सांपों का मसीहा...

सिटीज़न रिपोर्टर मिंटू चौधरी (मध्य)
Image caption सिटीज़न रिपोर्टर मिंटू चौधरी और उनके साथी हर घायल-चोटिल सांप का इलाज खुद अपने पैसों से करते हैं.

लाखों साल पहले धरती की गहराई से निकलकर सांप ज़मीन पर आए और जंगलों को अपना बसेरा बनाया.

लेकिन बाघ, तेदुंए और गिरगिट की तरह एक बेहतरीन शिकारी माना जाने वाला ये खूबसूरत जीव, अज्ञानता, अंधविश्वास और डर के चलते तेज़ी से मौत का शिकार हो रहे हैं.

सिटीज़न रिपोर्ट में सांपों के एक मसीहा मिंटू चौधरी की कहानी:

"मेरा नाम मिंटू चौधरी है और मैं पश्चिम बंगाल के जलपाइगुड़ी इलाके में रहता हूं. बचपन की एक घटना ने मुझे सांपों के प्रति उत्सुक बनाया और मेरी ज़िंदगी के लिए मकसद तय कर दिया.

मिंटू चौधरी की रिपोर्ट सुनने के लिए क्लिक करें

दस साल की उम्र में मेरे एक दोस्त को सांप ने काट लिया और उसके परिवारवालों ने उसे अस्पताल ले जाने के बजाय ओझा और झाड़-फूंक का रास्ता अपनाया.

काफी कोशिशों के बाद भी उसे बचाया नहीं जा सका और शव को आखिरकार नदी में बहा दिया गया.

इस घटना ने मुझे झकझोर कर रख दिया और मेरे मन में सवाल उठा कि आखिर क्या वजह है कि सांपों के साथ इंसान का रिश्ता डर और अंधविश्वास का है.

इस घटना के बाद मैंने सांपों को जानने और इंसानों के साथ उनके रिश्ते को समझने की कोशिशें शुरु कीं और सांपों के संबंध में कई किताबें पढ़ी. मैंने जंगलों में जाकर सांपों को देखना, समझना उन्हें पकड़ना शुरु किया.

सांपों से इंसान का रिश्ता

मेरी कोशिश रहती थी कि मैं ये जानूं कि अलग-अलग तरह के सांप कैसे रहते हैं, कैसे चलते, क्या खाते हैं और इंसान को अपने नज़दिक पाकर क्या प्रतिक्रिया करते हैं.

Image caption मिंटू चौधरी ने अकेले अपने दम पर पश्चिम बंगाल के सुदूर इलाकों में सांपों का अध्ययन कर एक प्रामाणिक किताब तैयार की.

अपने इस अनुभव से मैंने जाना कि सांप पकड़े जाने पर या यूं ही किसी को नहीं काटता वो खुद को खतरे में पाकर ही इंसान पर हमला करते हैं. साथ ही भारत में मौजूद सांपो की सिर्फ दो फ़ीसदी प्रजातियां ही ज़हरीली हैं, जबकि आमतौर पर हम ज़हर के डर से सांपों को देखते ही मार देते हैं.

भारत में सांपों की कई दुर्लभ प्रजातियां मौजूद होने के बावजूद उनके संरक्षण के लिए करागर क़दम नहीं उठाए गए हैं.

ऐसे में मैं ने अकेले अपने दम पर पश्चिम बंगाल के इन इलाकों में सांपों का अध्ययन किया और एक प्रामाणिक किताब तैयार की. सांप न केवल हमारे ईकोसिस्टम का हिस्सा हैं बल्कि इंसानी ज़िंदगी के लिए बेहद ज़रूरी भी.

वर्ष 1972 में वन्यजीव सुरक्षा कानून बनने के बाद मैंने वन विभाग और कुछ वॉलिंटीयर्स के साथ मिलकर काम करना शुरु किया. वन विभाग के अधिकारियों के कहने पर मैंने आम लोगों को सांपों के बारे में जागरुक करने की मुहिम छेड़ी.

हमारा मकसद सांप और आम-लोगों के बीच एक रिश्ता कायम करना और दोनों की ज़िंदगी बचाना है.

कहीं भी कभी भी किसी रिहाइशी इलाके में सांप के मौजूद होने पर मुझे और मेरी टीम तुरंत सूचना दी जाती है.

मैं और मेरे साथी हर घायल-चोटिल सांप का इलाज खुद अपने पैसों से करते हैं, और फिर उन्हें जंगलों में छोड़ देते हैं. इन कोशिशों को आगे ले जाते हुए सांपों की दुर्लभ प्रजातियों की रक्षा मैंने एक स्नेक पार्क बनाने की योजना सामने रखी.

लेकिन पिछले कई सालों से इस मसले पर लगातार वन विभाग के चक्कर काटने और आश्वासनों के बावजूद कुछ नहीं हो सका है.

भारत के इन सुदूर इलाकों में सांपों की दुर्लभ प्रजातियों के संरक्षण को लेकर सरकार भले ही गंभीर न हो लेकिन मैं और मेरे साथी ज़्यादा से ज़्यादा लोगों को इस बेज़ुबान जीव के बारे में बताने और उसे बचाने की कोशिशों में जुटे हैं.

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