हड़ताल ख़त्म, लेकिन आंदोलन जारी

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Image caption हड़ताल के कारण आंध्र प्रदेश को भारी नुक़सान हुआ है

आंध्र प्रदेश के तेलंगना राज्य में जहाँ अलग राज्य के समर्थन में सरकारी कर्मचारियों की हड़ताल ने 42 दिनों तक प्रशासन को पंगु बना कर रख दिया था, अब हालत कुछ बेहतर होने लगी है.

सोमवार रात देर तेलंगाना कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति और सरकार के बीच एक समझौते के बाद कर्मचारियों ने मंगलवार से दोबारा काम शुरू कर दिया है और काफ़ी लंबे समय के बाद हैदराबाद और अन्य नौ ज़िलों में चहल-पहल शुरू हो गई है.

यूँ तो राज्य सरकार ने कर्मचारी संगठनों की नौ मांगे स्वीकार कर ली हैं, लेकिन इसमें उस असल मांग यानी अलग तेलंगाना राज्य की स्थापना का कोई ज़िक्र नहीं है, जिसके लिए इस आम हड़ताल का आह्वान किया गया था.

नौ मांगे स्वीकार की गईं, उनमें हड़ताल की अवधि के दौरान कर्मचारियों के विरुद्ध की गई तमाम कार्रवाइयों को वापस लेना, हड़ताल की अवधि को विशेष छुट्टियों में शुमार करना, एक महीने का वेतन अदा करना और काम नहीं तो वेतन नहीं का आदेश वापस लेना शामिल है.

चर्चा

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Image caption कोदंडा राम का कहना है कि हड़ताल सिर्फ़ निलंबित की गई है

अब यह सवाल हर जगह चर्चा का विषय बना हुआ है कि क्या इस हड़ताल से अलग तेलंगाना राज्य के विषय पर कोई प्रगति हुई या फिर केवल आम लोगों और कर्मचारियों को ही कष्ट उठाना पड़ा?

हड़ताल का आह्वान करने वाली तेलंगाना राजनैतिक संयुक्त संघर्ष समिति और तेलंगना कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति दोनों ने ही इस हड़ताल को कामयाब बताया है.

प्रोफ़ेसर कोदंडा राम और कर्मचारियों की समिति के अध्यक्ष स्वामी गौड़ ने कहा कि यह कहना ग़लत है कि हड़ताल ख़त्म कर दी गई है.

गौड़ का कहना था, "यह हड़ताल केवल निलंबित की गई है, क्योंकि इससे आम लोगों को तकलीफ़ हो रही थी और फिर दिवाली और दूसरे त्योहारों की छुट्टी भी है." उधर कोदंडा राम ने कहा कि केवल हड़ताल निलंबित की गई है, लेकिन आंदोलन किसी न किसी सूरत में चलता रहेगा. उन्होंने कहा, "जब भी हम आवाज़ देंगे, कर्मचारी और सभी लोग दोबारा हड़ताल शुरू कर देंगे."

फ़ायदा

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Image caption परिवहन निगम के कर्मचारी भी लंबे समय से हड़ताल पर थे

उन्होंने कहा कि हड़ताल से इतना तो ज़रूर फ़ायदा हुआ है कि केंद्र सरकार को झुकना पड़ा है और सक्रिय रूप में गंभीरता के साथ तेलंगना के विषय पर विचार शुरू करना पड़ा है.

उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि तेलंगाना के मुद्दे पर केंद्र सरकार को संसद के शीतकालीन अधिवेशन से पहले ही कोई न कोई फ़ैसला करना पड़ेगा.

यह सवाल भी उठ रहा है कि इस मोड़ पर तेलंगाना कर्मचारियों ने हड़ताल क्यों वापस ली, जबकि केंद्र पर समस्या के समाधान के लिए दबाव बढ़ रहा था.

इसके कई कारण बताए जा रहे हैं. सबसे पहले तो यह कि जब यह हड़ताल 13 सितंबर को शुरू हुई थी तो उस समय तमाम सरकारी कर्मचारियों में जो एकता थी, वो अहिस्ता-अहिस्ता कमज़ोर पड गई.

उस समय सरकारी कर्मचारियों के अलावा अध्यापक, रोड ट्रांसपोर्ट कारपोरेशन के कर्मचारी और सिंगरेनी की कोयले की खदानों के मज़दूर भी इसमें शामिल थे.

लेकिन बाद में अध्यापक यह कह कर काम पर लौट गए कि उनकी हड़ताल से छात्रों का भविष्य ख़राब हो रहा है.

