एक छलावा पैदा करती हरियाली

हरिया का घर

योजना आयोग मानता है कि देहाती इलाक़ों में रहने वाला कोई आदमी अगर ख़ुद के खाने-ख़र्चे पर रोज़ाना 26 रुपए ख़र्च करता है तो उसे ग़रीब नहीं माना जा सकता. इसी की पड़ताल करने के लिए बीबीसी संवाददाता राजेश जोशी उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड इलाक़े के ललितपुर ज़िले पहुँचे और वहाँ के एक गाँव गेवरा में एक ग़रीब आदिवासी किसान हरिया के टूटे फूटे घर में उनके परिवार वालों के साथ रहे. प्रस्तुत है बुंदेलखंड डायरी का पहला भाग.

नीम के पेड़ पर आ बैठे दो भारी उल्लुओं ने अचानक चीख चीख कर आसमान सर पर उठा लिया. लेकिन जल्द ही वो अपने बेआवाज़ पंख फैलाकर शायद किसी और ठिकाने के लिए उड़ गए हैं. अब ख़ामोशी है. आसमान और स्याह हो चला है.

हरियाँ की मढ़ी में आँगन के पार बनी एक कोठरिया में लगी खटिया पर मैंने अपना स्लीपिंग बैग बिछा दिया है.

वहाँ पंद्रह वॉट का एक बल्ब रोशनी दे रहा है. गाँव में बिजली है लेकिन हरियाँ के परिवार की कोठरियों में मिट्टी के तेल की ढिबरियाँ धपधपा रही हैं.

आँगन के पार से परिवार की आपसी बातचीत की आवाज़ें मुझ तक तिर-तिर आती हैं. हरियाँ और उनके बेटे किशोरी की आवाज़ खुली हुई, महिलाओं की तनिक धीमी, तनिक सकुचाई हुई सी आवाज़ें.

अब झींगुरों की बारी है जो आसमान में स्याही फैलते ही उत्साह में गाने लगे हैं.लगातार आती उनकी आवाज़ अब वातावरण का हिस्सा बन चुकी है, उसमें व्यवधान नहीं.

बाहर गली में बैठी गाय-बच्छियों के नथुनों से निकलती गर्म उसाँसों की आवाज़ें बीच बीच में साफ़ सुनाई पड़ जाती हैं.

हरियाँ का घर ईंट का बना है और उसमें दो कमरे हैं. एक में हरियाँ और उनकी पत्नी और दूसरे में उनका बेटा किशोरी अपने परिवार के साथ रहता है.

दालान में बने एक बाड़े में बकरियाँ और गाय-बच्छी बाँधी जाती हैं और परिवार के साथ ही मुर्ग़ियाँ और उनके चूज़े भी रहते हैं. हरियाँ के दो बेटे अपने परिवारों के साथ ‘बाहर’ रहकर मेहनत मज़दूरी करते हैं.

पथरीली धरती

Image caption ज़्यादातर आदिवासी किसानों की खेती गाँव से दूर पथरीले पहाड़ों के पार है.

हरियाँ को ख़ुद अपनी और अपने परिवार के किसी सदस्य की उम्र ठीक ठीक नहीं मालूम है. पूछो तो बताते हैं, “लगभग, लगभग पचास-साठ की उमर होगी मेरी.”

उत्तर प्रदेश के हिस्से वाले बुंदेलखंड में ललितपुर ज़िले के अंदरूनी इलाक़े में पथरीली धरती और पथरीले पहाड़ों का एक तिलस्मी क़िस्म का सिलसिला शुरू हो जाता है. फिर भी कितनी तो हरी दिखती है ये धरती.

पानी की कमी नहीं. भरी-पूरी बेतवा नदी इस कोने से उस कोने तक अर्ध-चंद्राकार बनाती हुई बहती है. दोनों ओर हरियाली उपजाती हुई.

पर कितना मायावी है ये दृश्य. एकदम छलावा. नया नया आदमी यहाँ की ख़ूबसूरती देख वैसे ही ठगा रह जाए जैसा उड़ीसा में कालाहाँडी की हरी-भरी घाटियाँ देख कर ठगा रह जाता है.

पल भर को गुमान ही नहीं होता कि कालाहाँडी और बोलांगीर जैसे इलाक़ों में भूख से लोग मरे हैं. उनमें से ज़्यादातर आदिवासी.

हरियाँ भी आदिवासी हैं. लगभग कालाहाँडी जैसे ही सुंदर भूगोल में बसे ललितपुर ज़िले के गाँव गेवरा में अपनी पत्नी मलीदा, पुत्र किशोरी और पोते-पोतियों के साथ रहते हैं.

