महंगाई की मार ग्रामीण जनता पर

Image caption सोनाली के परिवार पर महंगाई का दबाव लगातार बढ़ने से उनका परिवार भुखमरी की कगार पर है.

महाराष्ट्र के भिवरी गांव में झुलसती हुई दोपहर का वक्त है और सूरज की तीखी रोशनी खेत के बीचों-बीच स्थित एक छोटे से कच्चे घर पर पड़ रही है.

झोंपड़ी के अंदर सोनाली बोराडे दोपहर-भोज के लिए अपने परिवार के लिए चूल्हे पर रोटी सेंक रही है. सूखी रोटियों के साथ कुटी हुई पतली सी दाल कोने में रखी है.

महाराष्ट्र के भिवरी जैसे कई ग्रामीण इलाक़ों में पिछले एक साल में खाद्य पदार्थों की क़ीमतें बहुत ऊपर पहुंच गई हैं.

हरी सब्ज़ियां जिनकी क़ीमत पांच रुपए प्रति किलो होती थी, अब 13 रुपए से कम में नहीं मिलती. उधर दाल की क़ीमतों में 23 से 30 रुपए की बढ़ोतरी हो गई है.

पिछले एक साल में भिवरी गांव के लोगों ने तेल, चीनी और दाल की खपत कम कर दी है, क्योंकि अब ये सारी चीज़ें उनकी पहुंच से बाहर हैं.

पीली साड़ी पहने दुबली सोनाली कहती हैं कि खाद्य पदार्थों का दाम में बढ़ोतरी होने के बाद से उन्हें बाज़ार जाना बिलकुल रास नहीं आता.

सोनाली कहती है, “मैं जब भी ख़रीददारी के लिए बाज़ार जाती हूं, तो कुछ भी ख़रीदने से पहले मुझे दो बार सोचना पड़ता है. बढ़े हुए दामों का मतलब है कि मैं कई चीज़े नहीं ख़रीद सकती. तो अब मैं सिर्फ़ सस्ती वाली सब्ज़ियां ही ख़रीदती हूं. ये ही तरीक़ा है जिससे परिवार के सभी लोगों का पेट भरा जा सकता है.”

सोनाली कहती है कि अब ज़रा भी और दबाव बढ़ने से उनका परिवार भुखमरी की कगार पर आ सकता है.

किसानों का त्याग

Image caption खेती में ज़्यादा फ़ायदा न मिलने की वजह से अब मजदूरों ने वैकल्पिक काम-काज ढूंढना शुरू कर दिया है.

सोनाली के घर के सामने रहने वाले शांताराम तुकाराम कात्के पिछले तीन दशकों से टमाटर की खेती कर रहे हैं.

शांताराम हर साल अपनी खेती से करीब दस टन टमाटरों का उत्पाद करते हैं. लेकिन अच्छी उपज के बावजूद उनके लिए एक इज़्जतदार ज़िंदगी का गुज़ारा मुश्किल हो रहा है.

शांताराम कहते हैं, “कीटनाशक और खेती का दूसरा सामान भी बहुत महंगा हो गया है. खेती की लागत बढ़ती जा रही है जबकि मेरे उत्पाद का बाज़ार भाव का अनुमान ऊपर-नीचे रहता है. मैं मुश्किल से अपना और अपने परिवार का गुज़ारा सुनिश्चित कर रहा हूं.”

ग्रामीण महाराष्ट्र में उन लोगों की ज़िदगी तो और भी कठिन है, जिनके पास अपनी ज़मीन नहीं है और गुज़ारा करने के लिए दूसरों की ज़मीन पर खेती करते हैं.

लेकिन खेती में ज़्यादा फ़ायदा न मिलने की वजह से अब मज़दूरों ने वैकल्पिक काम-काज ढूंढना शुरू कर दिया है.

एक वक़्त का भोजन

भारत में जहां कई परिवारों की प्राथमिकता अपने आहार में पौष्टिक तत्व सम्मिलित करने की होती है, वहीं सरकार स्कूली छात्रों को एक दिन का खाना मुहैया करवाती है.

मानव संसाधन विकास मंत्रालय के मुताबिक़ स्कूली छात्रों को मिड-डे मील देने की महत्वकांक्षी योजना 1925 से चली आ रही है.

पिछले कुछ सालों में स्कूल में बच्चों की उपस्थिति का श्रेय इसी योजना को दिया गया है.

जैसे जैसे खाद्य पदार्थों की कीमतें बढ़ रही हैं, वैसे वैसे मां-बाप अपने बच्चों को स्कूल भेज रहे हैं ताकि उनके बच्चों को कम से कम एक वक्त का खाना ठीक से मिल पाए.

लेकिन कभी कभी ऐसा भी होता है कि भ्रष्टाचार की वजह से ग़रीब छात्रों तक उनका एक वक्त का खाना नहीं पहुंच पाता.

महंगाई भारत की अर्थव्यवस्था के लिए पिछले छह वर्षों से चिंता का विषय बनी हुई है.

विश्लेषकों का कहना है कि अच्छी बारिश और उपज के बावजूद भी महंगाई रुकने का नाम नहीं ले रही है.

इंदिरा गांधी इंस्टिट्यूट ऑफ़ डेवेलप्मेंट एंड रिसर्च की निदेशक प्रॉफ़ेसर महेंद्र देव का कहना हा कि ग्रामीण इलाक़ों में खाद्य पदार्थों की क़ीमतें आधिकारिक आंकड़ों से कहीं ज़्यादा हो सकती है.

भारतीय अर्थव्यवस्था में आई मंदी का समय ठीक नहीं है. भारतीय अर्थव्यवस्था विकास और घरेलू खपत को सही पटरी पर लाने के लिए संघर्षरत है जबकि विश्व की विकसित अर्थव्यवस्थाएं मंदी की ढलान पर लगातार फिसलती जा रही हैं.

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