिन और दिनों से अलग रहा.

अबूझमाड़ के सुदूर इलाकों से पैदल सफ़र तय कर ज़िला मुख्यालय नारायणपुर आए इन आदिवासियों को सोमवार को ना तो प्रशासन द्वारा रोका गया, ना उनके नामों की फहरिस्त बनाई गई और ना ही उनकी कोई वीडियो रिकार्डिंग ही कराई गई.

आदिवासियों का यह समूह अपनी मांगों को लेकर दो दिनों का पैदल सफ़र कर नारायणपुर पहुंचा था.

अबूझ माड़ के दूर दराज़ इलाकों से चलकर शहर आए लोग अनाज मांग रहे थे. उनका कहना है कि पिछले एक साल से सरकार ने जन वितरण प्रणाली के तहत मिलने वाले अनाज को कैम्पों और थानों से बाँटना शुरू कर दिया है. आदिवासियों को अपने हिस्से का अनाज लेने के लिए चालीस से पचास किलोमीटर का सफ़र पैदल तय कर अनाज लेने आना पड़ रहा है.

कुरुसनार अबूझमाड़ की पहली पंचायत है. यहाँ जनवितरण प्रणाली की दो दुकानें हैं. एक नारायणपुर ब्लाक के गाँवों के लिए है और दूसरी दुकान अबूझमाड़ के लिए. पहले यहाँ के लोगों को उनके हिस्से का चावल उनकी ही पंचायतों से मिला करता था. लेकिन अब यहाँ युद्ध जैसे हालत हैं.

पुलिस का कहना है कि इन दुकानों से मिलने वाला चावल सीधे माओवादियों तक पहुँच जाता है.

पिस रही जनता

माओवादियों की इस कड़ी को तोड़ने के लिए अब अबूझमाड़ के पुलिस या सीआरपीएफ़ कैंपों से चावल का वितरण किया जा रहा है. प्रशासन के इस नए क़दम से अबूझमाड़ के अंदर रहने वाले लोग परेशान हैं. यह चावल अबूझ माड़ में सिर्फ दो स्थानों पर मिलता है. एक कुरूसनार का पुलिस कैंप और कुरूसनार के अलावा कुक्रजोर स्थित छत्तीसगढ़ सशस्त्र पुलिस बल के कैंप से अनाज के वितरण की व्यवस्था की गई है.

पुलिस और माओवादियों के बीच चल रहे संघर्ष में अबूझमाड़ में रहने वाले आदिवासी बुरी तरह पिस रहे हैं. उनका कहना है कि पुलिस कैंप से चावल लेने वालों से सवाल-जवाब करती है. वापस गाँव जाते हैं तो माओवादी पूछते हैं पुलिस ने क्या पूछा.

कहा जा रहा है कि छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा चलाई जा रही जन वितरण प्रणाली देश भर में सबसे अच्छी है. इसके तहत ग़रीबों को एक रुपए प्रति किलो की दर से चावल दिया जाता है. लेकिन छत्तीसगढ़ में माओवादियों और पुलिस की लड़ाई का असर इस व्यवस्था पर पड़ रहा है.

पुलिस का तर्क है कि यह व्यवस्था इसलिए की गई है जिससे लोगों को सही तरीके से अनाज मिल सके. पुलिस के आला अधिकारी कहते हैं कि ऐसी खबरें आ रहीं थीं कि जनवितरण प्रणाली का अनाज माओवादी लूट लेते हैं. लेकिन प्रशासन अब कोशिश कर रहा है कि लोगों को उनका हिस्सा मिल सके.

एक साल पहले तक अबूझमाड़ के सुदूर इलाकों में अनाज राम कृष्ण मिशन के पांच केंद्र बांटा करते थे. लेकिन सरकार नें इस व्यवस्था को ख़त्म कर दिया.

मानसून के दौरान अबूझमाड़ के एक बड़े हिस्से का संपर्क देश के बाकी हिस्से से कट जाता है. इसलिए रामकृष्ण मिशन द्वारा चार महीने का अनाज पहले ही दूर-दराज के उन इलाकों में जमा कर लिया जाता था. इससे वहाँ के हालात काबू में रहते थे.

नई व्यवस्था के लागू होने के बाद से अब लोगों का बुरा हाल है.

बदला हुआ रवैया

सोमवार को अबूझमाड़ में रहने वाले सैकड़ों ग्रामीणों नें नारायणपुर जिला मुख्यालय आकर चावल वितरण की पुरानी व्यवस्था को बहाल करने की माँग की.

शायद यह पहला मौका था जब बस्तर संभाग के कमिश्नर के श्रीनिवासुलु नें जिला प्रशासन को निर्देश देकर सुदूर इलाकों से आए लोगों के लिए भोजन की व्यवस्था करवाई. सिर्फ इतना ही नहीं यह पहला मौका था जब प्रशासन के अधिकारियों नें सुदूर अंचल से आए आदिवासियों की समस्याओं को गंभीरता से सुना भी.

नारायणपुर में रहने वाले पत्रकार आलोक झा का कहना है कि उन्होंने पहली बार प्रशासन के रवैए को बदला हुआ देखा. वह कहते हैं, "इससे पहले पुलिस और प्रशासन के लोग यह मान कर चलते थे कि अबूझमाड़ से आने वाले ग्रामीण नक्सली ही हैं. ना सिर्फ उनकी तलाशी होती थी बल्कि आने वालों के नाम भी दर्ज किए जाते थे और उन्हें शहर आने से भी रोका जाता था. मगर पहली बार प्रशासन नें जिम्मेदाराना रुख अपनाया है. यह कहा जा सकता है बदले बदले से सरकार नज़र आते हैं."

नारायणपुर जिला पंचायत के अध्यक्ष बिसेल रामनाग कहते हैं कि इस पहल से सरकार ने लोगों के बीच विश्वास पैदा करने की दिशा में पहला क़दम बढ़ाया है.

बीबीसी से बात करते हुए बस्तर संभाग के कमिश्नर के श्रीनिवासुलु ने कहा कि सरकार ग्रामीणों की मांग को गंभीरता से ले रही है. उन्होंने कहा कि एक महीने के अन्दर ही पंचायतों से अनाज के वितरण की व्यवस्था बहाल कर दी जाएगी. "इतना ही नहीं यह भी सुनिश्चित किया जाएगा कि शिक्षा और स्वास्थ्य कर्मी भी अपने केन्द्रों पर जाएँ."

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