भू-अधिग्रहण फ़ैसले से अनेक किसान नाख़ुश

Image caption इन इलाकों में कई हज़ार लोगों ने बिल्डरों के माध्यम से मकानों की बुकिंग करा ली है. किसानों के साथ-साथ ये लोग भी परेशान हैं.

शुक्रवार सुबह से ही ज़मीन अधिग्रहण मामले में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फ़ैसले का इंतज़ार कर रहे नोएडा-ग्रेटर नोएडा के किसानों में फैसले के बाद मायूसी नज़र आई.

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने नोएडा और ग्रेटर नोएडा भूमि अधिग्रहण मामले में फ़ैसला सुनाते हुए तीन गाँवों के अधिग्रहण को रद्द कर दिया है, साथ ही मामले की जाँच के भी आदेश दिए हैं.

न्यायालय ने 63 गाँवों की सुनवाई करते हुए शाहबेरी, असदुल्लापुर और देवला के अधिग्रहण को रद्द किया है और बाक़ी के बचे गाँवों के किसानों को ज़मीनों के बढ़े हुए दामों के कारण 64 प्रतिशत ज़्यादा हर्जाना दिए जाने का आदेश दिया है.

किसानों की नाख़ुशी की दास्ताँ

फ़ैसले से नाखुश किसानों में बड़ी संख्या उन 63 गाँवों के किसानों की है जिन्हें 64 फ़ीसदी ज़्यादा हर्जाना और 10 फ़ीसदी विकसित ज़मीन देने की बात कही गई है. ये किसान चाहते थे कि हर हाल में अधिग्रहण रद्द हो.

शाहबेरी गांव के एक किसान राजबीर सिंह कहते हैं, ''इतने लंबे इंतज़ार के बाद हमें कुछ नहीं मिला है. हाईकोर्ट का ये फैसला कि आप समझौता कर लें और बढ़े हुए मुआवज़े को लेकर संतुष्ट हो जाएं ये हमें मंज़ूर नहीं.''

इटारना गांव में मौजूद पेशे से वकील और तेजपाल सिंह कहते हैं, ''हमारी ज़मीनें ग्यारह हज़ार रुपए प्रति फुट के हिसाब से खरीदी गईं और मुआवज़ा दिया गया 800 रुपए प्रति मीटर. ये फैसला किसी भी रुप में किसानों के हक में नहीं. हम इस फैसले से कतई सतुष्ट नहीं.''

किसानों की दलील है कि जिस आधार पर पहले-पहल सुप्रीम कोर्ट ने शाहबेरी गांव में ज़मीन को अनधिक्रत किया था वही आधार इन 63 गांव पर भी लागू होते हैं.

ज़्यादातर किसान ज़नीम अधिग्रहण मामले में प्राधिकरण की भूमिका को लेकर नाराज़ हैं.

किसानों का कहना है कि कोर्ट के आदेश के बाद मुआवज़े के निपटारे में भी प्राधिकरण साफगोई नहीं बरत रहा है.

नाम न छापने की शर्त पर एक स्थानीय किसान ने कहा, ''आरटीआई के ज़रिए हमें पता चला है कि पतवाड़ी गांव में किसानों को 500 रुपए मुआवज़ा दिया गया है और बिल्डरों से 2200 वसूला गया. अपने इस नुकसान की भरपाई के लिए बिल्डर मकानों का किराया बढ़ाएंगे और आम आदमी पर बोझ बढ़ेगा. सवाल ये है कि जब किसान को फायदा नहीं मिल रहा तो बिल्डरों से वसूली क्यों.''

फैसले के बाद जल्द ही किसानों के बीच अगला क़दम तय करने की गहमागहमी शुरु हो गई.

तेजपाल सिंह कहते हैं,''इस फैसले के खिलाफ़ हम 25 तारीख़ को एक महापंचायत करेंगे जिसमें कम से कम 50 गांव के किसान हिस्सा लेंगे. हमारी कोशिश है कि फैसले को लेकर किसी भी गांव के साथ भेद-भाव न हो और कोई भी गांव उपेक्षित न रहे.''

कई ख़ुश भी हैं

इस बीच देवला जैसे कुछ गांवों में खुशियों का माहौल था और अपनी ज़मीन वापस पाकर किसान बेहद संतुष्ट थे.

देवला गांव के सरपंच राजपाल सिंह कहते हैं, ''मैं हाईकोर्ट का शुक्रिया अदा करना चाहता हूं कि हमारी ज़मीन हमें वापस दे दी गई. हमारे यहां छोटे किसान हैं जो अपनी ज़मीन पर आज भी बुआई कर अपने परिवार का पेट पाल रहे हैं. इन्हें मुआवज़ा मिलता भी तो कितना इसलिए हमारे गांव का बच्चा-बच्चा इस फैसले से खुश है.''

लेकिन ज़मीन की ये जंग अभी खत्म नहीं हुई है और मामला सुप्रीम कोर्ट में पहुंचने के बाद समीकरण शायद फिर बदलें, लेकिन इस सब के बीच नहीं बदलेगी तो ज़मीन की ज़रूरत, मुनाफ़े की होड़ और दो-जून का संघर्ष.

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