‘तेलंगाना में स्थितियां रुक सी गई हैं’

हड़ताल
Image caption तेलंगाना समर्थकों ने संकेत दिए हैं कि दशहरे के बाद आंदोलन तेज़ किया जाएगा.

अलग तेलंगाना राज्य की मांग को लेकर आंदोलन कर रहे संगठनों की ओर से जारी बंद और हड़ताल के माहौल के बीच पिछले 18 दिन से राज्य में अस्थिरता और जड़ता पसरी है.

हैदराबाद में स्थिति दिन पर दिन ख़राब होती जा रही है. पहले इस बात की उम्मीद की जा रही था कि दशहरा-दीवाली के आस-पास स्थितियां ठीक हो जाएंगी लेकिन फ़िलहाल सब कुछ ठप है.

गुरुवार को बंद की स्थिति ये थी कि अख़बार छपे लेकिन वो बंट नहीं पाए और फ़िलहाल स्थिति में सुधार की कोई उम्मीद भी नहीं दिखती.

राज्य सरकार कोशिश कर रही है पुलिस की ओर से कोई कार्रवाई न की जाए. इसलिए जबतक तेलंगाना समर्थकों की ओर से सार्वजनिक संपत्ति को कोई नुकसान नहीं पहुंचाया जाएगा तबतक पुलिस कार्रवाई नहीं करेगी.

इस मसले पर राज्य की कांग्रेस सरकार का रुख़ भी कुछ साफ नहीं हो पा रहा है.

हिदायत

राज्य के वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों से बातचीत के बाद यह सामने आया है कि उन्हें इस मामले में मुख्यमंत्री की ओर से नरमी से पेश आने की हिदायत दी गई है.

अधिकारियों का कहना है कि इस तरह के प्रदर्शनों में अगर सख़्ती से पेश आया जाए, तो स्थिति नियंत्रण से बाहर चली जाती है.

तेलंगाना में एक तरह से स्थितियां रुक सी गई हैं. बंद का माहौल है, सरकार की तरफ से कोई नीतिगत निर्णय नहीं लिए जा रहे हैं और तेलंगाना समर्थक अपनी बात पर अड़े हैं

तेलंगाना समर्थकों ने संकेत दिए हैं कि दशहरे के बाद आंदोलन को तेज़ किया जाएगा. ये तय है कि आने वाले महीने इस मुद्दे पर गहमागहमी भरे होंगे.

तेलंगाना के विधायकों पर भी इस्तीफे का दबाव बढ़ता जा रहा और इस आंदोलन का नेतृत्व कर रहे के चंद्रशेखर राव तेलंगाना क्षेत्र के एक बड़े नेता के रुप में उभर रहे हैं.

मौजूद परिस्थितियों में अगर राज्य में चुनाव होते हैं तो केसीआर को भले ही पूर्ण बहुमत न मिले लेकिन बड़ी संख्या में सीटें ज़रूर मिलेंगी.

ऐसी स्थिति में वो आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री बन सकते हैं.

बदलाव

तेलंगाना मामले पर 2009 से अब तक लोगों की सोच में भी काफ़ी बदलाव आया है. आंध्र प्रदेश में बहुत से लोग अब चाहते हैं कि अलग तेलंगाना राज्य बन जाए और यह मामला ख़त्म हो लेकिन फ़िलहाल इस मामले में नीतिगत रुप से कोई फ़ैसला नहीं लिया गया है.

सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि इस पूरे घटनाक्रम से राज्य में होने वाले निवेश पर ख़ासा असर पड़ा है. कई निवेशकों ने अपना पैसा निकाल लिया है और वो विशाखापट्टनम जैसी जगहों पर निवेश कर रहे हैं.

1999 से 2009 का समय आंध्रप्रदेश के लिए स्वर्णिम था लेकिन मौजूदा परिस्थितियां ख़राब हैं और अगर ये अगले दो से तीन साल इसी तरह चलता रहा तो हैदराबाद से निवेशक पूरी तरह अलग-थलग हो जाएंगे.

सच यही है कि जिस राज्य में राजनितिक उठा-पटक हो उस राज्य में कोई निवेश नहीं करना चाहता.

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