क्या ये यूपीए सरकार की नई शुरुआत है?

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Image caption पिछले महीनों में कॉर्पोरेट जगत ने भी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की सरकार पर कोई ठोस फ़ैसले ना ले पाने के आरोप लगाए हैं.

भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरी और अपने कार्यकाल में संसद में बेहद कम कामकाज करवा पाई यूपीए सरकार ने भारी राजनीतिक विरोध के बीच आर्थिक सुधार का ऐतिहासिक फैसला लिया है.

भारत के मंत्रिमंडल के खुदरा व्यापार क्षेत्र में एक से ज़्यादा ब्रांड के लिए विदेशी पूँजी निवेश (एफ़डीआई) को हरी झंडी दिखाने के बाद, फ़ाइनेन्शियल एक्सप्रेस अख़बार के कार्यकारी संपादक एमके वेणु को लगता है कि यूपीए सरकार का सबसे बुरा दौर ख़त्म हो गया है और अब हालात बेहतर ही होंगे.

उनका मानना है कि सरकार ने ये अहम् फ़ैसला इस व़क्त बहुत सोच समझ कर लिया है ताकि दो साल से बन रही 'लचर सरकार' की अपनी छवि को वो सुधार सकें.

एमके वेणु ने बीबीसी से विशेष बातचीत में कहा, ''ये फ़ैसला जो राजनीतिक तौर पर बेहद विवादास्पद था, एक मुश्किल फ़ैसला था, उसे लेकर सरकार अंतरराष्ट्रीय निवेषकों को ये साफ संदेश देना चाहती है कि भारत में सुधार लाने की प्रक्रिया दोबारा शुरू हो गई है''

पिछले महीनों में भारतीय अर्थव्यवस्था के विकास की दर धीमी हुई है और साढ़े आठ फ़ीसदी से घटकर इसके क़रीब सात फ़ीसदी के पास पहुंचने का अनुमान लगाया जा रहा है.

साथ ही क़रीब एक वर्ष से महंगाई भी दस फ़ीसदी के आसपास ही रही है. पिछले हफ्ते अमरीकी डॉलर के मुकाबले रुपए की कीमत भी बहुत गिर गई.

वेणु के मुताबिक अर्थव्यवस्था की इस स्थिति में ऐसी समझ बन रही थी कि सरकार एक संकट से दूसरे संकट को सुलझाने में ही फंस गई है और उसी को सुधारने की कोशिश की गई है. हालांकि इसके लिए वो बैंकिंग और कारोबार से जुड़े अन्य सुधारों को जल्द किए जाना भी ज़रूरी समझते हैं.

'अरबों डॉलर निवेश की उम्मीद'

मंत्रिमंडल के फ़ैसला लेने के बाद वाणिज्य मंत्री आनंद शर्मा ने इस नीति के बारे में जानकारी देने के लिए एक पत्रकार वार्ता की.

आनंद शर्मा ने कहा, ''हमारी ऐसी समझ है कि आने वाले एक वर्ष में ही खुदरा व्यापार में एक ब्रांड की श्रेणी में लाखों डॉलर का विदेशी पूंजी निवेश भारत आएगा और क्योंकि एक से ज़्यादा ब्रांड की श्रेणी में दस करोड़ डॉलर के न्यूनतम निवेष का नियम है, हमें उम्मीद है कि इसमें भी भारी मात्रा में निवेश किया जाएगा''.

उन्होंने दावा किया कि ये नीति किसानों, उपभोक्ताओं और छोटे व्यापारियों सभी के हित में है और इससे देश के मूलभूत ढांचे को बेहतर करने का अवसर मिलेगा.

आनंद शर्मा ने ये भी कहा कि इससे उत्पादन क्षेत्र और ऐगेरो-प्रोसेसिंग क्षेत्र में क़रीब एक करोड़ नौकरियों के अवसर भी आएंगे. ऐसा इसलिए क्योंकि विदेश निवेशक को अपने माल का 30 फीसदी छोटे व्यापारियों से लेना होगा और कुल निवेश के 50 फीसदी को भंडार बनाने और माल की ढुलाई करने में लगाना होगा.

राजनीतिक विरोध

लेकिन विपक्षी पार्टियां सरकार की इन दलीलों से सहमत नहीं. इससे पहले वाणिज्य मंत्री आनंद शर्मा ने इस नीति के बारे में संसद में एक बयान पेश करने की कोशिश की तो दोनों सदनों में इसके विरोध में नारे लगाए गए.

आखिरकार कोई कामकाज नहीं हो सका और दोनों सदनों को स्थगित कर दिया गया.

वाम नेता सीताराम येचुरी ने कहा, ''कई बार इस मुद्दे पर चर्चा हुई है और उसका विरोध भी हुआ है, संसद के अंदर भी और बाहर भी, पहले ये फ़ैसला वापस लिया जाए तब हम इस मुद्दे पर चर्चा करेंगे.''

वहीं भारतीय जनता पार्टी प्रवक्ता प्रकाश जावड़ेकर ने कहा, ''हम इसका विरोध कर रहे हैं क्योंकि आम जनता को ठगा गया है, इस नीति से रोज़गार नहीं बल्कि बेरोज़गारी बढ़ेगी.''

लेकिन वरिष्ठ पत्रकार एमके वेणु का मानना है कि विपक्षी पार्टियां इस मुद्दे पर लंबे समय तक विरोध नहीं करेंगी क्योंकि वो भी जानती हैं कि अर्थव्यवस्था की मौजूदा हालत में भारत को विदेशी निवेष की ज़रूरत है और पश्चिमी देशों के मुक़ाबले भारत में इसके अवसर बी ज़्यादा हैं.

वो कहते हैं कि विपक्ष इस व़क्त अपने विरोध को काला धन और महंगाई पर केन्द्रित रखना चाहेगा ताकि सरकार को सचमुच घेर सके.

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