जी-20 शिखर बैठक में यूरोप पर चर्चा

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Image caption अमरीका और एशियाई देशों ने यूरोप से अपने मसले जल्दी सुलझाने के लिए कहा है

पिछले तीन साल से दुनिया को मंदी से निकालने का प्रयास कर रहे समूह जी-20 के नेताओं की कान में शिखर बैठक हो रही है.

दुनिया की 20 महत्वपूर्ण आर्थिक शक्तियों के नेताओं के दो दिन के सम्मेलन में मुख्य चर्चा यूरोपीय देशों के वित्तीय संकट और ख़ासतौर पर ग्रीस की स्थिति को लेकर हो रही है.

बैठक के पहले दिन आज बैठक की अध्यक्षता कर रहे फ़्रांस के राष्ट्रपति निकोला सारकोज़ी ने अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा और भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के साथ अलग से मुलाक़ात की है.

जल्दी-जल्दी में आईएमएफ और यूरोपीय केंद्रीय बैंकों के अधिकारियों के साथ भी जी20 प्रतिनिधियों की बैठक करवाई गई है.

दोपहर के भोजन पर सारे 20 नेताओं के बीच चर्चाएँ भी हुईं.

शुक्रवार सुबह भी ऐसे सत्र होंगे और फिर उसके बाद सारकोज़ी प्रेस कॉन्फ़्रेंस कर बैठक में लिए गए फ़ैसलों की जानकारी देंगे.

ग्रीस

कान सम्मेलन शुरू होने के पहले से ही तय लग रहा था कि वहाँ चर्चा का केंद्र यूरो मुद्रा वाले देशों का संकट और विशेष रूप से ग्रीस रहेगा.

फ़्रांस के राष्ट्रपति सारकोज़ी और जर्मन चांसलर एंगेला मैरकल ने बुधवार शाम को ही कान में ग्रीस के प्रधानमंत्री और वित्तमंत्री के साथ एक आपात बैठक की और ग्रीस से स्पष्ट कर दिया कि उसे उसके कर्ज़ को चुकाने के लिए दिए जानेवाले नए कर्ज़ की अगली किश्त तबतक नहीं मिलेगी जबतक कि ग्रीस में जनमत संग्रह को लेकर स्थिति साफ़ नहीं हो जाती.

सारकोज़ी ने कहा,"यूरोपीय देश और आईएमएफ़ ग्रीस को राहत योजना की छठी किश्त तबतक जारी नहीं कर सकते जबतक कि ग्रीस 27 अक्तूबर को बनी इस पूरी योजना को स्वीकार नहीं कर लेता और जनमत संग्रह को लेकर अनिश्चय दूर नहीं होता."

दरअसल यूरोपीय नेताओं को भय है कि यदि ग्रीस की जनता ने जनमत संग्रह में यूरोपीय योजना को ठुकरा दिया तो ग्रीस तो डूबेगा ही, उसकी चपेट में इटली और स्पेन जैसे बड़े देश भी आ सकते हैं.

वहीं पुर्तगाल और आयरलैंड जैसे देश भी ग्रीस का अनुसरण करते हुए यूरो से बाहर आने का मन बना सकते हैं.

और बात यूरोप तक ही सीमित ना रह, पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था पर असर डाल सकती है.

इसी आशंका से भारत, चीन औऱ अमरीका, ये सारे देश यूरोप से कह रहे हैं, कि वो अपने घर को जल्दी से जल्दी दुरूस्त करें.

अभी हालत ये है कि यूरोपीय नेताओं को उम्मीद थी कि कान सम्मेलन में ग्रीस के बारे में कोई निश्चित कार्ययोजना को तय किया जा सकेगा.

उसमें एक महत्वपूर्ण मुद्दा था कि अमीर उभरती अर्थव्यवस्थाओं से यूरोपीय देशों को राहत देने के लिए प्रस्ताविक कोष में योगदान करने का अनुरोध किया जाए.

मगर चीन ने कल स्पष्ट कर दिया है कि जबतक ग्रीस की स्थिति साफ़ नहीं होती, वो कोई वचन नहीं दे सकता.

जी-20

जी-20 बना तो 1999 में था मगर उसका नाम सुर्ख़ियों में वैश्विक मंदी शुरू होने के बाद आने लगा.

सबसे ताक़तवर आर्थिक महाशक्तियों के संगठन जी8 और चीन, भारत, ब्राज़ील जैसी उभरी आर्थिक शक्तियों को मिलाकर बने समूह जी-20 के नेताओं ने तीन साल पहले आई वैश्विक मंदी से निकलने का उपाय तलाश करने के लिए कमर कसी थी.

नियमित तौर पर जी-20 की सालाना बैठक में देशों के वित्तमंत्री और केंद्रीय बैंकों के गवर्नर ही आया करते थे मगर 2008 की मंदी के बाद से इसकी शिखर बैठकें होने लगीं.

2008 में वाशिंगटन में, 2009 में लंदन और पिट्सबर्ग में और 2010 में टोरंटो और सोल में, और अब इस साल फ्रांस के कान शहर में इसकी शिखर बैठक हो रही है.

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