संगीत, विरोध और राजनीति

Image caption सुमंगला ने शुभा मुदगल से गायन का प्रशिक्षण भी लिया है और उनके गीतों की एक सीडी भी आ चुकी है.

संगीत और विरोध हमेशा साथ साथ रहे हैं. संगीत का साथ हो तो विरोध लोकप्रिय भी हो जाता है. इस दिशा में इंडियन पीपुल्स थिएटर एसोसिएशन के योगदान से सभी वाकिफ़ हैं. इसी विषय पर डॉ सुमंगला दामोदरन ने शोध भी किया है और वो विद्रोही गाने भी गाती रही हैं. उनसे हमारे सहयोगी सुशील झा ने बातचीत की संगीत, विरोध, विद्रोह और राजनीति पर.

विरोध और संगीत के बीच क्या रिश्ता है.

ऐतिहासिक रुप से देखें तो संगीतात्मक रुप से विद्रोह तो स्वाभाविक रहा है. मैं जिस विषय पर काम कर रही हूं वो इप्टा के आंदोलन से जुड़ा रहा जिसने जानते बूझते संगीत का इस्तेमाल किया विद्रोह की भाषा में और सफल रहे.

सुमंगला दामोदरन से बातचीत सुनने के लिए क्लिक करें

क्या किसी विरोध में संगीत जुड़ता है तो विरोध के स्वर और मुखर हो जाते हैं. विरोध लोकप्रिय हो जाता है लोगों में.

ये कहा जाता है कि जहां दस भाषण देने हों वहां एक गीत हो तो वो काम कर जाता है. गाने के रुप में भावनाएं बेहतर तरीके से प्रकट होती हैं. गाने का इस्तेमाल इस बात को आसान कर देता है. ये मूड ले आता है पूरे माहौल में.

इप्टा का क्या योगदान माना जा सकता है.

इप्टा के जो एक्सपेरिमेंट रहे वो आधुनिक भारत के लिए बहुत मायने रखता है क्योंकि इसमें जो संगीत दिया गया उसका आगे चलकर फ़िल्म म्यूज़िक, शहरी संगीत पर भी बहुत प्रभाव रहा.

रिवोल्यूशनरी संगीत के बारे में ये आम धारणा है कि ये वही गीत होता है जिसमें जोशो खरोश हो. बिल्कुल कड़क लहजे में गाया गया हो जैसे मेहनतकश इस दुनिया से जब अपना हिस्सा मांगेगे या और भी कविताएं पाश और अन्य कवियों की.आपका शोध इससे कुछ इतर बात भी करता है.

आप सही कह रहे हैं सभी को लगता है कि जिसमें जोशो खरोश है वही विरोध का संगीत है. ऐसा नहीं है. मैंने अपने शोध में कई ऐसे गीत खोजे या पाए जिसमें कुछ भी बिल्कुल डायरेक्ट नहीं कहा गया है लेकिन वो भी विरोध का ही संगीत है. आम जनजीवन में गुस्सा है वो ज़रुरी नहीं कि ज़ोर से बोल कर तेज गाकर ही सुनाया जाए. मसलन आपने जो गीत बताया वो तो है लेकिन ये गाना देखिए. सुनो हिंद के रहने वाले सुनो सुनो आज़ादी के पूर्व दुआरे बांग्ला के इंसान भूख से लड़कर कर रहे हैं ज़िंदगी कुर्बान. ये बंगाल अकाल के दौरान लिखा गया फिर आज़ादी के समय इसी को दोबारा लिखा गया कुछ यूं ये किन बच्चों की चीखें हैं. किस दुखिया मां की आहे हैं. किस बेवा दुल्हन की फरियाद लिए खामोश निगाहें हैं.

ऐसा ही एक और गाना है शायद राजा महाराजा का डोला जो आपने भी गाया है.

ये अनुवाद है हिंदी में...ऊंची नीची टेढ़ी मेढ़ी सड़कों से लिए जाते हैं राजा का डोला. अपने जिस्म के खून पसीने के बल पे चलत है डोला. इन गानों में देखिए. कोई बात डायरेक्ट नहीं है. इसमें दुनिया बदलने, शोषण की बात सीधी नहीं है लेकिन संदेश तो है संदर्भ भी है. कई गाने तो बहुत धीमे गाए गए हैं लेकिन उनमें भी विरोध का संगीत है.

