पैसा ख़र्चो, दोस्ती ख़रीदो

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Image caption भारत अपने पड़ोसियों को अरबों डॉलर की मदद दे रहा है

सालों से केवल सिद्धांतों की बात कर रही भारतीय कूटनीति का चेहरा देश की आर्थिक तस्वीर के साथ ही बदल रहा है और भारत अब रसूख़ ख़रीद रहा है.

बरसों से भारत की कूटनीति हमेशा अधिकारों सिद्धांतों मूल्यों की बात करती आई है. आज़ादी के बाद जवाहर लाल नेहरु से लेकर कुछ बरस पहले तक भारतीय कूटनीति के मूल मंत्र रहे हैं सदभावना, प्रेम और आदर्श.

लेकिन इंदिरा गाँधी के बाद समय के साथ भारत का विश्व मंच से रूतबा चला गया और भारत के हर पड़ोसी से भारत को परेशानी थी और हर पड़ोसी को भी भारत से परेशानी हो गई.

बदलती तस्वीर

पिछले एक डेढ़ साल से चीज़ें तेज़ी से बदली हैं. कारण हैं शायद वो अरबों डॉलर जो भारत इस इलाक़े में पड़ोसियों को मदद के रूप में दे रहा है. अब भारतीय कूटनीति की बिसात पैसे के पायदान पर खड़ी है.

भारतीय कूटनीति के इस नए चेहरे पर जानकार सुशांत सरीन कहते हैं, "भारतीय कूटनीति का ये नया प्रयास है. आपको इस रास्ते से अपना प्रभाव इस तरह के निवेश के साथ बढ़ाने में समय लगेगा. अगर आप इस तरह के निवेश को जारी रख पाएगें तो सकारत्मक परिणाम मिलना शुरू हो जाएँगें. "

सरीन यह भी कहते हैं कि इस नई कूटनीति के लिए सबसे ज़रूरी यह बात है की भारत की अपनी अर्थव्यवस्था मज़बूत रहे.

अच्छे संकेत

भारत को अपेक्षित परिणाम मिलने में समय लग सकता है लेकिन संकेत अच्छे मिल रहे हैं. चार पांच साल पहले तक भारत को बांग्लादेश हो या बर्मा, यही शिकायत रहती थी कि ये देश भारत विरोधियों को अपने यहाँ पनाह देते हैं और भारत की सुनते नहीं.

अब बांग्लादेश भारत विरोधियों को पकड़ कर भारत को दे रहा है. बर्मा भारत विरोधियों को अपने यहाँ से हटाना शुरू कर चुका है और भारतीय व्यापारियों का स्वागत कर रहा है. श्रीलंका अपने यहाँ तमिलों के मामले में भारत से पूछ पूछ कर क़दम रख रहा है.

बदले में श्रीलंका को 80 करोड़ डॉलर का सस्ती दरों पर क़र्ज़ उपलब्ध कराया गया है. अफ़गानिस्तान में दो अरब डॉलर से ज़्यादा भारत ख़र्च कर चुका है इसी तरह भारत ने नेपाल को 250 करोड़ डॉलर के सस्ते क़र्ज़ का वादा किया है. बांग्लादेश को एक अरब डॉलर की मदद भारत भारत के ज़रिए पहुंचाई जा रही है.

पाकिस्तानी रुख

दक्षिण एशिया का दूसरा सबसे बड़ा देश पाकिस्तान भारतीय कूटनीति के बदलते तेवर को शंका की निगाह से देखता है.

भारत पाकिस्तान संबंधों के विशेषज्ञ पंजाब विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफ़ेसर डॉ रशीद अहमद ख़ान बताते हैं, "पाकिस्तानी सुरक्षा अहलकार मानते हैं कि भारत इस तरह से पाकिस्तान को घेरने और अफ़गानिस्तान सहित बाक़ी जगहों पर उसका रसूख़ ख़त्म करने की कोशिश कर रहा है. इसके जवाब में पाकिस्तान चीन के साथ मिल कर अफ़ग़ानिस्तान में नवनिर्माण का काम करना चाहता है."

अहम प्रश्न

क्या ख़र्चीली कूटनीति तरीक़ा ठीक है, आख़िर सालों तक मर्यादा और सिद्धांत पर आधारित कूटनीति ने ग़रीबी के बावजूद भारत को सम्मान दिलाया.

सुशांत सरीन कहते हैं, "जो सिक्का जहाँ चल जाए वो ही ठीक है. जब हमारी जेब में पैसे नहीं थे तो सिद्धांतों की बात करते थे. अब ज़माना बदला गया है. कूटनीति में कोई दोस्त या हालात स्थायी नहीं होती इसलिए जब आपके हित सधने बंद हो जाएँ तो आप नीति बदलिए या अपने दोस्त."

यानी जितना गुड उतना मीठा. बस दिक्कत एक है गुड की तादाद सदा बढ़ाते रहना होगा वरना मीठा कड़वे में बदल सकता है.

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