क्या अब भी प्रभावी हैं मज़दूर संघ?

Image caption हरियाणा में मारुति सुज़ुकी के प्लांट के सैंकड़ों कर्मचारी हड़ताल पर हैं

भारत को उदारीकरण की नीति अपनाए 20 वर्ष हो चुके हैं.

वर्ष 1991-92 में जब भारत ने अपने दरवाज़े दुनिया के लिए खोले तो विदेशी निवेश और निजीकरण को बढ़ावा दिया.

अनुमान था कि सरकारी नियंत्रण कम होने से कामगारों की स्थिति भी बेहतर होगी. लेकिन सीपीआई-एमएल न्यू डेमोक्रेसी के मज़दूर संघ की वरिष्ठ नेता अपर्णा का कहना है कि ऐसा नहीं हुआ.

वो कहती हैं कि, “बढ़ती प्रतिस्पर्धा के साथ कामगारों पर दबाव बढ़ा, ठेके पर नौकरियां बढ़ीं और मज़दूर संघों के ज़रिए कंपनियों से समझौते करने की ताकत घटी.”

साथ ही उनका मानना है कि पिछले सालों में वाम दलों के सरकार में शामिल होने से उनके कामगार समर्थक होने के बावजूद इससे मज़दूरों को बल नहीं मिला है, क्योंकि सत्ता में रहकर वो सरकारी नीतियों का ही समर्थन करते रहे हैं.

लेकिन इस बदले परिवेश में भी एक बार फिर कामगारों में मज़दूर संघ बनाने की ज़िद सामने आ रही है.

पर हालात बदले हैं और अब मज़दूर संघ बनाना ही एक संघर्ष बन गया है.

मज़दूर संघ बनाने का अधिकार

वर्ष 1926 में पारित मज़दूर संघ क़ानून के तहत कामगारों को अपने अधिकारों को सामने रखने के लिए मज़दूर संघ बनाने का हक़ है.

कामगारों को अपना संघ श्रम विभाग में पंजीकृत करवाना होता है जिसके बाद ही कंपनी उसे मान्यता देती है.

लेकिन कामगारों का आरोप है कि निजीकरण के चलते श्रम विभाग और कंपनी प्रबंधनों में मिलीभगत का चलन बढ़ा है, जिससे संघ बनाने की प्रक्रिया को दबाया जाता है.

गजराज किशोर हरियाणा के मानेसर में मारुति सुज़ुकी कंपनी के प्लांट में काम करते हैं.

प्लांट में काम करने वाले क़रीब 2,000 कर्मचारियों के साथ वो अपना मज़दूर संघ बनाने दिए जाने की मांग को लेकर हड़ताल पर हैं.

ये एक साल में इनकी तीसरी हड़ताल है.

गजराज कहते हैं, “हमारे नेताओं ने जून में संघ की अर्ज़ी डाली थी, लेकिन कंपनी प्रबंधन ने नौकरी के और अन्य दबाव डाले और उन्हें रोक दिया, अब हमें ज़बरदस्ती हड़ताल पर बैठना पड़ रहा है जबकि संघ बनाना हमारा क़ानूनी हक़ है.”

लेकिन श्रम विभाग संघ बनाने की कामगारों की अर्ज़ी में कमियां बताता है और मारुति प्रबंधन का कहना है कि श्रम विभाग के पंजीकरण से पहले वो किसी संघ को मान्यता दे ही नहीं सकते.

वहीं मारुति का आरोप है कि मज़दूर जानबूझकर काम में लापरवाही बरतते रहे हैं. प्रबंधन ये भी याद दिलाता है कि मारुति में पहले से एक मान्यता प्राप्त मंज़दूर संघ है.

लेकिन यहां काम करने वाले प्रदीप का कहना है कि, “मौजूदा मज़दूर संघ तो मैनेजमेंट की पॉकेट में है, हम उसे अपना प्रतिनिधि नहीं मानते, वो हमारे हितों के बारे में फ़ैसला नहीं कर सकते.”

एकता में विश्वास

Image caption मारुति प्रबंधन के मुताबिक कंपनी में पहले ही एक मान्यता प्राप्त मज़दूर संघ मौजूद है.

मारुति में तो स्थिति ज़्यों की त्यों बनी हुई है. लेकिन मज़दूर संघ बनाने की मांग उत्तरी भारत के वाहन बनाने के उद्योग में पहले भी उठती रही है.

वर्ष 2005 में होंडा मोटरसाइकिल और स्कूटर कंपनी में मज़दूर संघ बनाने की मांग के साथ जब हड़ताल हुई तो आखिरकार पुलिस के डंडे से ख़त्म हुई. लेकिन नतीजा ये कि अब वहां एक मज़बूत मज़दूर संघ बन गया है.

वहीं वर्ष 2009 में स्पेयर पार्ट बनाने वाली रिको कंपनी में इसी मांग के साथ हड़ताल हुई लेकिन मज़दूरों को प्रबंधन के आगे झुकना पड़ा.

संघ बनाने के इन खट्टे-मीठे अनुभवों के बावजूद मज़दूरों में एक संघ की ताकत के प्रति विश्वास बढ़ा है.

अस्थाई नौकरियों की चुनौती

मैंने बात की मानेसर में स्थित मोटरसाइकल के स्पेटर पार्ट्स बनाने वाली मुंजाल शॉ कंपनी के एक कामगार से. उनकी कंपनी में कोई मज़दूर संघ नहीं है.

वो कहते हैं, “अगर हम ठेकेदार से ऊंची आवाज़ में बात कर लें तो वो कहता है गेट पास रखो और घर जाओ, नौकरी पर हमेशा बनी रहती है, हम अकेले आवाज़ उठाने की सोच भी नहीं सकते, मज़दूर संघ हो तो हमारी मांगे तो आगे रख सकेगा.”

नौकरी खोने के डर से उन्होंने अपना नाम नहीं बताया लेकिन ये ज़रूर बताया कि उनकी कंपनी में 90 फीसदी लोग ठेके पर काम करते हैं. इनमें से कई के अनेक वर्ष काम करने के बावजूद उन्हें स्थाई नहीं बनाया गया.

बहुत कम स्थाई कामगार होने की वजह से चाहने के बावजूद वे मज़दूर संघ बनाने के लिए अर्ज़ी भी नहीं डाल सकते.

भारत में नई आर्थिक नीति लागू होने के बाद कामगारों को अस्थाई क़रार पर रखने का चलन बढ़ा है, ना सिर्फ निजी बल्कि सार्वजनिक उपक्रमों में भी.

मज़दूर संघ की वरिष्ठ नेता अपर्णा के मुताबिक ठेका कर्मचारियों को संगठित करना इस समय मज़दूर संघों के सामने सबसे बड़ी चुनौती है. वे कहती हैं कि बड़े संघों में अब भी ज़्यादा शक्ति है लेकिन छोटे संघों को अक्सर प्रबंधन के सामने झुकना पड़ता है.

इन सब चुनौतियों के बावजूद वो कहती हैं कि ये समझना ज़रूरी है कि नई आर्थिक नीतियों का सामना करते-करते कामगार एक बार फिर संगठित हों एकता की शक्ति को आज़माना चाहते हैं.

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