आज दिनांक 19 अक्तूबर, 2011 की इस अँधेरी रात को उनके घर के बाहर बनी आठ फ़ुट गुणा चार फ़ुट की कोठरिया के नीम उजाले में लेटा हूँ मैं: दिल्ली से आया एक पत्रकार जो जानना चाहता है कि गाँव-गँवई में रहने वो वाला किसान कितना अमीर है जो औसतन एक दिन में 26 रुपए ख़र्च करने की क़ुव्वत रखता है.

सरकारी गणित

Image caption सवा दो एकड़ ज़मीन के बावजूद हरिया के लिए जीवन कठिन है.

योजना आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में हलफ़नामा दर्ज करके देश की ग़रीबी मापने का गणित समझाया है.

इस गणित को तैयार करने वाले अर्थशास्त्री और नीति-निर्धारकों का कहना है कि अगर देहाती इलाक़े में रहने वाला कोई आदमी एक दिन में 26 रुपए ख़र्च कर सकता है तो फिर उसे ग़रीब नहीं कहा जा सकता.

और शहर में रहने वाले की अमीरी तय करने के लिए रोज़ाना के 32 रुपए तय किए गए हैं.

सरकार के इसी हलफ़नामे की थाह लेने मैं बुंदेलखंड के इस अंदरूनी गाँव में एक आदिवासी परिवार की मढ़ी में उन्हीं के साथ दिन और रात गुज़ार रहा हूँ.

बुंदेलखंड देश के उन इलाक़ों में आता है जहाँ प्रति व्यक्ति आय का स्तर सबसे कम हैं, शिक्षा का प्रसार भी कम है. इस क्षेत्र की जनसंख्या में 25 प्रतिशत से ज़्यादा दलित हैं. सहरिया और कोल आदिवासियों को भी अनुसूचित जाति का दर्जा दिया गया है.

बुंदेलखंड के सात ज़िले उत्तर प्रदेश में और छह मध्य प्रदेश में पड़ते हैं. इसके अलावा भिंड, मुरैना, शिवपुरी और ग्वालियर को भी कई बार बुंदेलखंड का हिस्सा मान लिया जाता है.

सूखे की मार

Image caption बुंदेलखंड के किसानों पर सूखे की बुरी मार पड़ी है.

पिछले पाँच साल से लगातार पड़े सूखे ने यहाँ के ग़रीब किसान को निचोड़ लिया है. यहाँ सक्रिय सामाजिक संस्था डेवलपमेंट ऑल्टरनेटिव्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक इस सूखे से एक करोड़ साठ लाख लोग प्रभावित हुए हैं.

इलाक़े के चालीस प्रतिशत खेतों में बुवाई नहीं हो पाई जिससे फ़सलों के उत्पादन में तीस प्रतिशत की गिरावट आई है. सत्तर प्रतिशत ताल-पोखरे सूख चुके हैं.

ये स्थिति इस मॉनसून से पहले की थी. इस बार सावन-भादो अच्छे बरसे पर वो अपने साथ डूब की विपदा लेकर भी आए. इसके भी सबसे बुरे शिकार दलित और आदिवासी ही हुए.

हरियाँ आदिवासियों की सहरिया या रावत जाति के हैं. छत्तीसगढ़ के वन-प्रांतर अबूझमाड़ में रहने वाले आदिवासियों की तरह कभी उनके पुरखे भी जंगलों में रहते रहे होंगे. पर जंगल कटे तो आदिवासियों को भी गाँवों में रहना पड़ा.

गेवरा गाँव में आदिवासियों के कोई ढाई सौ घर होंगे. यहाँ की चालीस प्रतिशत आबादी दलित-आदिवासी है. कुछ ठाकुर और ब्राह्मण भी हैं. ठाकुर परिवार के लोग अपना संबंध छत्रसाल राजा से बताते हैं और कहते हैं कि ओरछा के चंदेल और बुंदेले राजाओं के वो वंशज हैं.

गाँव में अभ भी बुंदेला ठाकुर परिवार छह सौ साल पुरानी गढ़ी यानी छोटे-मोटे क़िलेनुमा घर में रहता है.

बुंदेलखंड के गाँवों से लाखों लोग हर साल कमाने के लिए ‘बाहर’ जाते हैं. पिछले पाँच साल से लगातार सूखा पड़ने की वजह से पलायन काफ़ी बढ़ा गया है. आज सुबह गेवरा गाँव में प्रवेश करते ही मुझे इस बात का एहसास हो गया था.

(बुंदेलखंड पर राजेश जोशी की पांच कड़ियों वाली डायरी का ये पहला भाग है. इन लेखों आप अपने विचार hindi.letters@bbc.co.uk पर भेज सकते हैं. अगर आप बुंदेलखंड में हैं और अपने अनुभव हमसे बांटना चाहते हैं तब भी आप हमें मेल लिख सकते हैं. )

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