मायावती के हस्ताक्षर को तरसे अधिकारी

  • 20 सितंबर 2011
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Image caption सिर्फ़ क़ानूनी रूप से ज़रूरी फ़ाइलों पर हस्ताक्षर करती हैं मायावती

उत्तर प्रदेश सचिवालय के अधिकारियों का कहना है कि पिछले साढे चार साल के कार्यकाल में वे फ़ाइलों पर मुख्यमंत्री मायावती के हस्ताक्षर देखने को तरस गए.

यहाँ तक कि कैबिनेट सचिव और मुख्यमंत्री कार्यालय में तैनात प्रमुख सचिव भी फ़ाइलों पर हस्ताक्षर नही करते.

मुख्यमंत्री कार्यालय में तैनात विशेष सचिव फ़ाइलों पर अपने दस्तख़त से यह लिखकर भेजते हैं कि मुख्यमंत्री ने कोई प्रस्ताव स्वीकृत अथवा अस्वीकृत किया या उस पर कोई और जानकारी मांगी है.

जानकारी करने पार मालूम हुआ कि जब विभिन्न विभागों के मंत्री अथवा प्रमुख सचिव कोई फ़ाइल अनुमोदन के लिए मुख्यमंत्री को भेजते हैं तो पहले संबंधित विशेष सचिव अलग से एक डमी नोट या टिप्पणी तैयार करते हैं.

विशेष सचिव यह डमी नोट मुख्यमंत्री कार्यालय के संबंधित प्रमुख सचिव को देते हैं फिर प्रमुख सचिव सीधे अथवा अतिरिक्त कैबिनेट सचिव के माध्यम से फ़ाइल को कैबिनेट सचिव शशांक शेखर सिंह के पास ले जाते हैं.

अधिकांश फ़ाइलों का यह आख़िरी पड़ाव होता है. आम तौर पर मुख्यमंत्री की ओर से कैबनेट सचिव ही आदेश देते हैं. लेकिन कैबिनेट सचिव भी फ़ाइल पर हस्ताक्षर नही करते.

चर्चा

जानकारी करने पर मालूम हुआ कि केवल बहुत संवेदनशील और महत्वपूर्ण फ़ाइलों पर ही मुख्यमंत्री से चर्चा होती है. जानकारों के अनुसार मुख्यमंत्री केवल उन्ही फ़ाइलों पर हस्ताक्षर करती हैं, जहाँ क़ानूनी तौर पर ज़रूरी हो, जैसे गवर्नर अथवा विधान सभा को जाने वाली फ़ाइलें.

सचिवालय अधिकारियों के अनुसार मुख्यमंत्री जिन विभागों की कैबिनेट मंत्री हैं, उनकी फ़ाइलें भी इसी सिस्टम से निपटाई जाती हैं.

जानकारों का कहना है कि चौथी बार मुख्यमंत्री बनने पर मायावती इसलिए अपने को फ़ाइलों से दूर रखती हैं, क्योंकि पिछली बार ताज कोरिडोर घोटाले में वह फंस गई थी.

उस समय उनके प्रमुख सचिव पीएल पुनिया ने संबंधित फ़ाइल पर रिकॉर्ड मुख्यमंत्री का अनुमोदन रिकार्ड किया था.

इसके बाद सीबीआई जांच में पुनिया ने कहा था कि उन्होंने तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती से विचार-विमर्श के बाद उनके निर्देश पर फ़ाइल का अनुमोदन किया था.

मायावती ने अपने बचाव में कहा था कि पुनिया ने फ़ाइल उन्हें दिखाए अथवा बताए बिना अपने मन से अनुमोदन रिकॉर्ड कर दिया था.

जानकारों के अनुसार इसी अनुभव के बाद इस बार मुख्यमंत्री न तो स्वयं फ़ाइलों पर हस्ताक्षर कर रही हैं, न उनके प्रमुख सचिव या कैबिनेट सचिव.

वरिष्ठ अधिकारियों की बैठक में कैबिनेट सचिव ही उन्हें मुख्यमंत्री के निर्देशों अथवा मंशा से अवगत कराते हैं.

एक अफ़सर का कहना है कि मुख्यमंत्री ने अपने अधिकार कैबिनेट सचिव को डेलीगेट कर दिए हैं. लेकिन जानकारों का कहना है कि ऐसा कोई सर्कुलर जारी नही हुआ. इस व्यवस्था की वैधानिकता पर भी सवाल उठाये जा रहे हैं.

कैबिनेट सचिव

दरअसल उत्तर प्रदेश में कैबिनेट सचिव का पद भी पहली बार बनाया गया. पहले मुख्य सचिव ही कैबिनेट सचिव होते थे. मुख्य सचिव का पद आईएएस कैडर का पद है.

यह सवाल कई साल से अदालत में लंबित है कि क्या एक पायलट को मुख्य सचिव के ऊपर कैबिनेट सचिव पद पर तैनात करना विधि सम्मत है.

इस कार्यकाल में प्रमुख सचिव तो क्या कैबिनेट मंत्री की भी सीधी पहुँच मुख्यमंत्री तक नही है.

प्रोटोकाल नियम के अनुसार मंत्री अफ़सर के कमरे में नही जाते. लेकिन यह रोज़-रोज़ की बात है कि मंत्रिगण कैबिनेट सचिव के कमरे के बाहर उनसे मिलने का इंतज़ार करते रहते हैं.

मंत्रिगण अपने काम के लिए भी कैबिनेट सचिव से अनुरोध करते हैं. इसीलिए कई लोग शेखर को कैबिनेट सचिव के बजाय कार्यवाहक मुख्यमंत्री कहते हैं.

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