बिहार: बदहाल या खुशहाल ?

  • 27 नवंबर 2011
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Image caption मुख्यमंत्री को अपनी ' सेवा यात्रा ' के दौरान कई जगहों पर जन-विरोध का सामना करना पड़ा है

बिहार में जद(यू)-भाजपा गठबंधन सरकार के छह साल पूरे होने पर राज्य के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अपने शासनकाल के दूसरे दौर के पहले साल का 'रिपोर्ट कार्ड' जारी किया है.

इसे 'न्याय के साथ विकास यात्रा के छह वर्ष' नाम दिया गया है.

इसमें नीतीश कुमार ने लिखा है - '' पिछले छह वर्षों में बिहार में शांति, सदभाव, और क़ानून का राज क़ायम हुआ है.''

अब सवाल उठता है कि जब सरकार की तरफ़ से न्याय , विकास , समाज में शांति-सदभाव और क़ानून का राज भी क़ायम हो गया है, तो फिर बताइए ऐसा अमन-चैन धरती पर और कहाँ है ?

चूँकि भाजपा भी यहाँ सत्ता-साझीदार है, इसलिए नीतीश द्वारा घोषित 'सुशासन' को सरकारी दल के लोग अति उत्साह में 'राम राज' जैसा बताने लगें तो आश्चर्य कैसा ?

लेकिन विरोधाभास ये है कि इसी रिपोर्ट कार्ड में मुख्यमंत्री को ये स्वीकारना पड़ा है कि ''बिजली की मांग और आपूर्ति के बीच यहाँ खाई है और बिजली के बिना किसी प्रदेश का विकास संभव नहीं है.''

कितने सच हैं सरकारी दावे

इसी तरह के कई अन्य विकास संबंधी दावे वास्तविकता की कसौटी पर कमज़ोर साबित होने लगे हैं. अस्पतालों और स्कूल-कालेजों की बदहाली के क़िस्से आम चर्चा में हैं.

अपहरण के बाद हत्या, सरेआम पीट-पीट कर हत्या, बलात्कार, लूट और चोरी की घटनाओं में हो रही वृद्धि के आंकड़े दबाने-छिपाने में पुलिस-प्रशासन के पसीने छूट रहे हैं.

हालात पर ग़ौर करें तो क़ानून का राज क़ायम हो जाने का सरकारी दावा यहाँ पटना शहर में ही ज़मीन सूंघता हुआ दिखेगा.

इस रिपोर्ट में कहीं भी इस गंभीर आरोप का खंडन नहीं है कि पिछले छह वर्षों में यहाँ भ्रष्टाचार तेज़ी से बढ़ा है और सरकारी योजनाओं में अनियंत्रित लूट जारी हैं.

ग्राम पंचायत से लेकर राज्य सचिवालय तक घूसखोरी या कमीशनखोरी पहले भी होती थी. लेकिन लेन-देन का ऐसा खुला नज़ारा पहले नहीं दिखने की बात आज हर ज़ुबान पर है.

सरकारी रिपोर्ट कार्ड इस बात पर भी ख़ामोश है कि बीते छह साल में यहाँ एक भी बड़ा औद्योगिक निवेश क्यों नहीं हो सका.

जबकि कई बड़े औद्योगिक घरानों के मुखिया यहाँ मुख्यमंत्री निवास आकर और निवेश का आश्वासन-संकेत देकर गए थे.

ज़ाहिर है कि बिजली और उद्योग के क्षेत्र में प्रत्यक्ष दिख रहा बुरा हाल और योजनाओं के कार्यान्वयन में विफलता के सबूतों से कन्नी काटकर बच निकलने का प्रयास इस रिपोर्ट कार्ड में साफ़ नज़र आता है.

यही कारण है कि मुख्यमंत्री अब मानव संसाधन विकास को औद्योगिक विकास से बेहतर बताने जैसा बयान बार-बार देने लगे हैं.

इसलिए 'स्कूल बालक-बालिका साइकिल योजना या पोशाक योजना' को वह अपनी सरकार की एक बड़ी उपलब्धि बताते हैं.

स्कूलों में दाख़िला बहुत बढ़ जाने के विवादास्पद आंकड़ों या बड़ी तादाद में कथित अयोग्य स्कूल-शिक्षकों की नियुक्ति के बूते ये सच दबाया नहीं जा सका है क़ि यहाँ शैक्षणिक गुणवत्ता में भारी ह्रास हुआ है.

