सात अरबवीं संतान और सवाल

  • 1 नवंबर 2011
नरगिस और उसके माता-पिता इमेज कॉपीरइट BBC World Service
Image caption दुनिया की सात अरबवीं संतान नरगिस की माँ विनीता और पिता अजय पहले से ही बेटी चाह रहे थे

विनीता, राधा, प्रेमा और गायत्री.ये चारों लखनऊ के ग्रामीण क्षेत्र माल की महिलाएँ हैं. लेकिन संतान को लेकर इन सबके अलग-अलग विचार हैं. इन्हें समझे बिना देश की बेतहाशा बढ़ती आबादी को रोकना अथवा स्त्री–पुरूष के बिगड़े लिंग अनुपात को संतुलित करना संभव नही होगा.

विनीता उस युवती का नाम है, जिसकी बच्ची नरगिस को एनजीओ प्लान इंटरनेशनल और वात्सल्य ने सोमवार को सांकेतिक रूप से दुनिया के सात अरबवें व्यक्ति का महत्व दिया.

विनीता और उनके पति अजय के मुताबिक़ वे लोग पहले से ही भगवान से मना रहे थे कि उनकी पहली संतान लक्ष्मी रूपी कन्या हो.इसीलिए उन्होंने पहले से उसका नाम भी नरगिस सोच रखा था.

पति-पत्नी दोनों हाईस्कूल फेल हैं. ग्रामीण इलाके के हिसाब से उन्हें पढ़ा लिखा और जागरूक माना जा सकता है.

लेकिन विनीता की ही बड़ी बहन राधा सिंह शायद इतना भी नही पढीं और उनकी सोच बिलकुल अलग है.

बेटे अमर सिंह को गोद में लिए राधा भी मुझे माल अस्पताल में हुए उस जलसे में मिलीं जिसमे नरगिस का जन्मोत्सव किसी राजकुमारी की तरह धूमधाम से मनाया गया.

लड़का क्यों

राधा चार बच्चों की माँ है. राधा की पहली, दूसरी और तीसरी संतान लडकियाँ थीं. इसलिए उसे “हम दो हमारे दो” का सिद्धांत पसंद नही आया और उसने चौथा बच्चा किया, जो लड़का है.

मगर राधा ने ऐसा क्यों किया?

वो कहती है,"लड़कियाँ तो शादी करके अपने घर चली जाएँगी. बुढापे में तो लड़का ही लुटिया पानी देगा.खेती बारी संभालेगा."

राधा से मिलकर मै अस्पताल की तरफ गया, जहाँ पोर्च के नीचे खडी कई महिलाएँ आपस में बात कर रही थीं. इन्ही से में एक हैं प्रेमा जो ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन कार्यक्रम में आशा बहू का काम करती हैं.

प्रेमा ने अपने मायके का जो किस्सा बताया वह गहराई से सोचने को विवश करता है कि आखिर हमारे समाज में आम लोगों की परंपरागत सोच क्या है?

प्रेमा का कहना है कि उनके मायके में एक महिला ने दसवें बच्चे को जन्म दिया है जो लड़का है. लेकिन जच्चा-बच्चा दोनों की सेहत बहुत खराब है. बच्चा तो कमजोर और बीमार है ही , माँ भी मरणासन्न है.

इस महिला ने दसवाँ बच्चा पैदा करने का जोखिम इसलिए लिया क्योंकि उसके पहले सभी नौ लडकियां पैदा हुईं. इनमे से तीन तो आपरेशन से हुईं थीं. लेकिन लड़के की चाहत ऐसी कि महिला ने अपनी जान जोखिम में भी डालकर दसवाँ बच्चा किया.

प्रेमा के साथ खडी महिलाओं का कहना था कि,"वंश तो लड़का ही चलाएगा, इसलिए चाहे साठ भी लडकियां हो जाएँ सब नाश हैं."

मगर ऐसा भी नही कि केवल लड़के ही लड़के चाहिए. प्रेमा का कहना है कि उसे इस बात पर गाली मिल रही है कि उसने तीनों लड़के ही क्यों पैदा किये?

हाल ही में नवरात्रि के दौरान उसने कुँवारी खिलाने के लिए अपनी देवरानी की लड़की को बुलाया तो उसने यह कहकर भेजने से मना कर दिया कि उसके केवल लड़के हैं और लड़की नहीं.