फिर आरटीसी के कर्मचारियों ने भी हड़ताल ख़त्म कर दी, क्योंकि उसके कारण एक ओर लाखों आम लोगों को तकलीफ़ हो रही थी तो दूसरी और कारपोरेशन दिवालिया होने का कगार पर पहुँच गई थी. अब सरकार उसके निजीकरण की बात कर रही थी.

इसी तरह कोयले की खदानों के मज़दूर भी हड़ताल ख़त्म करने पर मजबूर हो गए, क्योंकि कोयेले की कमी से पैदा होने वाला बिजली का संकट तेलंगना के किसानों को ही ज़्यादा नुक़सान पहुँचा रहा था.

बोझ

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Image caption कई राजनीतिक पार्टियों के नेताओं ने पार्टी लाइन से हट कर हड़ताल का समर्थन किया

स्वामी गौड़ ने कहा कि कर्मचारियों की हड़ताल निलंबित करने का एक कारण यह भी था की कांग्रेस के मंत्री और विधायक हड़ताल का साथ देने की बजाए उसका ख़ामोश तमाशा देख रहे थे और कर्मचारियों को ही सब बोझ उठाना पड रहा था.

उनका कहना है कि अगर हड़ताल के दौरन ही कांग्रेस के मंत्री और विधायक त्यागपत्र देते, तो कांग्रेस आलाकमान जल्द ही कोई फ़ैसला करने पर मजबूर हो जाती.

कांग्रेस के सांसदों पूनम प्रभाकर और वी हनुमंतराय ने भी तेलंगाना के कर्मचारियों की हड़ताल को सफल बताया है और कहा है कि उनकी क़ुर्बानियाँ बेकार नहीं जाएंगी.

पूनम प्रभाकर ने कहा कि इस हड़ताल से दिल्ली की सरकार भी हिल गई है और उसे भी जल्द फ़ैसला करना पड़ेगा.

वैस तेलंगाना संयुक्त संघर्ष समिति ने आंदोलन के अगले चरण की घोषणा भी कर दी है. उसने एक नवंबर को 'ग़द्दारी का दिन' मानाने का आह्वान किया है, क्योंकि उस दिन तेलंगाना के लोगों के विरोध के बावजूद तेलंगाना राज्य को आंध्र में मिलाकर आंध्र प्रदेश बनाया गया था.

कोदंडा राम ने कहा कि उस दिन पूरे तेलंगाना में काले झंडे दिखाकर लोग अपना विरोध प्रकट करेंगे और उसी दिन से तेलंगाना के तमाम चुने हुए प्रतिनिधि भी अनशन पर बैठेंगे.

इसके अलावा समिति नवंबर के दूसरे सप्ताह में चलो हैदराबाद कार्यक्रम आयोजित करने की तैयारी कर रही है, जिसमें तेलंगाना के ज़िलों के लाखों लोग हैदराबाद में जमा होकर नगर का घेराव करेंगे. इधर कांग्रेस के एक विधायक के वेंकटरेड्डी, जिन्होंने हाल ही में कैबिनेट से त्याग पत्र दिया था, एक नवंबर से नलगोंडा में आमरण अनशन पर बैठने की घोषणा की है और कहा है कि आवश्यक होने पर वो कांग्रेस पार्टी ही छोड़ देंगे.

संकेत

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Image caption माना जा रहा है कि अगली बार आमरण अनशन की तैयारी चल रही है

इसके साथ-साथ तेलंगाना राष्ट्र समिति के 12 विधायक भी उसी दिन से आमरण अनशन पर बैठने की योजना बना रहे हैं. समिति के पास एक ही तुरुप का पत्ता यह है कि स्वयं के चंद्रशेखर राव भी आमरण अनशन पर चले जाएं.

ऐसे संकेत है कि अगर संसद के शीतकालीन अधिवेशन तक केंद्र कोई घोषणा नहीं करता, तो राव भी आमरण अनशन पर बैठ जाएंगे.

वैसे इस हड़ताल के करण आंध्र प्रदेश की अर्थव्यवस्था पर बहुत बुरा असर पड़ा है और उसे 10 हज़ार करोड़ से भी ज़्यादा का नुक़सान हुआ है. ख़ुद राज्य सरकार की आय भी बुरी तरह प्रभावित हुई है और उसे भी लगभग 3000 करोड़ का नुक़सान उठाना पड़ा है.

तो सवाल यह है कि इतनी लंबी हड़ताल और उससे होने वाले नुक़सान के बावजूद केंद्र सरकार कोई फ़ैसला क्यों नहीं कर रही है. क्या वो तेलंगाना राज्य के ख़िलाफ़ है या किसी और कारण से उसमें देरी कर रही है.

