नीतीश की 'सेवा यात्रा' क्यों?

नीतीश कुमार
Image caption पिछले छह साल में नीतीश कुमार की यह छठी यात्रा है.

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अपने शासन का छठा साल पूरा होने के समय राज्य के ग्रामीण इलाक़ों में अपनी छठी यात्रा पर निकल रहे हैं.

इस यात्रा को 'सेवा यात्रा' नाम दिया गया है और नौ नवंबर को इसकी शुरुआत पश्चिमी चंपारण ज़िले से होगी. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार वहाँ चार दिन रहकर विभिन्न सरकारी योजनाओं का जायज़ा लेंगे.

'सेवा यात्रा' के पहले चरण में राज्य के 10 ज़िलों को शामिल किया गया है और इस पहले दौर की यात्रा आगामी 13 जनवरी को सिवान ज़िले में संपन्न होगी. जबकि यात्रा के दूसरे दौर में बाक़ी ज़िले शामिल होंगे.

इससे पहले नीतीश कुमार ने साल 2005 में यहाँ सत्ता हासिल करने से पूर्व चुनावी मुहिम की शक्ल में 'न्याय यात्रा' निकाली थी.

उसके बाद सरकारी तौर पर उनकी 'विकास यात्रा, प्रवास यात्रा, धन्यवाद यात्रा और विश्वास यात्रा' का सिलसिला कभी आलोचना, तो कभी सराहना लिए हुए ख़ासा चर्चित भी रहा.

आलोचना इस आरोप के साथ हुई कि एक तरफ़ भारी ताम-झाम या शाही ठाट-बाट जैसे प्रशासनिक प्रबंधों वाली इन यात्राओं पर जनता के अरबों रूपए बहाए गए और दूसरी तरफ़ जन-शिकायतें भी दूर नहीं हो पाईं.

'सब ठीक-ठाक है'

यह भी आरोप लगा कि भ्रष्ट प्रशासनिक तंत्र ने मुख्यमंत्री की यात्राओं से जुड़े स्थानों को बहुत पहले से चिन्हित करके वहाँ 'सब ठीक-ठाक है' जैसा रंगमंच तैयार रखा था, ताकि मीडिया-प्रचार में समस्या ना हो.

शायद इसलिए इस बार मुख्यमंत्री ने 'सेवा यात्रा' के प्रबंधक अधिकारियों को हिदायत दी है कि सिर्फ़ कुछ घंटा पहले उस जगह के बारे में सूचना दी जाए, जहाँ वो निरीक्षण करने पहुंचेंगे.

नीतीश कुमार ने इस यात्रा के बारे में कहा है, ''सरकार की विकास योजनाओं या कार्यक्रमों की ज़मीनी स्थिति देखने-समझने के लिए गांवों में लोगों के बीच पहुंचकर मौक़ा-मुआयना करना और ख़ासकर भ्रष्टाचार निवारण के लिए यहाँ लागू 'सेवा का अधिकार क़ानून' की सफलता या विफलता का जायज़ा लेना इस यात्रा का मूल मकसद है.''

ज़ाहिर है कि भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ देशव्यापी रोष और हाल ही में बिहार से शुरू हुई आडवाणी-रथ-यात्रा को ध्यान में रखकर नीतीश कुमार ने अपनी इस यात्रा की राजनीतिक रणनीति बनाई है.

नीतीश कुमार को शायद ये लग रहा होगा कि उन्हें बिहार में कमज़ोर या बेअसर पड़े विपक्ष से नहीं, बल्कि उनकी सत्ता-साझीदार भारतीय जनता पार्टी से ही चुनौती का ख़तरा हो सकता है.

इसलिए भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ लड़ाई के राजनीतिक मैदान में ख़ुद को और अपनी पार्टी जनता दल (यू) को भाजपा से आगे दिखाने का मौक़ा नीतीश कुमार इस यात्रा में भी ढूंढना चाह रहे हों, तो आश्चर्य कैसा?

लेकिन हाँ, अचरज की बात यह है कि बिहार में जदयू-भाजपा के छह वर्षों का बहुप्रचारित 'अच्छा शासन' यहाँ पहले से भी अधिक तेज़ी से बढ़ते भ्रष्टाचार का सच सरकारी विज्ञापनों के बलबूते भी छिपा नहीं पाया है.

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