पैग़ाम पहुँचाने का अनोखा तरीक़ा

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मुंबई की एक चौड़ी और ट्रैफ़िक से भरी सड़क के एक चौराहे पर एक छोटे क़द का इंसान दोनों हाथ ऊपर उठाए और हाथ में एक बोर्ड लिए एक पैर पर खड़ा है.

दोपहर का समय है. सूरज सर के ऊपर है. नवंबर का महीना ज़रूर है लेकिन मुंबई में सर्दी कब होती है.

लेकिन यह इंसान गर्मी की परवाह न करके मुस्कुराते हुए कई घंटों से खड़ा है और अगले कई घंटों तक खड़ा रहेगा. बोर्ड पर बड़े अक्षरों में लिखा है, "अपने धर्म पर चलो. सबसे प्रेम करो."

इस इंसान का नाम है कृष्ण अवतार उर्फ़ कृष्ण दास. कृष्ण दास पिछले तीन वर्षों से अमिताभ बच्चन के घर के क़रीब जुहू सर्किल नामक इस चौराहे पर दिन भर खड़े रहते हैं और राहगीरों, वाहन चालकों, ट्रैफ़िक पुलिस वालों और आम आदिमयों को मुस्कुरा कर सबसे प्रेम करने और अपने धर्म पर चलने का पैग़ाम देते आ रहे हैं.

प्यार का यह संदेश कोई नई बात नहीं. संत और महात्मा यह पैग़ाम सदियों से देते चले आ रहे है. लेकिन 50 वर्षीय ये साधू कहते हैं कि प्रेम का इस्तेमाल सबसे पहले घर से शुरू किया जाए, तो आदमी सुखी रहेगा और घर से बाहर भी ख़ुशी का माहौल बनाना पसंद करेगा.

आसान

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Image caption कृष्ण दास को जानने वालों की कमी नहीं

वो कहते हैं, "पहले अपने माता-पिता की सेवा करो और परिवार से प्रेम करो. जब बाहर हो, तो समाज से प्रेम करो. अपने धर्म पर चलो तो यह आसान हो जाएगा."

आम तौर पर जब एक इंसान संन्यास लेता है, तब सब कुछ त्याग देता है. वो किसी पहाड़ पर या किसी गुफ़ा में पनाह ले लेता है. पंद्रह साल पहले कृष्ण दास ने भी साधु बनने के बाद हिमालय की गोद में शरण ली.

लेकिन तीन साल पहले एक विश्व धर्म सम्मलेन में शामिल होने के बाद उन्हें महसूस हुआ कि एकांत में रहने की बजाय उन्हें समाज में लौटना चाहिए.

वो कहते हैं, "उस सम्मलेन में सभी धर्मों के लोग एक ही तरह की बातें कर रहे थे. तो मैंने सोचा जब हर धर्म का संदेश मिलता जुलता है और यह संदेश प्यार का है तो क्यों नहीं इसका प्रचार समाज सेवा के रूप में किया जाए. इसलिए मैंने प्यार के इस पैग़ाम को फैलाने के लिए अपनी पूरी ज़िंगी लगा दी."

कृष्ण दास हर रोज़ इसी पैग़ाम को देने का काम करते हैं. वो सुबह छह बजे जुहू में समुद्र के किनारे आते हैं और कई संदेशों से भरे बोर्ड एक किलोमीटर तक फैला देते हैं.

उत्सुकता

सुबह जॉगिंग करने वालों की एक बड़ी भीड़ होती है. इसका मतलब ये हुआ कि इन संदेशों के बारे में लोगों में उत्सुकता ज़रूर जागेगी.

कृष्ण दास कहते हैं, "लोग इन पैग़ामों को पढ़ते हैं और मेरे पास आकर सवाल करते हैं. आम तौर से लोगों को मेरी यह कोशिश पसंद है और हमें काफ़ी समर्थन मिलता है. लेकिन ज़ाहिर है कुछ लोगों को यह कोशिश बेमानी लगती है और वो अपने विचारों को खुल कर प्रकट भी करते हैं."