कांग्रेस 2004 और 2009 के चुनाव में तेलंगाना राज्य का वादा कर चुकी है और 2004 के चुनाव के बाद संसद के दोनों सदनों से अपने संबोधन में तत्कालीन राष्ट्रपति अब्दुल कलाम ने भी तेलंगाना के मुद्दे का उल्लेख किया था.

दिसंबर 2009 में, जब टीआरएस के अध्यक्ष के चंद्रशेखर राव के आमरण अनशन से हालात विस्फोटक हो गए थे केंद्रीय गृह मंत्री पी चिदंबरम ने संसद में यह घोषणा की थी कि तेलंगाना राज्य की स्थापना की प्रक्रिया शुरू हो गई है.

प्रगति

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Image caption तेलंगाना आंदोलन का असर फ़िलहाल नहीं दिख रहा है

इसके बावजूद अब तक इस दिशा में कोई प्रगति नहीं हुई है. इसका सबसे बड़ा करण यह है कि कांग्रेस आला कमान पर आंध्र और रायल सीमा क्षेत्रों के अपने सांसदों और विधायकों का दबाव है कि आंध्र प्रदेश का विभाजन न किया जाए.

उन्होंने ढँके-छिपे अंदाज़ में यह धमकी दे रखी है कि अगर ऐसा किया गया, तो वो संसद और विधान सभा से त्यागपत्र दे देंगे.

मौजूदा परिस्थितियों में अगर आलाकमान तेलंगाना राज्य की मांग स्वीकार कर लेती है, तो फिर न केवल आंध्र प्रदेश में उस की सरकार गिर जाएगी, बल्कि केंद्र में भी यूपीए सरकार पर इसका बुरा असर पड़ सकता है.

आंध्र प्रदेश से कांग्रेस के जो 32 लोकसभा सदस्य हैं, उनमें 13 का संबंध तेलंगना से है और बाक़ी आंध्र और रायल सीमा के हैं.

उसके अलावा कांग्रेस आलाकमान को इस बात की भी चिंता है कि यूपीए में शामिल दलों में से कुछ तेलंगाना राज्य के विरुद्ध हैं. मिसाल के तौर पर शरद पवार की एनसीपी और ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस इसके ख़िलाफ़ हैं क्योंकि अगर तेलंगाना बन गया तो विदर्भ और गोरखालैंड राज्य की मांग ज़ोर पकड़ सकती है.

इसका अर्थ यह नहीं है कि कांग्रेस आला कमान अनिश्चित काल तक तेलंगाना के मुद्दे को लटका कर रख सकती है लेकिन वो 2014 के चुनाव तक का समय चाहती है ताकि राज्य और केंद्र में अपनी सरकारों को बचाकर रख सके.

उम्मीद

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Image caption अब नज़रे कांग्रेस आलाकमान पर हैं

कांग्रेस की अध्यक्ष सोनिया गाँधी जानती हैं कि उन्हें जल्द या देर से आंध्र प्रदेश में एक कड़वा फ़ैसला करना पड़ेगा. वो एक साथ तेलंगाना और आंध्र सीमा इलाक़ों में चुनाव जीतने की उम्मीद नहीं कर सकती.

अगर वो तेलंगना राज्य बनती है तो फिर भी वहां चुनाव जीतने की उम्मीद है. लेकिन अगर वो तेलंगाना राज्य की घोषणा नहीं करती है तो चुनाव में उसका सफाया हो जाएगा.

यह बात तय है कि तेलंगाना में 2014 में कांग्रेस का तरक्की का नारा और भाजपा का भ्रष्टचार हटाओ का नारा कुछ काम नहीं करगा और केवल अलग राज्य ही एकमात्र मुद्दा रहेगा.

अगर सोनिया गाँधी तेलंगाना का वादा पूरा कर देती हैं तो फिर भी आंध्र और रायल सीमा में स्थानीय राजनैतिक समीकरणों के करण कांग्रेस कुछ न कुछ सीटें जीत सकती है.

यह तो तेलंगानावादी आंदोलनकारी भी जानते हैं कि कांग्रेस बहुत जल्द तेलंगाना की स्थापना की घोषणा नहीं कर सकती इसलिए वो और भी लंबी लड़ाई के लिए तैयार है, लेकिन वो केवल इतना चाहते हैं कि कांग्रेस नेतृत्व तेलंगाना राज्य के लिए एक रोडमैप की घोषणा करे.

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