इनसेफेलाइटिस- रुक नहीं रही हैं सालाना मौतें

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Image caption एनसेफेलाइटिस से हर साल कई बच्चों की मौत हो जाती है.

मौत की अराजक मनमानियों का अड्डा बन चुके गोरखपुर के बाबा राघव दास मेडिकल कालेज मे फिर वही अफरा तफरी है.

गोद में बच्चों को लेकर वार्ड की सीढ़ियों पर लपकते या फिर उन्ही मासूमों को लाश की शक्ल में गोद में उठाए टूटते कदमों से सीढियां उतरते लोग हैं.

बीच-बीच में हर साल की तरह दैनिक आधार पर लाशों की गिनती करने आया मीडिया है और कभी कभी दिल्ली या दूर दराज से आया विशेषज्ञों का दल भी दिखता है जो माथे पर हैरत की शिकन चढ़ाये यहाँ से जाता तो है पर अपने गंतव्य तक शायद इन्हें ढो नहीं पाता.

इसके साथ ही बत्तीस साल से सालाना मौतों की क्रूर कहानी में एक और अध्याय जुड़ जाता है.

पिछले दस सालों से ज्यादा समय मे यहाँ तकरीबन हर साल ऐसे ही बुरे नजारे देखे हैं मगर इस बार बर्दाश्त की जमीन दरकती महसूस हो रही है.

सोमवार को मेडिकल कालेज के गेट के बाहर एक साथ तीन परिवार गोद मे अपने लाड़लों की लाशें लिए ऑटो खोज रहे थे.

बीच बीच मे कोई माँ कपड़ों मे उन्हें बार-बार सहेजते-छिपाते हुए रह-रह कर कलपने लगती थी और ऑटो वालों से घर का रास्ता बता रहा बाप हकबकाए चेहरे से उधर दौड़ पड़ता था.

अखबार वालों को रोजाना शाम निर्विकार भाव से मौतों का ताज़ा आंकड़ा बताने वाली आवाज़ मे कल दर्द की कराह थी- ‘48 घंटे मे बारह बच्चे मर गए भाई साहब.’

बरसों तक गीता प्रेस और गोरखनाथ मंदिर के लिए मशहूर रहे गोरखपुर को अब ज्यादातर लोग उस बदनाम वजह से जानने लगे हैं जिसका नाम इन्सेफेलाइटिस है.

अखबारों, टीवी चैनलों मे मौत के ताज़ातरीन आंकड़े और ऑक्सिजन ट्यूब लगाए मासूम चेहरों की तस्वीरें साल दर साल इस छवि को ही पुष्ट कर रही हैं.

केवल बीते पांच सालों मे सिर्फ गोरखपुर मेडिकल कालेज मे इस मर्ज के चलते 3786 लोग-जिनमें नब्बे फीसदी बच्चे थे- मौत के मुंह मे पहुँच गए.

जो बच गए उनमें से भी कई स्थायी विकलांगता के शिकार होकर नर्क भुगत रहे हैं.इस साल भी जनवरी से अब तक इस रोग के शिकार होकर यहाँ पहुंचे 2339 मरीजों मे से 405 जान गंवा चुके हैं.

मौत का सालाना जलसा

इनमें गोरखपुर के अलावा कुशीनगर, महराजगंज, देवरिया और महाराजगंज के साथ साथ नेपाल और बिहार के सीमावर्ती इलाकों से आये बदनसीब भी शामिल हैं.

इस साल भी मौते सिर्फ जापानी इन्सेफ़ेलाइटिस से नहीं बल्कि उन पांच दर्जन से ज्यादा इंट्रो वाइरस से भी हो रही हैं जिनकी पहचान तक नहीं हो पाई है.

मेडिकल कालेज में बाल रोग विभाग के अध्यक्ष प्रो.केपी कुशवाहा कहते हैं, ‘‘मिलते जुलते लक्षणों के चलते वाइरस की पहचान कठिन हो जाती है मगर इस साल जैसे हालात हैं,उनमें किसी नए वाइरस की मौजूदगी की आशंका से इंकार नहीं कर सकते.’’

पुणे स्थित राष्ट्रीय विषाणु अनुसन्धान केंद्र के गोरखपुर यूनिट के प्रभारी डॉ.मिलिंद गोरे भी कहते हैं, ‘‘ अभी तक इन्सेफ़ेलाइटिस के तमाम वाइरसों में से जापानी एन्केफ़ेलाइटिस (जेई) की पहचान ही मुकम्मल तौर पर हो रही है पर इंट्रो वाइरसों के अनेक प्रकार हैं जिनकी पहचान जरूरी है.’’

इस बार एक और बुरी बात ये दिख रही है कि मरने वालों में बच्चों के अलावा बड़ों की भी तादाद काफी ज्यादा है. मुख्यतः जल जनित यह इंट्रोवाइरस इसलिए ज्यादा खतरनाक साबित हो रहा है क्योंकि इसमे मरीज को ठीक होने मे न केवल 2 से 3 हफ्ते का वक्त लगता है बल्कि हृदय में अचानक सूजन पैदा हो जाने के चलते अचानक उसकी साँसे थम जाती हैं और आप कुछ भी नहीं कर सकते.

मेडिकल कालेज मे इस वक्त भी मरीजो की भारी भीड़ है और ये भी इलाज मे लगे लोगो की मुश्किलें बढ़ा रही है.