जॉगिंग करती एक जोड़ी ने कहा कि वो बाबा की कोशिश को सराहते हैं, लेकिन इसका कोई फ़ायदा नहीं. लोग उनके पैग़ाम को पढ़ते हैं और जुहू बीच से बाहर जाते ही भूल जाते हैं. लेकिन अधिकतर लोग कृष्ण दास की कोशिशों की प्रशंसा करते सुनाई दिए.

गन्ने के रस की एक दुकान वाले ने कहा कि वो बाबा की लगन से बहुत प्रभावित हैं.

वो कहते हैं, "बाबा को हर रोज़ मैं यहाँ देखता हूँ. बारिश हो या बरसात. गर्मी हो या धूप, वो यहाँ ज़रूर आते हैं. हर रोज़ सुबह को यह तख्तियां रेत में गाड़ते हैं और व्यायाम करते हैं. फिर लोग उनके पास आते हैं और इन तख्तियों पर लिखे संदेशों के बारे में पूछते हैं."

तलाश

कृष्ण दास कहते हैं वो खुद भी एक समय में दुखी थे, अपने परिवार से ख़ुश नहीं थे. उन्हें शांति की तलाश थी. इसको पाने के लिए वो हिमालय पर गए और साधु बन गए.

वो बताते हैं, "मेरी पैदाइश मुरादाबाद की है. मैं ग्वालियर का रहने वाला हूँ. मैंने अपने परिवार से झगड़े के कारण घर छोड़ दिया. मैंने भी अपने परिवार से उतना प्यार नहीं किया जितना मैं लोगों को प्यार करने की सलाह देता हूँ. लेकिन अब मेरा जीवन परिवार के ईर्द-गिर्द घूमता है." कृष्ण दास में यह परिवर्तन साधु बनने के बाद आया. तब से हर रोज़ वो यही संदेश दे रहे हैं. जुहू बीच के बाद वो जुहू सर्कल पर खड़े हो जाते हैं और शाम तक वहीं रहते हैं.

लेकिन क्या उनके पैग़ाम का असर हो रहा है? इसके जबाव में वो कहते हैं, "मुझे काफ़ी लोग कहते हैं कि मेरे संदेश का उन पर असर हुआ है."

कृष्ण दास को ट्रैफ़िक पुलिस से लेकर बॉलीवुड के अभिनेताओं तक का आशीर्वाद हासिल है. वो बताते हैं, "अक्षय कुमार जब भी इधर से गुज़रता हैं, अपनी गाड़ी से उतर कर मुझसे हाथ मिलाते हैं, मुस्कुराते हैं और बधाई देते हैं. ऋतिक रौशन भी हेलो कहते हैं."

पैग़ाम

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Image caption मोरारी बापू को अपना गुरू मानते हैं कृष्ण दास

फ़िल्मी जगत के अलावा भी लोग उनका प्रोत्साहन बढ़ाते हैं. वो कहते हैं, "मुझे बुर्के वाली मुस्लिम महिलाएं भी आकर बधाई देती हैं और कहती हैं कि मेरा पैग़ाम सही है."

कृष्ण दास कहते हैं कि वो किसी से पैसे या और किसी तरह की मदद नहीं लेते. तो फिर वो अपना पेट कैसे भरते हैं?

जवाब में कृष्ण दास कहते हैं, "मेरे गुरु संत मुरारी बापू मेरी देखभाल करते हैं. ये वही संत हैं, जिन्होंने विश्व धर्म सम्मलेन करवाया था और तब से मैं उनका भक्त हो गया हूं."

कृष्ण दास कहते हैं कि वो सबसे अच्छा मार्गदर्शन देने वालों में से एक हैं. वो शिष्य नहीं बनाते, लेकिन मैंने मुरारी बाबू को अपना गुरु बना लिया है.

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