राज्य में तय समय-सीमा के अंदर कुछ चुनी हुई लोक सेवाएं उपलब्ध कराने संबंधी 'लोक सेवाओं का अधिकार क़ानून' लागू हुए तीन महीने से अधिक हो गए हैं.

मुख्यमंत्री ने रिपोर्ट कार्ड जारी करते समय बताया कि इस बाबत 50 लाख से भी ज़्यादा आवेदन पत्र मिले, जिनमें 32 लाख आवेदन पत्र सिर्फ़ जाति, आय और आवास के प्रमाण पत्र की मांग से संबंधित थे.

लेकिन उन्होंने ये आंकड़ा नहीं दिया कि बिना घूस दिए कितने प्रमाणपत्र समय पर उपलब्ध कराए गए और आवेदनकर्ताओं को इसमें कितनी मुश्किलें पेश आ रही हैं

भ्रष्टाचार से सर्वाधिक त्रस्त इस राज्य के मुख्यमंत्री अपने भाषणों में इसके ख़िलाफ़ जंग छेड़ देने या 'ज़ीरो टॉलरेन्स' की बात बहुत ज़ोर देकर कहते हैं.

वो ये बताने से नहीं चूकते कि भ्रष्टाचारियों के मकान ज़ब्त कर उसमें स्कूल खुलवाने के लिए विशेष न्यायालय क़ानून बनाने वाला पहला राज्य है बिहार.

लेकिन ऐसी इक्की-दुक्की कार्रवाई को धता बताने वाले ताक़तवर भ्रष्टाचारियों का यहाँ सत्ता-परिसर में ही अच्छा-ख़ासा जमावड़ा होने का आरोप अब खुलकर लगाया जा रहा है.

प्रभावी लोकायुक्त संस्था

प्रेक्षक मानते हैं कि इस आरोप का नीतीश कुमार की ओर से मज़बूत और विश्वसनीय खंडन तभी हो सकेगा, जब यहाँ सही मायने में एक प्रभावी और निष्पक्ष लोकायुक्त संस्था का गठन वो होने देंगे.

हालांकि बिहार के प्रस्तावित लोकायुक्त विधेयक प्रारूप में खोट बता देने वाली अन्ना टीम पर आग-बबूला हुए नीतीश कुमार ने इस बाबत संदेह पैदा कर दिया है.

गत छह वर्षों में मुख्यमंत्री की चर्चित या विवादित यात्राओं पर और उनके अभूतपूर्व विज्ञापन-अभियान पर राज्य के सरकारी ख़ज़ाने से अरबों रूपए का ख़र्च भी सवालों के घेरे में है.

इस बार मुख्यमंत्री को अपनी 'सेवा यात्रा' के दौरान कई जगहों पर जन-विरोध का सामना करना पड़ा है क्योंकि प्रचारित विकास और ज़मीनी सच्चाई के बीच फ़र्क़ से लोग भड़के हुए हैं.

इस पूरे प्रकरण का सबसे गंभीर राजनीतिक पहलू ये है कि बिहार में लोगों के सामने झट से अपना लेने लायक कोई वैकल्पिक नेतृत्व फ़िलहाल है ही नहीं.

लालू-राबड़ी राज के बिगड़े हालात का भूत और फिर वैसे ही किसी भविष्य का भय दिखाकर दोबारा प्रबल बहुमत से सत्ता में लौटी नीतीश सरकार फ़िलहाल निश्चिन्त है.

पस्त मनोबल वाला प्रतिपक्ष यहाँ नीतीश सरकार की कमज़ोरियों और चालाकियों को पकड़ कर उसके ख़िलाफ़ असरदार जन प्रतिरोध पैदा करने की ताक़त भी नहीं जुटा पा रहा है.

सिर्फ वामपंथी भाकपा-माले ने इस सरकार के प्रचारित दावों को झूठा सिद्ध करने जैसा जन-अभियान चलाने में अपनी पुरज़ोर सक्रियता दिखाई है.

भ्रष्टाचार के मामले में तो लगता है लालू-रामविलास की जोड़ी कांग्रेस की शरण में ही अपना भला समझ रही है. इसलिए यहाँ नीतीश सरकार को तुलनात्मक लाभ मिल रहा है.

कहा जा सकता है कि चूँकि विकल्पहीनता जैसी स्थिति है, और 'माल मीडिया' के मैनेजमेंट ने यहाँ 'मास मीडिया' की जगह ले ली है, इसलिए कथित सुशासन का विज्ञापनी चेहरा बाहरी देश-दुनिया में बेरोकटोक चमक रहा है.

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