कोई 225 मरीजों कि क्षमता वाले वार्ड मे इस वक्त 500 मरीज भर्ती हैं. गहरे अफसोस से भीगी आवाज़ मे प्रो कुशवाहा बताते हैं- ‘‘एक रात वार्ड मेन अपने दो छात्रों की मदद से मैं एक बच्चे को ऑक्सीजन ट्यूब लगा रहा था,दो और बच्चे इसी काम के लिए कतार मे थे जो हमारी मदद पाने से पहले चल बसे.ऐसी घटनाए अंदर से तोड़ देती हैं.’’

दरअसल संसाधनो की कमी से लगातार जूझते इस कालेज मे जमीनी हालत काफी बुरे हैं.2009 में मेडिकल कालेज के एपिडेमिक वार्ड के लिए राष्ट्रीय ग्रामीण स्वस्थ्य मिशन की ओर से 5 करोड़ 88 लाख रुपये का बजट मिला था.

तब प्रोफ़ेसर,लेक्चरार,सिनियर और जूनियर रेसीडेंट डॉक्टर और पैरामेडिकल स्टाफ समेत 135 पद स्वीकृत किए गए थे.ये लोग पिछले महीने तक कार्यरत थे मगर इस साल बार बार मांग के बाद एनएचआरएम ने सिर्फ 63 लाख 25 हज़ार का बजट मंजूर किया है जिससे बमुश्किल 36 कर्मचारियों को ही वेतन दिया जा सकता है.

मुश्किल है रोकथाम

अखबारी हो हल्ले के बाद प्रदेश के मुख्य सचिव ने पिछले दिनो ऐलान किया था कि पुराने बजट को फिर से मंजूरी दे दी जाएगी मगर हालात सिर्फ कागजो पर ही सुधरे हैं और संशोधित बजट न आने के चलते अब धीरे धीरे डाक्टर-कर्मचारी यहां से जाने लगे हैं.

दरअसल ये तय कर पाना हमेशा मुश्किल हो जाता है की मौतों की असल जिम्मेदार बीमारी है या सरकारों की आपराधिक हदों को स्पर्श करती उदासीनता और उपेक्षात्मक रवैया.

सांसद योगी आदित्यनाथ कहते हैं, ‘‘पिछले चौदह सालों से हर साल संसद में मैं किसी दीर्घकालिक योजना की मांग करता हूँ मगर कभी कभार की अल्पकालिक सक्रियता के अलवा कुछ ठोस योजना नहीं बनती.’’

बाल रोग विशेषज्ञ और इन्सेफ़ेलाइटिस उन्मूलन के लिए अभियान चला रहे डॉ.आरएन सिंह तो साफ़ कहते हैं कि ‘‘ सरकार पूर्वांचल के इन्सेफ़ेलाइटिस पीड़ितों की उपेक्षा सिर्फ इसलिए कर रही है क्योंकि ये गरीबों और किसानों के बच्चे हैं .सार्स और स्वाइन फ्लू जैसी संपन्न लोगों को होने वाली बीमारियों पर युद्ध स्तरीय तेजी दिखने वाली सरकारें इन्सेफ़ेलाइतिस के सवाल पर 30 सालों से चुप हैं.’’

Image caption कुछ लोगों का आरोप है कि मरने वाले गरीब परिवारों के बच्चे हैं इसलिए सरकार का ध्यान इस पर नहीं जाता है.

इस साल हाइ कोर्ट में सरकार से जवाब तलबी के बाद शासन कुछ हरकत मे आया दिखता है.अफसरों ने दौरे किए हैं. सरकार ने घोषणाएँ की हैं मगर विशेषज्ञों की माने तो सिर्फ इतने से कुछ नहीं होने वाला.

इन्सेफ़ेलाइटिस पर अनेक शोध अध्ययन करा चुकी गैर सरकारी संस्था एक्शन फार पीस,प्रास्पेरिटी एंड लिबर्टी ( एपीपीएल) के मुख्य कार्यकारी डॉ.संजय श्रीवास्तव जोर देकर कहते हैं की असली काम 'समन्वय'का है जो अब तक नहीं हो रहा.

उनके मुताबिक, ‘‘शासन,प्रशासन,चिकित्सा केन्द्रों के साथ साथ पशु चिकित्सा से जुडी एजेंसियों को एक साथ समन्वय स्थापित करना होगा क्योंकि इन्सेफ़ेलाइटिस की प्रभावी रोकथाम के लिए इंसानों के साथ-साथ जानवरों पर भी निगरानी रखनी जरुरी है जो इस रोग के संवाहक हैं.”

कुशीनगर के होलिया गाँव में इन्सेफ़ेलाइटिस उन्मूलन के लिए शुद्ध जल, मच्छरदानी सुअर बाड़ों को आबादी से दूर रखने और साफ़ सफाई पर जोर देने जैसे उपायों के चलते वहां से इस बीमारी का प्रकोप रोक देने का सफल प्रयोग कर चुके डॉ.आर एन सिंह भी दृढ़ता पूर्वक कहते हैं की अगर सही दिशा में कोशिशें हों तो रोकथाम मुश्किल नहीं.

मेडिकल कालेज से वापसी मे मन मे एक सवाल कुलबुलाता है. भोपाल गैस त्रासदी मे मारे गए एक बच्चे की अधखुली आँखों वाली एक तस्वीर पिछले 25 बरसों से पूरे देश को ऐसे खतरों के खिलाफ एकजुट कर देती है मगर पिछले 32 सालों मे अकेले इस एक शहर मे दसियों हज़ार ऐसी ही मासूम मौतों पर इस मुल्क, यहाँ के हुक्मरानो और यहाँ के लोगो की आंखे नम तक नहीं होती हैं.

कमबख्त शायद छोटे शहरों की मौते भी दोयम दर्जे मे गिनी जाती हैं.

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