रहमान मोम के या असली...

  • 26 नवंबर 2011
महात्मा गांधी
Image caption मोम की मूर्तियां बनाने वाले सुनील कनदालूर ने दावा किया है कि आठ महीनों में वो पूरे भारतीय क्रिकेट टीम की मूर्तियां बना सकते है

मुंबई से 100 किलोमीटर दूर लोनावला में लोग आम तौर पर पिकनिक मनाने या इसकी वादियों और पहाड़ों की साफ़ सुथरी फ़िज़ाओं का मज़ा लेने जाते हैं. लेकिन कला के शौक़ीन और भूले भटके पर्यटक यहाँ का मोम संग्रहालय भी देखने जाते हैं.

मैं उन भूले भटके पर्यटकों में से एक था.

लोनावला पहुँचते ही आप जगह जगह पर बड़े अक्षरों में इस मोम संग्रहालय के विज्ञापन देखते हैं और ज़ाहिर है फिर उत्सुकता पैदा होती है देखें क्या ख़ास बात है इन मोम की मूर्तियों में.

एक सौ रूपए देकर मैं संग्रहालय के अंदर घुसा जहां सब से पहले गांधी जी ने हमारा स्वागत किया....मेरा मतलब है महात्मा गाँधी की प्रतिमा ने. उनके बग़ल में चाचा नेहरु खड़े थे और उनके पास उनके नवासे राजीव गाँधी.

गांधी और सद्दाम

गांधी जी की प्रतिमा से मैं बिलकुल प्रभावित नहीं हुआ. लंदन के मैडम तुसॉद के मोम संग्रहालय में लगी गाँधी जी की प्रतिमा इससे बढ़िया है, कई गुना बेहतर है.

लेकिन जब मेरी निगाह सद्दाम हुसैन के पुतले पर पड़ी तो मैं हैरान हो गया. ऐसा लग रहा था की वो हमारे सामने ऊँगली उठाकर अपने निराले आत्मविश्वास से लबरेज़ अंदाज़ में भाषण दे रहे हों.

इस से भी अच्छी प्रतिमा थी केरल की आध्‍यात्‍मि‍क गुरु अमृतानंदमई की. उन्हें मैने केवल तस्वीरों में देखा है, लेकिन वहाँ मौजूद लोगों में से कुछ ने उन्हें असल ज़िंदगी में देखा है और उनका कहना था की यह प्रतिमा बिल्कुल अमृतानंदमई जैसी है.

संग्रहालय में आए लोगो में से एक सुशील कुट्टी ने कहा, "मैं अमृतानंदमई देवी से मिला हूँ. वो सबको गले से लगाती हैं. उनकी ऐसी प्रतिमा बनाई गई है कि लगता है वो असली हैं और अभी गले लगा लेंगी."

अगर हम मोम संग्रहालय की बात करें तो सबसे पहले लंदन में मैडम तुसॉद का नाम ज़ुबान पर आता है क्योंकि इसकी चर्चा विश्व भर में है.

लेकिन अगर आपने मैडम तुसॉद संग्रहालय को नहीं देखा है तो लोनावला के इस मोम संग्रहालय को देखने ज़रूर जा सकते हैं. लंदन के संग्रहालय से ये छोटा ज़रूर है लेकिन यहाँ कुछ ऐसी प्रतिमाएं हैं जो लंदन में सजी प्रतिमाओं से कम नहीं है.

रहमान के साथ एंजेलिना जोली

मैडम तुसॉद संग्रहालय में एक तरफ़ जवाहर लाल नेहरु, महात्मा गाँधी और राजीव गाँधी जैसे व्यक्तियों की प्रतिमाएं हैं, वही दूसरी तरफ़ फ़िल्मों के जाने-माने चेहरे भी हैं.

इनमें हॉलीवुड अभिनेत्री एंजेलिना जोली, गायक माइकल जैक्सन और बॉलीवुड गायक ऐआर रहमान और अभिनेता जैकी श्रॉफ़ शामिल हैं.

पाकिस्तान की बेनज़ीर भुट्टो की प्रतिमा उनके व्यक्तित्व के साथ इन्साफ़ नहीं कर पा रही थी. प्रतिमा में वो काफ़ी मोटी दिखाई दे रही हैं, ख़ास तौर से उनका चेहरा.

जर्मनी के पूर्व तानाशाह हिटलर और इराक़ के सद्दाम हुसैन के प्रति लोगों की उत्सुकता इसी बात से साबित हो रही थी कि इन दोनों नेताओं की प्रतिमाओं को देखने के लिए सबसे अधिक भीड़ लगती है.

मदर टेरेसा, साईं बाबा और दक्षिण भारत के सत्य साईं बाबा की भी मोम की मूर्तियाँ इस संग्रहालय में लगाई गई हैं.

अन्ना भी यहां

सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हज़ारे की भी प्रतिमा हाल ही में इस संग्रहालय में लगाई गई है.

उम्मीद की जा रही है कि भारत के लिए साल 1983 में पहला क्रिकेट विश्व कप जीतने वाली टीम के कप्तान कपिल देव की भी प्रतिमा यहाँ जल्द ही देखने को मिलेगी.

दो साल पहले खुले इस संग्रहालय के मालिक केरल राज्य के सुनील कनदालूर हैं जो यहाँ रखी प्रतिमाओं को बनाने वाले अकेले आर्टिस्ट भी हैं.

कनदालूर चाहते है कि अमिताभ बच्चन और सचिन तेंदुलकर की भी प्रतिमाएं यहाँ लगाई जाएँ, "सचिन से मैने बात कर ली है और उन्होंने वादा किया है कि वो संग्रहालय का दौरा करने के बाद इसकी इजाज़त देंगे."

'आठ महीने में क्रिकेट टीम बन जाएगी'

सुनील कनदालूर कहते हैं वो सचिन के साथ पूरी भारतीय क्रिकेट टीम की प्रतिमाएं बनाना चाहते हैं.

उन्होने कहा, "मैं यह काम आठ महीने में कर सकता हूँ."

सुनील कनदालूर ने कहा, "मोम की मूर्तियाँ बनाना हमारा शौक है. कई साल पहले लंदन के मैडम तुसॉद में अमिताभ बच्चन की प्रतिमा रखी गई थी, तभी मुझे ख़्याल आया कि मैं भी भारत में ऐसा कर सकता हूँ."

उन्होने साल 2005 में कन्याकुमारी में इस काम को शुरु किया और बाद में मुंबई आ गए.

मैडम तुसॉद कभी नहीं गए सुनील कनदालूर ने आत्मविश्वास के साथ कहा कि एक दिन उनका संग्रहालय मैडम तुसॉद की तरह लोकप्रिय होगा.

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