राजीव हत्याकांड: दोषियों की सज़ा माफ़ी का कड़ा विरोध

राजीव गांधी इमेज कॉपीरइट AP
Image caption राजीव गांधी का हत्या एक चुनावी रैली के दौरान कर दी गई थी.

केंद्र सरकार ने पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के हत्यारों की उस अर्ज़ी का कड़ाई से विरोध किया है जिसमें उन्होंने अपनी फांसी की सज़ा माफ़ किए जाने की प्रार्थना की है.

समाचार एजेंसी पीटीआई का कहना है कि केंद्र सरकार ने मुरूगन, संथन और पेरारिवलन की याचिका के जवाब में दाख़िल किए गए हलफ़नामे में कहा है कि क्षमा याचिका के निपटारे में हुई देरी मौत की सज़ा से माफ़ी का वैध कारण नहीं हो सकती है.

केंद्र के शपथ-पत्र में कहा गया है, "चाहे इसमें कितना भी समय लगा हो, इसमें सज़ा माफ़ किए जाने जैसी कोई परिस्थिति नहीं बनती है या इसे मौत की सज़ा में बदलाव का वैध कारण नहीं समझा जा सकता है. वैसे भी किसी भी सूरत में ये अपराध की जघन्यता को किसी तरह कम नहीं करता."

चेन्नई हाई कोर्ट की एक खंडपीठ ने 30 अगस्त को राजीव गांधी की हत्या के दोषियों मुरूगन, संथन और पेरारिवलन की फांसी पर आठ हफ्तों के लिए रोक लगा दी थी.

राजनीति

तमिलनाडु में राजीव गांधी के हत्यारों की फांसी की सज़ा एक राजनीतिक मुद्दा बना हुआ है.

तमिलनाडु विधानसभा ने सर्वसम्मति से एक प्रस्ताव पारित कर राष्ट्रपति से अपील की थी कि इन तीनों को क्षमादान दिया जाए.

तमिलनाडु की लगभग सारी पार्टियां इस पक्ष में एकमत हैं कि दोषियों को फांसी न दी जाए.

पूर्व मुख्यमंत्री करुणानिधि ने तो यहां तक कहा है कि अगर इन लोगों की मौत की सज़ा रद्द कर दी जाती है, तो तमिल लोग ख़ुश होंगे.

भारत के पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या 21 मई, 1991 को श्रीपेरंबदूर में एलटीटीई के एक आत्मघाती हमले में कर दी गई थी. हमलावर ने शरीर से विस्फोटक बांध रखे थे और राजीव गांधी के पैर छूते ही उसने धमाका कर ख़ुद को उड़ा दिया था.

सुनवाई स्थगित

शुक्रवार को जब मामला अदालत में आया तो जजों ने इसकी सुनवाई 29 नवंबर तक के लिए स्थगित कर दी.

ये फैसला इसलिए लिया गया क्योंकि सुप्रीम कोर्ट इसी मामले में एक अर्ज़ी की सुनवाई कर रहा है जिसमें मामले को चेन्नई के अलावा किसी दूसरे उच्च न्यायालय में स्थानांतरित करने की अपील की गई है.

पीटीआई का कहना है कि केंद्र सरकार की तरफ़ से गृह मंत्रालय के संयुक्त सचिव जेएल चुग ने अदालत में दाख़िल शपथ-पत्र में स्पष्ट किया है कि संविधान की धारा 72 के तहत राष्ट्रपति को जो अधिकार दिए गए हैं वो, "स्वनिर्णयगत हैं" जिसे अन्य किसी भी प्रावधान के भीतर कम नहीं किया जा सकता है.

केंद्र का कहना है कि कड़ी सज़ा ही किसी को भी भविष्य में ऐसे अपराध करने या फिर किसी भी आतंकवादी संगठन से संबंध क़ायम करने से रोक सकता है.

ये भी साफ़ किया गया है कि उच्चतम न्यायालय ने निचली अदालत के ज़रिए दी गई सज़ा को सही माना है. साथ ही इस मामले में दाख़िल की गई पुर्नयाचिका को भी सुप्रीम कोर्ट ने ख़ारिज कर दिया था.

ग़लत उदाहरण

हलफ़नामे में कहा गया है, "सिर्फ़ इसलिए कि कुछ गणमान्य व्यक्तियों, सामाजिक संस्थाओं, राजनीतिक दलों, सांसदो, विधायकों और पूर्व जजों ने इस मामले में तमिलनाडु सरकार या राष्ट्रपति को चिट्ठी लिखी है, मौत की सज़ा को आजीवन कारावास में नहीं बदला जा सकता है."

अगर ऐसे विचारों को क़ानूनी तौर पर वैध या दोषियों की सज़ा को आजीवन कारावास में बदलने के लिए काफ़ी मान लिया गया तो ये एक बड़ा ही बुरा उदाहरण बन जाएगा जो भविष्य में सामुदायिक और धार्मिक विरोधों और अशांति का कारण बन सकता है.

शपथ-पत्र में ये भी आरोप लगाया गया है कि कुछ राजनीतिक दल और सामाजिक संस्थाएं अपने स्वार्थ के लिए अभी भी एलटीटीई का समर्थन कर रहे हैं.

तमिलनाडु का शपथ-पत्र

केंद्र ने कहा है कि मुरूगन और संथन श्रीलंका के नागरिक और एलटीटीई के चरमपंथी थे जो राजीव गांधी की हत्या के इरादे से चोरी-छूपे भारत में घूसे थे.

अलग से दाख़िल किए गए एक शपथ-पत्र में तमिलनाडु सरकार ने कहा है कि राज्य सरकार ने दया याचिकाओं को ख़ारिज कर दिया था क्योंकि मामले में दया की गुंजाईश के लिए कोई वजह नहीं थी.

संबंधित समाचार