अपराध नहीं होगी आत्महत्या की कोशिश?

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Image caption भारत में हर दिन 341 लोग आत्महत्या करते हैं.

भारत में अगले एक साल में आत्महत्या करने की कोशिश को अपराध की श्रेणी से हटाया जा सकता है.

आत्महत्या की कोशिश को अपराध की श्रेणी से हटाने के लिए दिल्ली हाई कोर्ट में दायर की गई एक जनहित याचिका के जवाब में केंद्र सरकार के वकील जतन सिंह ने कहा है कि सरकार इस दिशा में अगले एक साल में क़दम उठाएगी.

भारत में आत्महत्या की कोशिश को एक अपराध माना जाता है. भारतीय दंड संहिता के अनुच्छेद 309 के तहत आत्महत्या की कोशिश करने पर एक साल की सज़ा या जुर्माना या दोनों हो सकते हैं.

इससे पहले 2008 में क़ानून आयोग ने सरकार से सिफ़ारिश की थी कि इस क़ानून को निरस्त किया जाना चाहिए. लेकिन इस सिफ़ारिश पर सरकार का कोई जवाब न मिलने के बाद 2011 में मेंटल हेल्थ फ़ाउंडेशन नाम की ग़ैर-सरकारी संस्थान ने दिल्ली हाई कोर्ट में जनहित याचिका दायर की.

साल की शुरुआत में हाई कोर्ट ने क़ानून आयोग की सिफ़ारिश पर केंद्र सरकार का जवाब तलब किया था.

बुधवार को हाई कोर्ट में केंद्र सरकार के वकील ने कहा कि क़ानून को संशोधित कर अनुच्छेद 309 को पूरी तरह से हटाना मुश्किल होगा.

लेकिन उन्होंने बताया कि सरकार ने तय किया है कि क़ानून आयोग की सलाह को ध्यान में रखते हुए अगले एक साल में भारतीय दंड संहिता, आपराधिक प्रक्रिया संहिता यानी सीआरपीसी और साक्ष्य अधिनियम में संशोधन किया जाएगा.

राज्यों का मत

मेंटल हेल्थ फ़ाउंडेशन की महासचिव डॉक्टर सुजाता मनहाल ने बीबीसी को बताया, “कोई भी इंसान अगर ख़ुदकुशी करने की कोशिश करता है, तो इसका मतलब ये नहीं है कि वो अपनी ख़ुशी से ऐसा क़दम उठाना चाहता है. ज़ाहिर है कि आत्महत्या की कोशिश करने वाले की मानसिक स्थिति ठीक नहीं होती है और वो डिप्रेशन का शिकार होता है. ऐसे व्यक्ति को जेल की सज़ा की नहीं बल्कि मनोचिकित्सकीय मदद की ज़रूरत है. जेल जाने के बाद उस व्यक्ति को लगता है कि अच्छा होता अगर वो मर ही गया होता. तो सज़ा देने से उसकी मानसिक हालत सुधरने की बजाय और बिगड़ जाती है. आत्महत्या की कोशिश के लिए किसी को सज़ा देना जायज़ नहीं है.”

केंद्र सरकार के वकील जतन सिंह ने अदालत को बताया कि विधि आयोग के सुझावों को राज्य सरकारों का मत जानने के लिए उन्हें भेजा गया था लेकिन इस पर सभी राज्यों ने अपनी सहमति नहीं दी है.

उनके मुताबिक़ 29 राज्यों में से 25 राज्यों ने आत्महत्या को ग़ैर-आपराधिक श्रेणी में डालने पर सहमति जताई है.

भारत प्रशासित कश्मीर, बिहार, मध्य प्रदेश और सिक्किम राज्यों की सरकार अब तक इस मुद्दे पर ख़ामोश है.

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो की साल 2009 की रिपोर्ट के मुताबिक़ भारत में करीब डेढ़ लाख लोगों ने आत्महत्या की यानी हर दिन 341 लोग अपने ही हाथों अपनी जान ले रहे हैं.

आत्महत्या को बढ़ावा?

जब मैंने डॉक्टर सुजाता से पूछा कि आत्महत्या को ग़ैर आपराधिक करार दिए जाने से आत्महत्या की प्रवृत्ति को बढ़ावा नहीं मिलेगा, तो उन्होंने कहा, “ज़्यादातर लोगों को ये मालूम ही नहीं है कि आत्महत्या करना एक अपराध है. हम ये नहीं कह रहे हैं कि आत्महत्या की कोशिश को वैध माना जाना चाहिए, बल्कि हम ये चाहते हैं कि आत्महत्या करने वाले की मजबूरी को समझने की कोशिश की जानी चाहिए. सज़ा देने के बजाय सरकार की कोशिश इन लोगों को मानसिक चिकित्सा प्रदान करने की होनी चाहिए. सरकार को ऐसे प्रावधान बनाना चाहिए जिसके तहत आत्महत्या की कोशिश करने वाले को अनिवार्य मनोचिकित्सकीय मदद दी जाए.”

ग़ौरतलब है कि भारत के पड़ोसी देश श्रीलंका ने कुछ सालों पहले आत्महत्या की कोशिश को अपराध की श्रेणी से हटाया था, जबकि पाकिस्तान में आत्महत्या के मुद्दे पर भारत जैसा ही क़ानून बना हुआ है.

इसके अलावा अमरीका, ब्रिटेन, आस्ट्रेलिया, आयरलैंड जैसे देशों ने सालों पहले आत्महत्या को ग़ैर-आपराधिक क़रार दिया था.

वहीं कुछ देश ऐसे भी हैं जहां आत्महत्या को आपराधिक या ग़ैर-आपराधिक श्रेणी में नहीं रखा गया है यानी वहां का कानून आत्महत्या की कोशिश पर ख़ामोश है.

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