सलाख़ों से मिले 'ज़ख़्म'

कश्मीर के जेल में बंद बच्चे हदस के शिकार
Image caption सोलह का भी नहीं हुआ था उमर जब उसे जेल भेज दिया गया.

कश्मीर में रहने वाला 16 साल का उमर पिछले साल 35 दिन तक जेल में बंद था. इस दौरान उसके साथ क्या-क्या हुआ यह पूछे जाने पर वह केवल शून्य में ताकता रहा.

उमर को 15 साल की उम्र में स्थानीय पुलिस पर पत्थर फेंकने के लिए पट्टन से गिरफ़्तार किया गया था. अब उसे वर्दी पहने हर आदमी से डर लगता है.

दर्जन भर अन्य प्रदर्शनकारियों के साथ उमर को एक सुनसान माचिस के कारख़ाने में रख़ा गया था. बाद में उसे बारामुल्ला ज़िला जेल भेज दिया गया.

उमर को ज़मानत तो मिल गई पर उस पर हत्या की कोशिश, आगज़नी समेत कई आरोप लगा दिए गए.

उसके पिता इन आरोपों को ख़ारिज करते हैं.

क़ानून की निगाह में कौन है किशोर?

उमर उन सैकड़ो किशोरों में से एक है जिन्हे पिछले साल हुए एक बड़े अलगाववादी अभियान के बाद गिरफ़्तार कर जेलों में रखा गया था. स्थानीय मानवाधिकार संगठन किशोरों को जेल में डालने की सरकार की नीति का विरोध करती आई है.

मानवाधिकार संगठन राज्य के कानून में बदलाव चाहती हैं. फ़िलहाल मौजूद क़ानून के तहत 16 वर्ष से ज़्यादा उम्र के किशोरों को व्यस्क माना जाता है. जबकि, भारतीय क़ानून में 18 वर्ष से ज्यादा की उम्र वालों को व्यस्क माना जाता है.

बाल अधिकारों के लिए काम करने वाले वकील अब्दुल राशिद इस क़ानून को मज़ाक़ मानते है.

उनका कहना है, "16 से 18 साल के बालकों को जेल में भर दिया जाता है और कहा जाता है कि वहां कोई अव्यस्क नहीं है. हम चाहते है कि राज्य के क़ानून को देश के कानून के समानांतर किया जाए."

मानवाधिकार संगठनों के मुताबिक किसी अव्यस्क को जेल में डालना संयुक्त राष्ट्र के बाल अधिकार कन्वेंशन का उलंघन है.

शासन के दो प्रणालियों के बीच मतभेद के बावजूद, उमर और उस जैसे कई किशोर 16 साल की उम्र पार करने से पहले ही जेल में डाल दिए गए.

बदले की भावना

Image caption कश्मीर में ऐसे सैंकड़ो बच्चे हैं जो मुख्यमंत्री की घोषणा के बावजूद आज भी जलों में बंद हैं.

शुरूआती दौर में स्थानीय पुलिस स्टेशन में बेत से पिटाई के बाद उमर को और कोई यातना नहीं दी गई थी.

लेकिन, चोर, उचक्के और हत्या के आरोप मे पकड़े गए लोगो के साथ बिताए गए उन पाँच हफ़्तों को याद करते ही उमर सिहर उठता है.

उमर के घरवालें उसके व्यवहार में बदलाव को महसूस करते है, उनका कहना है कि अब वो उग्र भी हो उठता है.

जेल भेजे जाने से पहले उमर एक डॉक्टर बनना चाहता था, पर अब उसका मन पड़ाई से उठ चुका है. उसे हर महीनें अदालत में पेश होना पड़ता है.

उमर ने कहा, "अदालत में हर बार जज मुझसे मेरा नाम पूछते है और अगली तारीख़ दे देते है, काश वो मेरी भी बात सुनते!"

उमर के मुताबिक जेल जाने के बाद उसकी ज़िंदगी ही बदल गई.

उसने कहा, "पहले बेफ़िक्री से खेला करता था पर अब अदालत के लिए तैयार रहना पड़ता है. अदालत की तारीख़ छूट जाने पर पुलिसवाले घर आ जाते है. मैं डरा हुआ हूँ."

प्रख़्यात मनोचिकित्सक डॉक्टर अरशद हुसैन के मुताबिक किशोरों का जेल में व्यवहार परिवर्तन काफ़ी तेज़ी से होता है.

राज्य के आंतरिक मंत्री नासीर असलम से जब इस संबंध में बात की गई तो उन्होने कुछ भी कहने से इंकार कर दिया. लेकिन अधिकारियों का कहना है कि इस समस्या को सुलझाने के लिए सरकार श्रीनगर के पास बाल सुधार केंद्र खोल रही है.

पुनर्वास योजना

इन किशोरों को जहाँ आश्रय मिला हुआ है वहाँ कम से कम दस किशोर और रह रहे हैं.

इनमें से एक का कहना है कि यहाँ पर पढ़ाई और खेल-कूद की कोई सुविधा नहीं है और वे केवल सोकर अपना वक्त गुज़ारते हैं.

प्रशासनिक अधिकारी बशीर अहमद का कहना है कि हम इन बच्चों को जल्द ही खेल-कूद के अलावा पढ़ाई की भी सुविधा मुहैया कराएंगे.

इन बच्चों के लिए अभियान चलाने वाले कार्यकर्ताओं का कहना है कि बाल सुधार गृह तो बना दिए गए हैं लेकिन बच्चों के पुनर्वास के लिए सुविधाएं नहीं दी गई हैं.

हाल ही में मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने उन लोगों को माफ़ी देने की घोषणा की थी जिन लोगों पर कम गंभीर आरोप लगे थे. लेकिन अभी भी उनमें से ज़्यादातर जेल में ही हैं.

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