इसी को अगर आगे बढ़ाया जाए तो क्या ये कहा जा सकता है कि जो भी संगीत आता है वो वर्तमान व्यवस्था के विरोध में रचित होता है.

ये एक स्तर पर तो है ही. ज़रुरी नहीं कि शोषण के ख़िलाफ़ ही गीत लिखा गया हो. संदर्भ कुछ भी हो सकता है लेकिन उससे आम आदमी की ज़िंदगी में फ़र्क पड़ता है. उसकी भावनाओं पर असर होता है तो ऐसे में जो लिखा जाए वो विरोध हुआ जैसे बंगाल में जब खाने पीने की चीज़ों पर कंट्रोल हो रहा था तो किसी ने लिखा ये गीत की एई मंजू मां..कंट्रोल जानेय ना. यानी मंजू की मां तो कंट्रोल ही नहीं समझती. ये भी तो विरोध का गीत हुआ न.

हां जैसे पिछले दिनों मंहगाई डायन खाय जात है काफी लोकप्रिय हुआ था. इसे भी विरोध का गीत माना जाय.

क्यों नहीं. विरोध के गीत ऐसे ही तो रचे जाते हैं. ऐसा नहीं है कि डायरेक्ट गाने न हों क्योंकि उनकी ज़रुरत भी होती है.लेकिन हर संदर्भ में नहीं हो सकता है ये. अलग अलग माहौल में अलग अलग तरह से गीत बनते हैं.

पिछले दिनों अन्ना हज़ारे के आंदोलन के दौरान गाए गए गीतों की बड़ी आलोचना हुई थी.

मैंने तो वो गाने सुने नहीं थे (हंसते हुए) लेकिन मैंने भी ये आलोचना सुनी थी. असल में आज के दिन में राजनीतिक आंदोलनों में गीत ही कम हो गए हैं. संगीत एक चीज़ है. वो प्रभावी होनी चाहिए. सब लोग गा नहीं सकते. सब चित्रकार नहीं हो सकते. ऐसा नहीं होता कि कोई कुछ भी गा लेगा और अच्छा हो जाएगा. गाना बनना है और उसका असर चाहिए तो उसे ठीक से गाना होगा और प्रक्रिया को समझना होगा.

क्या आर्टिस्ट का जुड़ना ज़रुरी होता है विरोध की परंपरा से.

ज़रुर जुड़ना चाहिए. ऐसा होता आया है. आर्टिस्टों का राजनीतिक संलिप्तता भले ही कम रही हो लेकिन ज़रुरत के समय लोग जुड़े हैं और उनमें इच्छा रही है. आप सलिल चौधरी को देख लीजिए. उन्होंने कांग्रेस पार्टी के ख़िलाफ़ गीत लिखा था इमरजेंसी के बाद. वो लंबे समय तक वाम परंपरा से जुड़े रहे. जब कुछ हुआ दंगे फसाद हुए तो लोगों ने एक्सप्रेस किया. क़ैफ़ी ने बाबरी के बाद राम का बनवास लिखा.

सलिल चौधरी का वो कौन सा गीत था इमरजेंसी के बाद

वो कुछ यूं था- ये गला घोंटने वाला हाथ, ये पूंजीपति का हाथ ये जागीरदार का हाथ, ये स्ट्राइक तोड़ने वाला हाथ, इसे वोट न देना.

संगीत और विरोध को राजनीति से जोड़कर कैसे देखेंगे.

राजनीति में एस्थेटिक्स का एक मूल हिस्सा है. ये बात हम सभी को राजनेताओं को समझनी होगी. एस्थेटिक्स और राजनीति को अलग नहीं किया जा सकता. कलाकार को ये समझना होगा कि वो जो करते हैं उसमें राजनीति है और राजनीतिज्ञों को ये समझना होगा कि वो बिना एस्थेटिक्स के राजनीति आगे नहीं बढ़ा पाएंगे. ऐसा हो तो विरोध के संगीत के आगे बढ़ने और फलने फूलने की संभावनाएं तो बनती ही हैं.