फ़लस्तीन का समर्थन क्यों ज़रूरी है?

Image caption प्रधानमंत्री ने फ़लस्तीनी नेता महमूद अब्बास को औपचारिक चिट्ठी भी भेज दी है

भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने फ़लस्तीनी नेता महमूद अब्बास को चिट्ठी लिख कर संयुक्त राष्ट्र में सदस्यता के लिए उसके प्रस्ताव का समर्थन किया है.

इससे पहले महमूद अब्बास ने प्रधानमंत्री को लिखी चिट्ठी में फ़लस्तीनियों का समर्थन करने की मांग की थी.

भारतीय प्रधानमंत्री की चिट्ठी की जानकारी संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि हरदीप सिंह पुरी ने न्यूयॉर्क में संवाददाताओं को दी.

भारत फ़लस्तीन संबंधों पर विस्तृत जानकारी के लिए बीबीसी संवाददाता रूपा झा ने मध्य पूर्व में विशेष दूत रहे चिन्मय गरे खान से बात की.

पुराना दोस्त

चिन्मय गरे खान कहा कि भारत फ़लस्तीन को लंबे समय से सहयोग देता आ रहा है और उसकी मांग का समर्थन करता है.

भारत ने 1988 में ही फ़लस्तीनी राष्ट्र को अपनी मान्यता दे दी थी.

इस तरह भारत पहला गै़र अरब मुल्क था जिसने फ़लस्तीन को स्वतंत्र देश बनाने की मांग का समर्थन किया था.

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Image caption फ़लस्तीनी नेता महमूद अब्बास संयुक्त राष्ट्र की पूर्ण सदस्यता का प्रस्ताव पेश करने वाले हैं

उन्होंने कहा कि भारत संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का अस्थायी सदस्य है और फ़लस्तीन को उसका पूर्ण समर्थन काफ़ी मायने रखता है.

फ़लस्तीन को संयुक्त राष्ट्र की पूर्ण सदस्यता सुरक्षा परिषद की सहमति के ज़रिए ही मिल सकती है और अगर ये प्रस्ताव वहां आता है तो भारत निश्चित तौर पर उसका समर्थन करेगा.

लेकिन समस्या ये है कि सुरक्षा परिषद में अमरीका इस प्रस्ताव को वीटो कर देगा. इस तरह संयुक्त राष्ट्र की पूर्ण सदस्यता हासिल करने का फ़लस्तीन का लक्ष्य अभी थोड़ा दूर है.

लेकिन अगर संयुक्त राष्ट्र महासभा में 140 देश फ़लस्तीन की मांग का समर्थन करते हैं तो ये उनकी बहुत बड़ी राजनीतिक जीत होगी.

इसराइल

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Image caption इसराइल के प्रधानमंत्री बेन्यामिन नेतान्येहू

ये पूछे जाने पर कि फ़लस्तीन को भारत के समर्थन का भारत-इसराइल संबंधों पर क्या असर पड़ेगा जबकि दोनों देश आपस में क़रीब नौ अरब डॉलर का व्यापार करते हैं.

चिन्मय गरे खान ने कहा कि फ़लस्तीन को भारत के समर्थन का इसराइल-भारत संबंध पर कोई असर नहीं पड़ेगा क्योंकि इसराइल और भारत के संबंध पारस्परिक निर्भरता से निर्देशित हो रहे हैं, इसराइल भारत पर कोई अहसान नहीं कर रहा.

भारत इसराइल के रक्षा उत्पाद का बड़ा खरीदार है और मौजूदा वैश्विक परिदृश्य में ये एक बड़ी बात है.

तुर्की और मिस्र के साथ पिछले दिनों इसराइल के संबंध कड़वे हुए हैं. धीरे-धीरे वो अलग-थलग पड़ता जा रहा है ऐसे में वो भारत को नाराज़ करने का जोख़िम नहीं उठाना चाहेगा. और अगर वो ऐसा करता है तो अमरीका और जर्मनी को छोड़ कर किसके साथ उसकी मैत्री रह जाएगी.

चीन भी फ़लस्तीन की मांग का समर्थन करता है जबकि उसके इसराइल के साथ अच्छे व्यापारिक रिश्ते हैं.

चिन्मय गरे खान ने कहा कि इस्राइल ख़ुद दो देशों के सिद्धांत के ज़रिए समस्या के हल का पक्षधर रहा है. इसलिए इसराइल भारत के साथ संबंधों को बिगाड़ना नहीं चाहेगा.

विरोधाभास

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Image caption फ़लस्तीनी चाहते हैं कि 1967 के आधार पर देश की सीमाओं का निर्धारिण कर दिया जाए

ये पूछे जाने पर कि एक तरफ़ तो भारत फ़लस्तीनी राष्ट्र का समर्थन कर रहा है और दूसरी तरफ़ उसके धुर विरोधी इसराइल से भी उसके गाढ़े रिश्ते हैं तो ये विरोधाभास कैसे संभव है.

इस पर चिन्मय गरे खान ने कहा कि ये भारत की मज़बूती का परिचायक है कि दो धुर विरोधी भी भारत के साथ संबंध रखना चाहते हैं. अंतरराष्ट्रीय संबंध में ऐसा नहीं होता कि 'क' के साथ दोस्ती का मतलब 'ख' के साथ दुश्मनी ही हो. इसराइल ये बख़ूबी समझता है. हो सकता है कि वो थोड़ा शोर करे, नाराज़गी भी जताए लेकिन भारत के साथ संबंध ख़राब करने के विकल्प पर वो विचार नहीं करना चाहेगा.

ये पूछे जाने पर कि भारत अगर फ़लस्तीनी हित का समर्थन न करे तो क्या फ़र्क़ पड़ेगा. इसपर गरे खान ने कहा कि ऐसा होने पर भारत गुटनिरपेक्ष, अरब और मुस्लिम देशों के बीच अलग-थलग पड़ जाएगा.

इसराइल का एकतरफ़ा समर्थन करने की ये एक बड़ी क़ीमत होगी जो न तो भारत चुकाना चाहेगा और न इसराइल उस पर दबाव ही डालेगा.

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