'वालसा की मौत के पीछे माओवादी'

Image caption वालसा जॉन की पिछले हफ्ते कुछ लोगों ने हत्या कर दी थी.

पुलिस का कहना है कि झारखंड के पाकुड़ जिले में सिस्टर वालसा जान की हत्या के पीछे माओवादियों का हाथ होने की संभावना है.

हालांकि इस मामले में माओवादियों की तरफ से कोई बयान जारी नहीं किया गया है, मगर पुलिस का कहना है कि पूछताछ के लिए हिरासत में लिए गए लोगों के बयान से यह बात साबित हो रही है.

अब तक दर्जन भर लोगों को हिरासत में लिया गया है जिसमे ज़्यादातर आदिवासी हैं.

राज्य के संथाल परगना इलाके के पुलिस महानिरीक्षक अरुण ओरांव नें बीबीसी को बताया के इस हत्या काण्ड के कई पहलू हैं जिसकी जांच की जा रही है.

उनका कहना था, " इसके पीछे माओवादियों का हाथ भी हो सकता है. उनलोगों का हाथ भी हो सकता है जो ज़मीन अधिग्रहण के मामले में कोयला कंपनी और वालसा के बीच हुए समझौते से खुश नहीं थे."

पुलिस का कहना है पचवारा गाँव के पास ही के एक गाँव में पिछले साथ नवम्बर को एक बलात्कार का मामला सामने आया था जिसको लेकर वालसा ने थाने में शिकायत दर्ज कराई थी. इस मामले में आदिवासियों का एक बड़ा तबका ऐसा था जो मामले को गाँव के स्तर पर ही निपटाना चाहता था. कुछ आदिवासी इस बात के खिलाफ थे कि मामला पुलिस तक जाए क्यों कि इसके पीछे प्रेम प्रसंग भी था.

ओरांव कहते हैं कि पुलिस सभी पहलूओं पर काम कर रही है, "मगर हर पहलू का तार माओवादियों तक जाकर रुकता है."

वालसा की हत्या के बाद पुलिस नें घटना स्थल से कुछ पर्चे बरामद किए जो कथित तौर पर माओवादियों ने लिखे थे. हालाकि माओवादियों की तरफ से अभी तक इस मामले को लेकर अलग से कोई बयान जारी नहीं किया गया है मगर पुलिस का कहना है कि जिस हथियारबंद दल ने वालसा के घर धावा बोला था उसमें ज़्यादातर माओवादी थे.

यूँ तो संथाल परगना के इलाके में माओवादियों की पकड़ नहीं के बराबर थी मगर पिछले पांच सालों में माओवादियों नें इस इलाके में अपनी पैठ बनाई शुरू कर दी थी. विस्थापन के सवाल को लेकर उन्होंने आदिवासियों के बीच काम करना शुरू कर दिया. पुलिस का कहना है कि वालसा जान के संगठन को माओवादी अपने रास्ते का सबसे बड़ा रोड़ा समझते थे.

ओराँव का कहना है कि इस लिए माओवादियों नें वालसा के खिलाफ उठ रहे हर विरोध को हवा देनी शुरू कर दी.

झारखण्ड का संथाल परगना का इलाका संविधान के पांचवे अनुछेद के अंतर्गत आता है. इसके अलावा इस इलाके में संथाल परगना काश्तकारी अधिनियम भी प्रभावी है जिसके तहत आदिवासियों की ज़मीन खरीदी और बेची नहीं जा सकती. इसके अलावा अगर इस इलाके में ओद्योगिक परियोजनाएं आतीं हैं तो उनके लिए आदिवासी सलाहकार परिषद् का अनुमोदन ज़रूरी है.

मगर आरोप हैं कि कानूनों को ताक पर रख कर इस इलाके में खनन कंपनियों ने बड़े पैमाने पर आदिवासियों की ज़मीनों का अधिग्रहण किया जिस वजह से इलाके में विस्थापन शुरू हो गया.

सिस्टर वालसा नें मिशनरीज़ आफ चैरिटी से अपने आप को अलग कर लिया था और उन्होंने अपना एक ग़ैर सरकारी संगठन खड़ा किया था जो कोयला कंपनियों द्वारा किये जा रहे विस्थापन को लेकर काम कर रहा था. वालसा पर खनन कंपनियों से पैसे खाने के आरोप भी लगे थे मगर इन आरोपों की स्वत्संत्र तरीके से पुष्टि नहीं हो पायी थी.

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