पीकदान बनकर रह गया है हावड़ा पुल

हावड़ा पुल

वैसे तो कोलकाता का हावड़ा पुल एक ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहर है लेकिन ब्रिटिश साम्राज्य का ये प्रतीक अब यह एक विशाल पीकदान बनकर रह गया है.

इस पुल पर से गुज़रने वाले लोग इसके स्टील हैंगरों पर गुटखा, पान, सुपारी और चूना थूक देते हैं जिससे पुल का तला गलता जा रहा है.

अधिकारियों का कहना है कि इससे पुल को ख़तरा है.

अब इस धरोहर को बचाने के लिए इंजीनियरों ने इसके स्टील हैंगरों को फ़ाइबरग्लास से ढँकने का उपाय निकाला है.

भारी बोझ

हावड़ा पुल 1937 में बना था और इसमें एक भी स्क्रू नहीं लगा है और न ही यह खंभों पर टिका है.

इसमें 78 हैंगर हैं जिन पर न सिर्फ़ पुल के 26,500 टन स्टील का बल्कि उस पर से हर रोज़ गुज़रने वाले पांच लाख पैदल यात्रियों और इतने ही वाहनों का बोझ भी है.

कोलकाता पोर्ट ट्रस्ट के अध्यक्ष एमएल मीना कहते हैं कि लोगों का पीक थूकना इतना बड़ा ख़तरा बन गया है कि इससे 'हैंगरों के तले सिर्फ़ तीन साल में ही अपने मूल माप से आधे रह गए हैं.'

पुल के रख-रखाव के लिए ज़िम्मेदार अधिकारियों का कहना है कि वे आने-जाने वाले लोगों को थूकने से रोकने की कोशिश करते हैं लेकिन इसमें उन्हें बहुत सफलता नहीं मिली है.

पुल की ड्यूटी पर लगी महिला पुलिस पारबती चौधरी कहती हैं, "जब भी मैं किसी को पुल पर पीक थूकते देखती हूं तो उस पर इस जुर्म के लिए जुर्माना कर देती हूं. लेकिन हर पैदल यात्री पर नज़र रखना संभव नहीं है."

अधिकारियों का ये भी कहना है कि वे पुल की लोहे की प्लेट नियमित रूप से बदलते हैं और रसायनों की परत भी लगाते हैं. लेकिन ये उपाय भी कारगर नहीं हुआ और पुल के तलों का गलना जारी है, जो लोहे से बने हैं.

भगवान भरोसे?

ऐसे समय में किसी ने अधिकारियों को सुझाव दिया है कि हैंगरों को फ़ाइबरग्लास से ढँक दिया जाए.

पोर्ट ट्रस्ट के अध्यक्ष एमएल मीना बताते हैं, "हमने हैंगरों के स्टील तलों को फ़ाइबरग्लास से ढँकने का फ़ैसला किया है. ये कवर धुल भी सकते हैं. जब भी इन पर पीक जमा होगी, हम इनको साफ़ कर सकते हैं. ये काम तीन-चार महीनों में पूरा हो जाएगा."

ये फ़ाइबरग्लास कवर दो मीटर ऊंचे होंगे और ये स्टील तलों के इर्द-गिर्द इस तरह से लगाए जाएंगे कि पीक इनके अंदर न पहुंच पाए.

लेकिन अधिकारी सिर्फ़ इस उपाय के भरोसे नहीं बैठ हैं.

पुल को बचाने के लिए वे ईश्वर का भी सहारा लेंगे.

एक अधिकारी ने बताया, "इन फ़ाइबरग्लास कवरों पर हम बोर्ड लगाएंगे जिन पर ‘यहां थूकना मना है’ लिखा होगा. लेकिन इसके साथ ही हम इन पर देवी-देवताओं की तस्वीरें भी लगाएंगे जो लोगों को इन पर पीक थूकने से रोकेगा."

ये कोई बहुत नया उपाय तो नहीं है क्योंकि बहुत सी इमारतों को पीक से बचाने के लिए सीढ़ियों और कोनों पर ईश्वर की तस्वीरें लगाई गई हैं.

अधिकारी उम्मीद ही कर सकते हैं कि ये उपाय कारगर होगा.

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