फेसबुक पर टिप्पणी के कारण निलंबन

  • 21 सितंबर 2011
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Image caption भारत में फेसबुक के कारण निलंबन का यह संभवत पहला मामला है.

भारत में फेसबुक पर टिप्पणी के कारण नौकरी से निलंबन का संभवत पहला मामना प्रकाश में आया है.

ये मामला बिहार विधान परिषद का है जहां काम करने वाले कर्मचारी मुसाफिर बैठा को सिर्फ इसलिए निलंबित कर दिया गया क्योंकि उन्होंने फेसबुक पर व्यवस्था की आलोचना की थी.

इसके अलावा एक और सरकारी कर्मचारी अरुण नारायण को भी फेसबुक पर टिप्पणी के कारण निलंबित किया गया है.

मुसाफिर बैठा के ख़िलाफ़ विभागीय जांच चल रही है और उन्हें अपना जवाब पेश करना है.

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हुआ कुछ यूं कि मुसाफिर बैठा ने अपनी भविष्य निधि के बारे में विभाग से कुछ जानकारी मांगी जिसके जवाब में उनसे कहा गया कि अकाउंट अपडेट नहीं है.

बैठा ने अधिकारी से इस तूतू मैंमैं को फेसबुक पर डाला जिस पर कई लोगों ने टिप्पणी की.. इसी बहस में बैठा ने भी ये टिप्पणी की कि दीपक तले अँधेरा है और परिषद में कई लोग नियमों की धज्जियां उड़ाते हैं.

बैठा के निलंबन पत्र में इसी बहस का ज़िक्र किया गया है.

अरुण नारायण का मामला थोड़ा अलग है. कुछ दिन पहले विधान परिषद से जद यू से जुड़े नेता प्रेम कुमार मणि को हटा दिया गया था क्योंकि मणि अपनी ही पार्टी की सरकार की आलोचना कर रहे थे.

मणि को हटाए जाने पर अरुण ने फेसबुक पर लिखा था कि सरकार को आलोचना बर्दाश्त करनी चाहिए.

उनकी टिप्पणी थी, ‘‘ नीतिश कुमार के लोकतंत्र में विचार भिन्नता उनके ही बने फासिजम में शहीद हो जाना है. आज शाम पता चला कि प्रेमकुमार मणि की विधान परिषद की सदस्यता समाप्त कर दी गई. जदयू ने सभापति के पास श्री मणि के संबंध में दल विरोधी कोई ठोस सबूत नहीं पेश किया लेकिन मतभिन्नता से संबद्व ढेर सारी कतरनें जरूर पेश कीं. मतभिन्नता तो डेमोक्रसी का आधार मानी जाती है. सभापति का इस आधार पर लिया गया निर्णय क्या जदयू के प्रति आसक्ति का भाव पैदा नहीं करता.’’

अरुण नारायण के इस बयान को आधार बनाकर उन पर भी कार्रवाई की गई है.

इस बारे में अरुण नारायण और मुसाफिर बैठा से संपर्क करने की कोशिश करने पर वो फोन पर नहीं आए.

भारतीय जनसंचार संस्थान में सोशल मीडिया पढ़ाने वाले और फेसबुक पर सक्रिय दिलीप मंडल कहते हैं कि ये मामला अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और नीतीश कुमार सरकार की निरंकुशता को दर्शाता है.

Image caption फेसबुक अब भारत में भी काफी लोकप्रिय है

उनका कहना था, ‘‘नीतीश सरकार को सब ईमानदारी का सर्टिफिकेट दे रहे थे अभी तक लेकिन ये सरकार तो फेसबुक पर एक टिप्पणी पर इतनी कार्रवाई कर रही है. संविधान में अधिकार है अभिव्यक्ति का. माना कि वो असीमित नहीं है लेकिन ये उचित नहीं है. मुसाफिर बैठा पढ़े लिखे पीएचडी स्कालर हैं. उनकी किताबें बच्चे पढ़ते हैं. अगर आज नीतीश जी ने ये किया तो कल को और राज्यों में ऐसा होगा.’’

दिलीप मंडल का कहना था कि पूरे मामले को नीतीश विरोध से इतर बड़े परिदृश्य में देखना चाहिए जहां विरोध का दायरा कम होता जा रहा है.

उनका कहना था, ‘‘ बिहार का मेनस्ट्रीम मीडिया नीतीश सरकार से बड़ी मात्रा में विज्ञापन ले रहा है. इसलिए विरोध की ख़बरें छपती नहीं हैं. वैकल्पिक मीडिया में भी लोगों का बोलना बंद होना अच्छा नहीं होगा.’’

मामला सिर्फ़ फेसबुक का नहीं है. जानकार कहते हैं कि बिहार की नीतीश कुमार सरकार आलोचना बर्दाश्त नहीं कर रही है.

सरकार की आलोचना करने वाले प्रेम कुमार मणि कहते हैं, ‘‘ एक छोटी टिप्पणी पर किसी को नौकरी से निकाल देना कहां तक उचित है. टिप्पणी भी कोई अशोभनीय नहीं है. 1946 में दिनकर ने जयप्रकाश नारायण पर कविता लिखी थी. तब तो अँग्रेज़ सरकार थी उसने भी उन्हें नौकरी से नहीं निकाला था. ये क्या करना चाहते हैं नीतीश जी.’’

मणि ने आरोप लगाया कि मुख्यमंत्री के स्तर पर अरुण नारायण और बैठा को निलंबित करने का फैसला किया गया जबकि मामला विधान परिषद का था.

उनका कहना था, ‘‘ नीतिश के एक मंत्री बैठे रहे विधान परिषद में जब तक सर्कुलर नहीं निकला. ये तो हद है. बिहार में विकास का नामोनिशान नहीं हैं. कोई ये बात कहे तो उस पर कार्रवाई हो रही है.’’

इन मुद्दों पर और ख़ासकर बैठा और नारायण के निलंबन पर जब मैंने बिहार विधान परिषद के सभापति ताराकांत झा से बात करने की कोशिश की तो सफलता नहीं मिली. सभापति के सेक्रेटरी का कहना था कि इस मुद्दे पर बात नहीं कराई जा सकती.

बिहार विधान परिषद में पचीसियों बार फोन करने के बाद उपसचिव विश्वंभर झा और सचिव बाबूलाल अग्रवाल ने कहा कि वो इस मामले पर बोलने के लिए अधिकृत नहीं हैं.

साफ था कि सरकार इस मुद्दे पर कोई सवाल सुनना नहीं चाहती है. हो भी क्यों न.जो सरकार फेसबुक पर आलोचना बर्दाश्त नहीं कर रही है वो शायद ही पत्रकारों के सवालों को बर्दाश्त करे.

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