बदलाव

बात करते करते प्रेमा को उसके परिवार का कोई पुरुष दिखा गया तो उसने फ़ौरन घूँघट निकाल लिया.

घूँघट के अंदर से बात करते हुए प्रेमा ने कहा अब कोई चाहे जो कहे, वह आशा बहू का काम कर रही है और गाँव की महिलाओं को समझाती है कि बच्चे कम पैदा करो और लड़का लड़की जो भी हो उससे संतोष करो.

यह बात दीगर है कि सदियों पुरानी सामाजिक. आर्थिक और सांस्कृतिक व्यवस्था के चलते अभी लोगों की सोच नही बदल रही है.

इन्ही में से एक मुद्दा है बच्चे रोकने के बारे में परिवार नियोजन के उपाय अपनाने का. कई महिलाओं का कहना था कि बच्चे तो ईश्वर की देन हैं, उन्हें इंसान कैसे रोक सकता है.

जलसे में आई ये सब महिलाएँ तमाशा देखने आई थीं. मंच से खडी बोली हिन्दी में जो बातें कही जा रही थीं और बैनरों पर अंग्रेजी में जो लिखा वह बहुत कुछ उनकी समझ से परे था.

लेकिन माल की ही रहने वाली गायत्री देवी को मंच पर बैठने और भाषण देने का भी मौक़ा मिला. कार्यक्रम संचालक उन्हें महारानी गायत्री सिंह कहकर संबोधित कर रही थीं.

गायत्री सिंह अंग्रेजी पढ़ी लिखी सोशल वर्कर हैं और ग्राम प्रधान रह चुकी हैं. शायद इसलिए उन्हें दिल्ली, मुंबई और लखनऊ जैसे महानगरों से आई नामी-गिरामी और रईस महिला सोशल वर्कर्स के साथ मंच पर बैठने और भाषण देने का मौक़ा मिला.

गायत्री सिंह ने अपने भाषण में इस बात पर जोर दिया कि लड़कियों की शादी अठारह साल से पहले कतई न की जाए.

गायत्री सिंह ने अपने भाषण में जब स्थानीय अवधी भाषा का पुट दिया तो वह तुरंत जलसे में आई महिलाओं से भावनात्मक स्तर पर जुड गयीं और लोगों को उनकी बात सहज समझ आने लगी.

सांकेतिक संदेश

लेकिन अगर कुछ गरीब और साधारण परिवारों की विनीता, राधा और प्रेमा जैसी महिलाओं को मंच पर लाकर रोल मॉडल की तरह पेश किया जाता तो शायद जनसंख्या नियंत्रण और लिंग भेद के खात्मे की बात आम लोगों को ज्यादा समझ में आती.

बाद में गायत्री सिंह ने कहा,"महत्व इसलिए लड़कों को दिया जाता है कि लोग सोचते हैं वंश लड़का चलाता है. मगर आजकल ऐसा है नही.आजकल लड़कियों का महत्व बिल्कुल लड़कों के बराबर है. लड़कियाँ क्या नही कर सकतीं? हमारे चार लडकियाँ और एक लड़का है और चारों लड़कियों से हमें इतनी खुशी मिली है कि हम वर्णन ही नही कर सकते."

गायत्री सिंह कहती हैं,"पुरानी सोच बदलने के लिए लड़कियों को पढ़ा लिखाकर अपने पैरों पर खडा करना होगा, न कि यह कि वह केवल हाउस वाइफ या घरवाली बने."

गायत्री सिंह के अनुसार शिक्षित और आर्थिक दृष्टि से आत्मनिर्भर महिला ही नया सोच अपना सकती है.

लखनऊ से आई एनजीओ वात्सल्य की मुख्य कार्यकारी अधिकारी डाक्टर नीलम सिंह का कहना है कि लड़कियों के बारे में लोगों की सोच बदले, उनकी भ्रूण ह्त्या न हो और परिवार में लालन पालन में भेदभाव न हो इसीलिए सात अरबवें बच्चे की शिनाख्त में जानबूझकर सांकेतिक रूप से एक लड़की को चुना गया.

माल के अस्पताल में इतवार की रात बारह बजे से सुबह सात बजे तक छह बच्चे पैदा हुए. इनमे से चार लड़के और दो लडकियां थीं.

लेकिन जलसे में लड़कों का कोई जिक्र भी नही हुआ. यह लड़कियों का दिन जो था.

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