खिसक रही है माओवादियों के पैरों तले की ज़मीन?

शनिवार को माओवादियों की ओर से बंद की अपील की गई
Image caption शनिवार को माओवादियों की ओर से की गई बंद की अपील के बावजूद इसका कोई खास असर नहीं पड़ा.

क्या पश्चिम बंगाल के तीन ज़िलों-पश्चिम मेदिनीपुर, बांकुड़ा और पुरुलिया में सक्रिय माओवादियों के पैरों तले की ज़मीन खिसक रही है? हाल की कुछ घटनाओं ने यह सवाल खड़ा किया है.

इन तीनों ज़िलों में स्थानीय लोगों की मदद से ही माओवादियों को अपनी ज़मीन मज़बूत करने का मौक़ा मिला था और बीते तीन वर्षों के दौरान यहां उनका जनाधार काफ़ी मज़बूत हो गया था.

लेकिन लंबे अरसे से पिछड़ेपन और बेरोज़गारी के शिकार आम लोगों में माओवादियों का ख़ौफ़ काफ़ी हद तक कम हो गया है.

जंगलमहल कहे जाने वाले माओवादी सक्रियता वाले इन इलाक़ों में विकास और रोज़गार के ज़रिए स्थानीय लोगों को माओवादियों से अलग-थलग करने के लिए मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इलाक़े के दस हज़ार युवकों को विशेष पुलिस अधिकारी के तौर पर सरकारी नौकरी देने का एलान किया था.

इस तथ्य के बावजूद कि माओवादियों ने लोगों को इस नौकरी का फा़र्म नहीं भरने की चेतावनी दी थी. बीते सप्ताह जब इसके आवेदन पत्र बंटने लगे तो बेरोज़गार युवकों की भारी फ़ौज सरकारी दफ्तर में जुट गई.

झाड़ग्राम में आवेदनपत्र लेने आए विनय महतो कहते हैं, ''मैंने तीन साल पहले बारहवीं की परीक्षा पास की थी. लेकिन इलाक़े में आगे पढ़ने की कोई सुविधा नहीं हैं. मेरे पास बड़े शहर में जाकर पढ़ने के लिए पैसे नहीं थे. अब सरकार ने एक मौक़ा दिया है तो मैं इसे क्यों छोड़ूं?''

लेकिन क्या माओवादियों से डर नहीं लगता?

इस सवाल पर वह कहते हैं कि इतने साल तो डर कर ही देख लिया. लेकिन उनके तमाम वादे हवाई ही निकले. अब यह नौकरी मिल जाए तो जीवन काफ़ी हद तक आसान हो जाएगा.

पुरुलिया में माओवादियों का गढ़ कहे जाने वाले बलरामपुर में भी विशेष पुलिस अधिकारी की इस नौकरी के लिए युवकों में भारी उत्साह है. दसवीं पास रतन दंडपत कहते है, ''अब और सहना मुश्किल है. अब नौकरी मिल जाए तभी जीवन की गाड़ी आगे बढ़ेगी.''

वह बताते है कि इलाक़े में बेरोज़गार युवकों के पास कोई काम नहीं है. उनको पैसों का लालच देकर माओवादी अपने साथ ले गए थे. लेकिन अब उनमें से ज्यादातर का मोहभंग हो चुका है.

बीते तीन वर्षों के दौरान इलाक़े में माओवादियों के निर्देश के बिना पत्ता तक नहीं खड़कता था. उनके बुलाए किसी भी बंद में कोई घर से निकलने की हिम्मत नहीं करता था. लेकिन अब यह नज़ारा भी बदल रहा है.

सरकार ने माओवादियों को हथियार डाल कर बातचीत के लिए आगे आने की ख़ातिर सात दिनों का जो अल्टीमेटम दिया था उसके आख़िरी दिन शनिवार को उन्होंने तीनों ज़िलों में बंद की अपील की थी. लेकिन पहले के बंद के विपरीत इस बार बंद का कोई ख़ास असर नहीं पड़ा.

इस बंद के दौरान इलाक़े में स्कूल, कॉलेज और बाज़ार आम दिनों की तरह खुले थे. सड़कों पर चहल-पहल सामान्य रही. पुरुलिया के ज़िलाधिकारी ए सिंह कहते हैं, ''यह पहला मौक़ा था जब मेरे ज़िले में माओवादियों का बंद पूरी तरह बेअसर रहा.''

Image caption माओवादियों के हमलों में हर साल सैकड़ो सुरक्षाकर्मी अपनी जान गवां देते है.

इस बंद के दौरान पश्चिम मेदिनीपुर ज़िले के ग्वालतोड़ थाने में पुलिस की नौकरी का आवेदन पत्र लेने आए निर्मल महतो कहते हैं, ''मुख्यमंत्री ममता बनर्जी जंगलमहल का विकास करने का प्रयास कर रही हैं. उन्होंने इलाक़े के दस हज़ार युवकों को पुलिस में नौकरी देने का वादा किया है. ऐसे में उनको एक मौक़ा दिया जाना चाहिए.''

पुरुलिया में एक दुकान चलाने वाले हीरालाल महतो कहते हैं, ''पहले मैं बंद के दौरान भूल कर भी अपनी दुकान की ओर नहीं जाता था. लेकिन इस बार मैंने निडर होकर अपनी दुकान खोली.''

राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि बंद के दिन माओवादियों की नाराज़गी का परवाह नहीं करते हुए भारी तादाद में लोगों का सड़कों पर उतरना इस बात का सबूत है कि लोगों में क़ायम आतंक कम हो रहा है. लोगों को शायद लगता है कि जब सरकार माओवादियों के साथ बातचीत की प्रक्रिया चला रही है तो ऐसे में माओवादी ऐसा कुछ नहीं करना चाहेंगे जिससे हालात बिगड़ें.

एक वरिष्ठ अधिकारी कहते हैं कि अभी कुछ कहना जल्दबाज़ी होगी. लेकिन इन घटनाओं से यह तो साफ़ है कि लोगों में माओवादियों का ख़ौफ़ धीरे-धीरे कम हो रहा है. यह एक सकारात्मक संकेत हैं.

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