'हमले रोकने के लिए' सार्वजनिक होंगी सूचनाएं

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Image caption आरटीआई कार्यकर्ताओं की हत्याओं के बाद नागरिक संगठनों के दबाव में उनकी सुरक्षा के लिए कानून बनाने की प्रक्रिया शुरु की गई है.

भ्रष्टाचार और रिश्वतखोरी के मामलों में व्यवस्था के ख़िलाफ बिगुल बजाने वालों और आरटीआई कार्यकर्ताओं पर हमलों को रोकने के लिए केंद्रीय सूचना आयोग ने ऐसे मामलों में, कार्यकर्ताओं की ओर से मांगी गई जानकारी को सार्वजनिक करने का फैसला किया है.

इस प्रस्ताव की रुपरेखा तैयार करने वाले सूचना आयुक्त शैलेष गांधी के मुताबिक, ''केंद्रीय सूचना आयोग को किसी भी आरटीआई कार्यकर्ता की हत्या या उनपर हमले की जानकारी मिलने पर उनकी ओर से मांगी गई जानकारी को सूचना आयोग की वेबसाइट पर सार्वजनिक कर दिया जाएगा. साथ ही सूचना आयोग हत्या या हमले के मामले में पुलिस की ओर से की जा रही जांच और कार्रवाई को भी समय-समय पर सार्वजनिक करेगा.''

शैलेष गांधी के मुताबिक सूचना के अधिकार का इस्तेमाल करने वाले लोगों के लिए सूचना ही ख़तरे का सबसे बड़ा कारण बनती है. जो लोग किसी आरटीआई कार्यकर्ता या 'व्हिसल-ब्लोयर' पर इस मंशा से हमला करते हैं कि उन्हें चुप करा दिया जाए उनके लिए अब इस तरह के हमले आत्मघाती साबित होंगे.

आरटीआई कार्यकर्ताओं और भ्रष्टाचार के मामले उजागर करने वालों ने जहां एक ओर सूचना आयोग के इस फैसले का स्वागत किया है वहीं जान की रक्षा के लिए इसे नाकाफ़ी भी बताया है.

मुंबई और उसके आसपास के इलाकों में रेत माफ़िया के खिलाफ़ लड़ रही सुमैरा अब्दुलअली पर अब तक तीन जानलेवा हमले हो चुके हैं.

वो कहती हैं, ''ये एक अच्छा क़दम हो सकता है क्योंकि हमारे देश में व्यवस्था के खिलाफ़ लड़ने वालों की पहचान छिपी नहीं रहती. ऐसे में ग़लत काम कर रहे लोगों के बारे में सूचनाएं सार्वजनिक होने से हम जैसे लोगों पर हमले कुछ हद तक ज़रूर रुकेंगे.''

हालांकि सुमैरा का मानना है ये क़दम अपने आप में नाकाफ़ी है और जब तक पुलिस और न्याय व्यवस्था जबावदेह नहीं होगी तब तक इन मामलों में कमी आना नामुमकिन है.

बंगलौर में सरकारी व्यवस्था में फैले भ्रष्टाचार के खिलाफ़ लड़ रही जयश्री विजयकुमार कहती हैं, ''ऐसा क्यों है कि हमारी व्यवस्था किसी पर हमला होने या उसकी मौत होने के बाद ही हरकत में आती है और कार्रवाई करती है. हमला होने या जान चली जाने के बाद जानकारियां सार्वजनिक करने से आरटीआई कार्यकर्ता का क्या भला होगा.''

इन तमाम सवालों के जवाब में शैलेष गांधी कहते हैं, ''लगातार हो रहे ये हमले ज़ाहिर तौर पर हमारी व्यवस्था और पुलिस प्रशासन की खामियों को दिखाते हैं. लेकिन ये मामले क़ानून और प्रशासन से जुड़े हैं और सूचना आयोग के अधिकार क्षेत्र से बाहर हैं. हम अपने स्तर पर जो कर सकते हैं वो हम कर रहे हैं. बाकि ज़िम्मेदारी सरकार को ही निभानी होगी.''

सूचना के अधिकार के ज़रिए भ्रष्टाचार, भू-माफ़िया और ख़नन माफ़िया से लड़ने वालों की हत्या और उन पर हमलों के कई मामले पिछले दिनों सामने आए हैं.

भोपाल की रहने वाली शैहला मसूद, अहमदाबाद के रहने वाले अमित जेठवा और मुंबई के रहने वाले सतीश शैट्टी सहित इनमें से कई आरटीआई कार्यकर्ता ऐसे थे जिन्हें अपनी जान के ख़तरे का एहसास था और उन्होंने पुलिस-सुरक्षा के लिए अर्ज़ी दे रखी थी.

इन हत्याओं के बाद नागरिक संगठनों के बढ़ते दबाव के बीच मंत्रिमंडल ने व्यवस्था के ख़िलाफ बिगुल बजाने वालों की पहचान गोपनीय रखने और उनकी सुरक्षा के लिए कानून बनाने को मंजूरी दे दी है.

'पब्लिक इंटरेस्ट डिसक्लोज़र एंड प्रोटेक्शन फॉर पर्सन्स मेकिंग डिसक्लोज़र' नामक इस विधेयक को अब संसद में रखा जाएगा और संसद की मंजूरी के बाद ये अंतिम मंज़ूरी के लिए राष्ट्रपति के पास जाएगा.

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